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इससे बडी सजा भी तो है....

निलंबन, लाइन अटैच, स्थानातंर
इससे बडी सजा भी तो है....
भड़की जनता को शांत करने पुलिस प्रशासन के पास एक ब्रम्हास्त्र है अपने कर्मचारियों को थाने से लाइन में अटैच कर दें या निलंबित कर दें या फिर स्थानान्तरित कर दें। इससे जनता भी खुश, नेता भी खुश और मीडिया भी खुश। दूूसरा अस्त्र जिला प्रशासन के पास है- वह मामले कि मजिस्ट्रीरियल जांच के आदेश देती है, इसके बाद सारा मामला छू मंतर। तीसरा हथियार भी है जो सरकार के पास है। घटना को उग्र होता देख जांच समिति गठित कर दें या फिर किसी खाली बैठे न्यायाधीश को पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दे। पूर्व न्यायाधीश महोदय या सरकार द्वारा गठित समिति जब तक रिपोर्ट पेश करती है। तब तक जनता भी यह भूल जाती है कि क्या हुआ था। यह दिलचस्प किस्सा वर्षो से यूं ही चला आ रहा है। लोगों ने क्या कभी यह सोचने का प्रयाास किया है कि प्रशासन और सरकार ऐसा कर लोगों को कितना बड़ा धोखा देती है। असल में यह जो कार्रवाहियां हैं, जनता के त्वरित आक्रोश को रोकने का एक हथियार है, जिसका उपयोग वह रविवार को हुई घटना जैसे मामलों में करती है। युवतियों के मुंह पर कालिख पोतने के मामले में पुलिस ने अपने कम से कम एक दर्जन कर्मचारियों को निलंबित किया। कई दिनों से बने बनाये रखे थानेदारों के स्थानान्तर लिस्ट को इस प्रकरण से जोड़कर आनन फानन में तुरन्त जारी किया गया। निलंबन का इन कर्मचारियों पर क्या असर पडऩे वाला? पहले थाने में काम करके तनख्वाह मिल रही थी। अब बिना काम के घर बैठे तनख्वाह मिलेगी। हां थाने से रोज मिलने वाले खुरचन पानी पर जरूर असर पड़ेगा। कुछ दिन बाद जब सब शांत हो जायेगा तो फिर बहाल। अगर वास्तव में सजा ही देना था तो क्यों नही विभागीय जांच का आदेश दिया जाता? क्यों नहीं कर्मचारियों की चरित्रावली को मार्क किया जाता और क्यों नहीं एक या दो इंक्रीमेंट रोकने जैसी कार्रवाई की जाती। यह एक अकेले फ्रेण्डशिप डे वाले मामले की हम बात नहीं कर रहे। बल्कि प्रायरू ऐसे मामलों में होता है। चाहे वह थाने में छेड़छाड का मामला हो, बेदम पिटाई का मामला हो या किसी महिला से थाने में बलात्कार का मामला। अक्सर आप देखेंगे इनपर आम आदमी पर लगाई जाने वाली धाराओं को लगाने की जगह उन्हें या तो लाइन अटैच कर दिया जाता है या निलंबित कर दिया जाता है। नौकरी से तत्काल बर्खास्त कर गिरफतार करने की कार्रवाई में देरी क्यों की जाती है? हम मानते हैं कि ऐसे में हमारे नियम बाधक बनते हैं, किन्तु ऐसे नियमों को बदलकर सख्त क्यों नहीं किया जाता। प्रशासन और सरकार द्वारा भी जनआक्रोश को शंात करने के लिये की जाने वाली कार्रवाई भी सिर्फ तात्कालिक रोष को रोकने का एक प्रयोग ही रहता है। हकीकत में ऐसे मामलों में दोषी लोग बच जाते हैं या उन्हें आसानी से बचा लिया जाता है। पुलिस, प्रशासन व सरकार ने बहुत ही तरीके से फ्रेण्डशिप कालिख कांड को जन आक्र ोश को शांत करने के लिये उसने ऐसे ही अस्त्रों का प्रयोग किया जो उसे करना था। फ्रेण्डशिप डे पर युवक सुलझाया या कहे दोषियों को छोटी- छोटी धारा लगाकर कानून के हाथ से भी निकल भागने का मौका दिया- इसे यही कहा जाये कि कूटनीतिक तरीके से संपूर्ण मामले को दबाने की कोशिश की। जबकि अगर कोई आम आदमी किसी महिला को बगीचे में पकड़कर उसके साथ बदसलूकी करता तो उसपर बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की धाराएं लगाई जाती। हुड़दंग और गुण्डागर्दी करने वालों को शायद छत्तीसगढ की राजधानी में बचाने का यूं ही खेल चल रहा है। प्रशासन या सरकार के इस तिकड़म की हम प्रशंसा करें या .......!

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