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दो लाख कुछ नहीं !

रायपुर शुक्रवार।
दिनांक 27 अगस्त 2010
दो लाख कुछ नहीं !
मंहगाई के इस दौर में केन्द्र सरकार की तरफ से उन लोगों को बड़ी राहत मिली है जिनकी आमदनी सालभर में दो लाख रूपये से कम है। अब तक एक लाख साठ हजार रूपये तक की आमदनी वाले व्यक्ति को आय कर पटाना पड़ता था लेकिन अब इसे बढ़ाकर दो लाख रूपये कर दिया गया है। केन्द्र सरकार ने करदाताओं को राहत पहुंचाने की गरज से प्रत्यक्ष कर संहिता डीटीसी को मंजूरी दी है। नये कानून में दो दशमलव पांच लाख रूपये की आय पर अब दस प्रतिशत और पांच दशमलव दस लाख की आय पर बीस व दस लाख से ज्यादा की आय पर तीस प्रतिशत की दर से कर लगने की संभावना है। वरिष्ठ नागरिक और महिलाएं पहले से छूट का फायदा उठा रहै है। संभव है यह छूट आगे भी जारी रहेगी। ऐसा लगता है सरकार ने अचानक यह कदम संसद में हाल ही सांसदों के वेतन में बढ़ोतरी से जनता में उभरे आक्रोश के परिप्रेक्ष्य में उठाया है। जनता माननी यों के वेतन में किये गये तीन सौ प्रतिशत की वृद्वि से भारी गुस्से में है, ऐसे समय में आयकर में थोड़ी बहुत छूट देकर जनता की नाराजगी को कम करने का एक प्रयास इसे माना जा सकता है। दो लाख तक टैक्स नहीं का फैसला कैबिनेट में हो चुका है। इसे अब संसद के चालू सत्र में पेश किया जायेगा ताकि अगले वित्त वर्ष से इसे लागू किया जा सके। आय कर में छूट के साथ सरकार ने पीएफ और प्रोवीडेंट फंड निकासी के वक्त लगने वाले कर पर भी राहत देने का फैसला किया है। ऐसा ही निर्णय पेंशन पर लगने वाले कर पर भी लिया गया है। 2004 से नौकरी पर लगे लोगों का पेंशन पूरी तरह से कर मुक्त होगा। सरकार द्वारा अचानक जनता के हित में लिये फैसले पर यद्यपि यह कहा जा रहा है कि सरकार कर ढांचे को आसान करना चाहती है तथा ज्यादा लोगों को कर दायरे में लाना आदि किंतु इसकी हकीक़त क्या है, यह बाद में ही पता चलेगा। बात यहां यह भी उठ रही है कि अगर सरकार जनता के प्रति इतना ही प्रेम दर्शा रही है, तो उसने आम लोगों पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों जैसे सर्विस टैक्स आदि को क्यों नहीं खत्म किया? सवाल जनता की तरफ से यह भी है कि उसने सांसदों के वेतन में तीन सौ से ज्यादा प्रतिशत की वृद्धि कर उन्हें खुश किया है तो आम जनता पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों पर छूट क्यों नहीं दी ़?

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
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ऊची दुकान फीके पकवान!

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ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …