गुरुवार, 26 अगस्त 2010

आतंकवाद कौन फैला रहा?

रायपुर गुरुवार। दिनांक 26 अगस्त 2010

आतंकवाद कौन फैला रहा? नेता, मंत्री
अपने बयान पर लगाम लगायें!
यह चाहे हिन्दू आतंकवाद हो, चाहे मुस्लिम या फिर माओवाद या अन्य अपराध- इन सब में पिसती है आम जनता। बयान देने वाले नेताओं का कुछ नहीं होता- कोई भी निर्दाेष व्यक्ति जिसका किसी से लेना देना नहीं वह इस माहौल में आकर बलि का बकरा बन जाता है। आतंक फैलाने वाले खुश होते हैं और सरकार निंदा प्रस्ताव, मुआवजा और श्रध्दाजंलि देकर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर चुप हो जाती है। इस बीच कोई पुलिस का आदमी मारा जाता है, तो उसे शहीद बना दिया जाता है। शहीद वे कहलाते हैं जो देश के लिये दुश्मनों से लड़कर मारा जा ये लेकिन आजकल आतंकवादी, नक्सली की गोली या बारूद से मरने वाला भी शहीद हो जाता है। चाहे उसने मुठभेड़ की हो या नहीं। बार बार आतंक के चलते शहीद की परिभाषा ही बदल दी गई। लाखों करोड़ों रूपये अब तक शहीदों को मुआवज़े के नाम पर दिया जा चुका है लेकिन सरकार ने ऐसा कोई एहतियाती कदम नहीं उठाया कि निर्दाेष आम आदमी मारा न जाये तथा पुलिस के जवान कथित रूप से शहीद की गिनती में शामिल न हो वें। बुधवार को भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम साहब का एक बयान आया कि देश में अब हिन्दू आतंकवाद फैल रहा है। हम चिदंबरम साहब से यह पूछना चाहते हैं कि हिन्दू हो या मुस्लिम अथवा अन्य कोई भी आतंकवाद या अन्य किस्म के अपराध। इसे फैलने के लिये कौन जिम्मेदार है? सरकार आंख मूंदकर कहती रहेगी कि नक्सलवाद बढ़ रहा है, हिन्दू, मुसलमान या अन्य कोई धर्म के लोग आतंकवाद फैला रहे हैं तो इससे क्या देश में यह सब बुराइयां रूक जायेगी? चिदम्बर साहब और उनकी सरकार के पास न केवल गुप्तचर एजेंसियों हंै बल्कि पुलिस और सेना के रूप मे अपार शक्ति मौजूद है, क्यों नहीं वे इस बात का प्रयास करते कि आतंकवाद न बढे। कह देने से क्या आतंकवाद खत्म हो जायेगा? चिदंबरम यह भी कह रहे हैं कि आतंकवाद के ख़ात्मे में वर्षाे लग जायेंगे- इसका मतलब यही है कि इस समस्या का सरकार के पास कोई समाधान नहीं। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं। अलग- अलग राज्यों में बंटे इस देश में हिंदुओं की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि हिन्दू आतंकवादी हंै। इस देश में सभी धर्म और जाति के लोग न केवल मिलकर रहते हैं बल्कि अच्छे दोस्त व परिवार के सदस्य के रूप में भी रहते हैं। कुछ लोगों की सोच नफरत की हो सकती है-इस सोच व उनके रवैये को बदलने या इससे सस्ती से निपटने का काम सरकार का है न कि जनता का। जनता को यह बताकर क्यों राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास किया जा रहा है? देश को बांध कर रखने की जगह उसे टुक ड़े- टुकड़े करने व लोगों को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रपति व देश की सर्वाेच्च न्यायालय को इन सब पर संज्ञान लेने का वक्त आ गया है। वरना कुछ नेताओं ने तो लगता है देश में गृह युद्घ की स्थिति पैदा करने का बीड़ा उठा लिया है।