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स्वागत! है, उस शहर में जहां

स्वागत! है, उस शहर में जहां
जिदंगी की कोई कदर नहीं!
बरसात के इस मौसम में कई जिंदगियां ऐसी हंै जिनके सिर पर छत नहीं है। कुछ इनमें ऐसे हैं जो समझ भी नहीं पाते कि उनके साथ क्या हो रहा है। वे जिंदा हैं किन्तु एक लाश से भी बदतर। बेजान चलती- फिरती लाशें। न घरबार, न कोई दोस्त न रिश्तेदार। वे यह समझ भी नहीं पाते कि उनका भी अन्य मनुष्यों की तरह एक पेट है जिसमें भोजन की जरूरत होती है। वे यह भी समझ नहीं पाते कि उनका एक शरीर है जिसके देखभाल की जरूरत होती है। ऐसी सैकड़ों जिंदगियां शहर में हैं पर इन्हें सम्हालने वाला कोई नहीं। इनकी जिंदगी सड़क के किसी चैराहे पर तो किसी बंद पड़ी दुकान के आगे गुजरती है। इनमें से कई बरसात, ठण्ड व गर्मी का अनुभव तक अपने शरीर में महसूस नहीं कर पाते लेकिन जब तक नश्वर शरीर में जान है। वे यूं ही घूमते- भटकते रहते हैं। यह नहीं कि इन भटकती जीवित आत्माओं पर हमारे समाज के ठेकेदारों और उनको सम्हाले रखने की जुगत पाले समाजसेवियों को इसकी जानकारी नहीं है लेकिन जब इन्हें सम्हालने व इनके इलाज की बारी आती है, तो सब नाक- भौं सिकोड़ लेते हैं। सड़क पर घूमते- फिरते इन मानवपुत्रों की दशा का भान हम उस समय लगा सकते हैं। जब लोग भारी बरसात, कड़कड़ाती ठण्ड और भीषण गर्मी में अपने उपाय का सारा प्रबंध कर सड़कों पर उतरते हैं लेकिन इन बेचारों का क्या होता होग? यह सड़क पर प्रकृति की मार को झेल न पाने के कारण तड़प- तड़प कर मौत का आलिंगन कर लेते हैं और पुलिस अपने रोजनामचे में मर्ग कायम कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। इन लावारिस लाशों को ठिकाने लगाने का काम स्वंयसेवी संस्थाओं को सौंपती है। वे उसे ठिकाने लगाते हैं लेकिन यह भी पता नहीं लगाया जाता है कि इसकी मौत का कारण क्या है? मनुष्य के जीवन की इन कड़वी सच्चाइयों को सिर्फ लोग महसूस करते हैं। किन्तु इतने सालों बाद भी यह इस शहर का दुर्भाग्य है कि जहां राज्य की विधानसभा है, राज्यपाल हैं, मुख्यमंत्री है, उनका पूरा मंत्रिमंडल और माननीय सदस्य रहते हैं। एक से एक निर्णय लेने वाली सक्षम कार्यपालिका के अधिकारी रहते हैं और जहां न्याय की देवी का वास है। उस शहर में कभी किसी ने यह सोचने का प्रयास नहीं किया कि कई जिंदगियां ऐसी हैं। जो सड़कों पर भटकती रहती हैं, जिनका कोई सहारा नहीं। क्यों हम इतने गैर संवेदनशील हो गये? क्यों हम इंसानी जिंदगी की कीमत महसूस नहीं कर रहे हैं! जानवर को तड़पता देखते हैं तो उसके प्रति संवेदशील हो जाते हैं लेकिन आंखों के सामने मानव जीवन को तड़पकर मरते देखने के बाद भी न उसके प्रति संवेदशील हैं और न किसी को कोई फर्क पड़ता है, फिर भी हम कह सकते हैं- इस शहर में आपका स्वागत है। जहां जिंदगी की कोई कदर नहीं!

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