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कानून अंधा, व्यवस्था बहरी...बासठ वर्षाे

कानून अंधा, व्यवस्था बहरी...बासठ वर्षाे
में जो मिला संजोकर रखों...!
गाडियां लेट, अफसर समय पर दफतर नहीं पहुंचते, मिलावट, जमाखोरी...हर छोटे काम के लिये पैसे की मांग, चोरी, लूट, डकैती, अनुशासनहीनता, बड़ों का आदर नहीं...और तो और हमारी न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार के दलदल में!ढढ बासठ साल का लम्बा समय हमारी आजादी के...हमने क्या पाया? यही सब कुछ तो... पन्द्रह अगस्त अभी दूर है। तेरसठवां साल लगने वाला है, हमारी आजादी के... उस दिन फिर हम तिरंगा फहरायेंगे, देशभक्ति गीत गायेंगे। परेड करके दिखायेंगे। कई प्रतिज्ञाएं करेगें...और उसके बाद दूसरे दिन से ही देश को फिर से गर्त में ले जाने का प्रयास करेंगे। एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में एक भी माई का लाल अब शायद नहीं बचा है, जो देश में व्याप्त गंदगी को दूर करने के लिये आगे आये! एक इंदिरा गांधी थीं, जिसने सिर्फ एक दिन में सारी व्यवस्था को पटरी पर लाकर खड़ा कर दिया लेकिन उस बेचारी महिला का क्या हश्र हुआ?अपना खून देकर इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी। आज कोई इमरजेेंसी की बात करता है, तो भी उन लोगों को बुरा लगता है जो कतिपय अव्यवस्थाओं के लिये जिम्मेदार थे। आज क्या हो रहा है, इस देश में ? भ्रष्टाचार, बदइंतजामी, नौकरशाही और लेटलतीफी के जाल ने बेचारी जनता को बुरी तरह फांस दिया है। विधानसभाओं और संसद में किस तरह की बहस हो रही है? इनमें बैठे माननीय किसका भला कर रहे हैं ? जनता भी तो बेवकूफ है, जो गमले फेंकने, लात घंूसे चलाने वालों और एक- दूसरे को मारने -पीटने पर उतारू होने वालों के पीछे हाथ जोड़कर नारे लगाती हुई भागती है। क्यों ऐसे लोगों को वोट देती है ? क्यों ऐसे लोगों के लिये सड़क पर उतरकर आपने परिवार को रोता- बिलखता छोडऩे के लिये मजबूर करते हंै। अब तो आपको देश की न्यायपालिका की ईमानदारी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिय।े क्योंकि वह भी इन बासठ साल में मैली हो गई। अगर नहीं मालूम तो देखिये इन आंकड़ों को कि पीएफ घोटाले में दो दर्जन से ज्यादा पूर्व जजों के नाम शामिल हैं। इनमें निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों के नाम शमिल हैं। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की ताजा सर्वे रिपोर्ट ने तो चैका दिया है कि देश के उनसठ फीसदी प्रतिवादी वकीलों को रिश्वत देते हैं। तीस फीसदी अदालतों को और पांच फीसदी जजों को पैसा खिलाया जाता है। कैसे करें हम न्याय पर विश्वास ? व्यवस्था का हाल देखिये कि इलाज के नाम पर दो साल में एक हत्यारे विकास यादव को छासठ बार जेल से बाहर निकाला गया। देश की कानून और व्यवस्था लचर हो गई है..रोज किसी न किसी का खून, लावारिस लाशें, सड़क पर चलने वाला लूट का शिकार, महिलाओं से छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज प्रताडऩा, और अॉनर किलिंग तो रोजमर्रा का काम है फिर बाहर से आये आंतकवादी कहीं भी बम फेंक देते हैं, नक्सलवाद एक बड़े राक्षस की तरह खड़ा है और हमारी सरकार उससे कह रही है- अबकी मारा तो ठीक अब मारा तो ठीक नहीं होगा.. और वह फिर मारता है, तो बने बनाये प्रेस नोट पर हमारे नेता वही निंदा प्रस्ताव, श्रद्वांजलि,मुआवजे के साथ किसी परिवार की रौशनी को खत्म कर देते हैं। जिस देश की व्यवस्था का एक बड़ा वर्ग भ्रष्ट होकर अरबों लोगों को चूस रहा हो जिसकी न्यायपालिका के कतिपय जजों पर करोड़ों रूपये के जमीन घोटाले का आरोप हो,जिस पर महाभियोग चल रहा हो, वहां एक आम आदमी न्याय के लिये कैसे तरसता होगा? इसका अंदाज लगाया जा सकता है। आज देश की अदालतों में तीन करोड़ मामले सुनवाई के लिये लंबित हैं, 57,065 मामले सुप्रीम कोर्ट में पड़े हुए हैं। हाईकोर्ट में पैतीस लाख मामलों को फैसले का इंतजार हंै। कई लोगों को फांसी हो चुके हैं-वे जेलों में सरकारी रोटी,बिरयानी खा -खा कर मजे की जिंदगी बसर कर रहे हैं। कुछ को फाइव स्टार होटल की सुविधाएं मिली हुई हैं। क्या यही कहें-कानून अंधा है,व्यवस्था बहरी-अंधेर नगरी,चैपट राजा!

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