गुरुवार, 26 अगस्त 2010

कमजोर कानून

रायपुर,बुधवार दिनांक 25 अगस्त 2010

कमजोर कानून टीन एजर्स
में बढते अपराध का कारण
कानून सख्त हो जा ये तो किसी की मजाल नहीं कि मनमानी कर सकें- हम यह दावे के साथ कह सकते है कि ट्रेफिक के मामले में पिछले कुछ समय से की गई सख्ती ने रायपुर के लोगों को काफी राहत दी है। अपराध के मामले में पुलिस को कुछ इसी तरह का रवैया अपनाने की जरूरत है। जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं उसका एक बड़ा कारण कानून की दिलाई और कानून से लोगों का डर खत्म होना है। निमोरा में तिहरे हत्याकांड में लिप्त लड़के ही निकले जिन्होंने पैसे की लालच में चोरी की और चोरी करते देख लेने के डर से तीनों बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। हम पहले ही यह बता चुके हैं कि अपराध का तीन कारण हो सकता है- एक टीन एजर्स सेक्स, दूसरा चोरी और चोरी करते बच्चों का देख लेना या फिर आपसी रंजिश। इन तीनों में से दूसरी बात सही निकली। टीन एजर्स सेक्स की संभावना सिर्फ बालिका की भूमिका से ही व्यक्त किया गया। हमने यह भी बताया था कि बच्चे आपस मे ंखेल के खेल के दौरान बहुत कुछ कर डालते हैं। पड़ोसी युवकों का घर में आना जाना था। जब उन्होंने चोरी की तो उसे शेष बच्चों ने देख लिया और यह देख लेना इतना मंहगा पड़ा कि उन्होने बच्चों की वीभत्सता से हत्या कर दी। घर को सिर्फ बच्चों के भरोसे छोड़ने वाले मां बाप के लिये भी यह अपराध एक संदश है कि वे बच्चों को छोड़कर अकेले कहीं न जा ये और जायें तो किसी को उनकी जिम्मेदारी सौंपकर जायें। हत्याकांड के बाद हमने अपने कालमों में लिखा था कि हत्यारा गांव का ही काई सदस्य हा े हो सकता है जिसने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। सारे घर की परिस्थिति से अच्छी तरह जानने वाले पड़ोसी युवक की करतूतों से सारा गांव भी शरमिन्दा होगा। इतने दिनों तक वह सारे गांव की गिितिवधियों व पुलिस की कार्रवाइयों को देखता रहा और अंततरू पुलिस के जाल में फंस गया। शहर और आसपास के गाँवों में बढ़ रहे अपराध पर एक नजर डाले तो यह बात साफ है कि इसे करने वालों में प्रायरू बच्चे या युवा वर्ग के लडके है जिन्हे आगे पीछे की कोई सोच नही हैं और वे बे परवाह किसी भी ढंग का भीषण अपराध कर डालते हैं। टीन एजर्स के कारनामों की शुरूआत निमोरा से शुरू नहीं हुई बल्कि ऐसे अपराधों का राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में तेजी से फैल रहा है। अपराध का नब्बे प्रतिशत में हाथ टीन एजर्स व युवाओं का रहता है। छोटे बच्चे और तीस से पैंतीस साल की उम्र के लड़के बुरी तरह अपराध में लिप्त हो गये । मां बाप को इसका पता भी नहीं चलता कि उनका बेटा क्या कर रहा है और जब ऐसे ही किसी बड़े अपराध में फंस जाता है तो उनके पास रोने के सिवा कोई दूसरा उपाय बचता नहीं। हम इस अपराध के लिये घरों में अनुशासन की कमी और बच्चों को हर मामले में खुली छूट को मानते हैं। बजुर्गाे के प्रति आदर खत्म हो चुका है तथा स्कूल कालेज की पढ़ाई में कहीं अनुशासन व अच्छे गुण सिखाने की बात का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। बच्चे पैदा होने के बाद से लेकर युवा होते तक स्ट्रीट में रहते हैं और स्ट्रीट बाय बनकर वे सब कृत्य कर डालते हैं जो समाज को दुविधा में डाल देते हैं। अपराध के छोटे से छोटे मामले मे जब तक पुलिस कडी नहीं होगी तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा।