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गुम इंसान की खोज लाश दिखाकर!

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गुम इंसान की खोज लाश दिखाकर! (वेणोन्गिल चक्का वे-रेलुम कायकिम)यह एक मलयालम कहावत है जिसका हिन्दी अनुवाद है - चाहे तो कटहल(जेक फ्रूट) जड़ों में भी लग सकता है. इस कहावत का उपयोग हम यहां उस पुलिस व्यवस्था पर कर रहे हैं जो बहत्तर वर्ष पूर्व के अंग्रेज शासनकाल से बस यूं ही चली आ रही है अगर वह चाहे तो क्या कुछ संभव नहीं हो सकता.? लोग यह कहने में संकोच नहीं करते कि पुलिस व्यवस्था अमीरो के लिये हैं. गरीब तो बस... गरीब है उसके लिये वह कानून उसके सामाजिक जीवन के लिये न होकर उसके द्वारा कथित रूप से किये गये चोरी और अन्य छोटे मोटे अपराध के लिये है.जिसमें ऐसे अपराध भी शामिल है जो मजबूरी या अनजाने में हो जाते हैं मसलन घर से पैसे चुरा ले जाना, साड़ी कपडे गायब हो जाना. या भूख की वजह से घर में रखा स्वादिष्ट  व्यंजन  खा लेना.. ऐसे अपराधों में मालिक या मालिकिन से कठोर सजा तक देने में काई कमी नहीं की जाती. अमीर या प्रभावशाली अपराध कर दे तो उसका कोई संज्ञान नहीं.कई बार तो एफआईआर तक नहीं लिखी जाती.लिखवाने वाले को थानों में जलील किया जाता है. और भी बहुत कुछ.!इस भूमिका के पीछे यूं तो कई कह...

वो तीन घंटे....

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वो तीन घंटे.... उनने तो मुझे मौत का द्वार दिखा ही दिया था...  लेकिन आज पांच: साल बाद भी जिंदा हूं! यह हकीकत है.... हममें से कइयों की जिंदगी में ऐसा भी होता है जब हम किसी व्यक्ति या समूह के जाल में फंस गये होते हैं.एक ऐसा किस्सा मेरे साथ भी हुआ है जब मुझे जीते जी मारने का प्रयास किया गया. यह कोई हादसा नहीं न ही कोई दुश्मनी से पे्रेरित था  बल्कि एक ऐसी सोची समझी साजिश थंी. जिससे इन साजिशकर्ताओं  को अच्छी खासी रकम मिल सकती थी. बात सन् 2015 की है यह नये वर्ष की पहली  सुबह थी. सुबह- सुबह मुझे ऐसा पसीना आया जैसे में कोई बड़ा काम करके आया हूं. सुबह की ठंड में ऐसा पसीना निकलना आश्र्चयजनक तो था ही परेशान कर देने वाला भी! परिवार में बेटे को मैने बताया तो उसने कहा बुखार आया होगा उतर गया. मैंने मामूली सरदर्द और सर्दी को दूर करने के लिये एक डिस्प्रिन लिया और काम पर चल दिया.थोड़ी देर बाद प्रेस में छोटे भाई का नागपुर से फोन आया तो उसने मेरी भरी आवाज सुन पूछा क्या तबियत खराब है? मैने सुबह का किस्सा बताया तो उसने मुझसे कहा पसीने को गंभीरता से मत लो और फ ोन रख दिया. कुछ ही देर...

छत्तीसगढ़ में एम्स,,,, नाम बड़े दर्शन छोटे

छत्तीसगढ़ मेें 'एम्स.... नाम बड़े, दर्शन छोटे सिर्फ 'छींकने वालों की जांच के लिये क्यों बना दिया अस्पताल ? पांच साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया.. मरीजों को दूसरे अस्पताल जाने का डायरेक्शन दिया जाता है...  साफ्टवेयर अपडेट करने जैसे मामलों के लिये दस रूपये की वसूली... वह भी बिना रसीद के.. करोडों रूपये खर्च करने के बाद भी क्यों नहीं तैनात हुए विशेषज्ञ? क्यों नहीं लगायें गये आधुनिक जरूरी उपकरण? एम.ए. जोसेफ छत्तीसगढ़ के लोगों ने जिस उम्मीद, उत्साह,  उमंग से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स का स्वागत किया था क्या वह इसमें खरा उतरा है? क्या यह उनकी आवश्यकताओं को पूरा कर पा रहा है? वास्तविकता यह है कि एक विशालकाय महल बना दिया गया है जो दिखने में तो सुन्दर लगता है किन्तु अंदर से पूरी तरह खोखला है। वर्तमान एम्स उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है जिसकी उम्मीद छत्तीसगढ़ राज्य व उसके आसपास रहने वाले राज्यों के लोग कर रहे थे आज जो एम्स है उसकी वास्तविकता जानना है तो उन मरीजों से पूछा जा सकता है जो यहां पैसा खर्च कर अपने अभिन्न का इलाज करवाने धक्के खाकर सुबह से लाइन में खड़े होकर अस्पताल...

बदल गया TV देखने का नियम, इस ऐप से सेलेक्ट करें अपने मनपसंद चैनल– News18 हिंदी

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गरीब-मध्यम के हाथ से फिसल रहा गैस-तैल!

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शनै शनै हम कुछ ऐसी वस्तुओ पर आश्रित होते जा रहे हंै जो हमारे लिए जरूरी तो है किन्तु हमारी आर्थिक क्षमता अब उसे स्वीकार करने लायक नही रह पा रही है, इसमे सबसे महत्व की बात तो यह है कि जिन्हें हमारे लिए इसका प्रबंध करना है वे ही इससे या तो मुँह मोड़ रहे हैं या जिद पर अड़े हुए हैं.वर्तमान हालात मे ईंधन जिसमे पेट्रोल, डीजल, गैस सब शामिल है जो हरेक व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता  है सारी मुसीबत की जड़ बन गया है.घर मे चूल्हे से लेकर दफ्तर ओर एक शहर से दूसरे शहर तक की दूरी  को तय करने के लिये पेट्रोल, डीजल, गैस तीनों महत्वपूर्ण कड़ी है.ईधन की भूमिका जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई है पेट्रोल, डीजल औऱ गैस के भाव बढ़ते है तो ऐसा  लगता है जैसे हमारी पीठ पर कोई प्रहार कर रहा है दाम बढ़ते हैं तो यह न केवल व्यक्तिगत रूप से लोगो की परेशानी का सबब बन रहा है बल्कि संपूर्ण देश की अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहा ह.ै पिछले कुछ वर्षों से शुरू के महीने में तो पेट्रोल और डीजल के दाम में एक मामूली सी स्थिरता थी जो आगे चलकर एक आम समस्या के रूप में बदल गई लोगों का दैनि...

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

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 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है. यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं. चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग...

गुजरात चुनाव...सत्ता तो मिली लेकिन चेतावनी भी दी गई

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गुजरात में बेशक जीती बीजेपी, जीतना ही था, इतने सघन प्रचार-प्रसार और पूरी ताकत  के बाद भी अगर भाजपा नहीं जीतती तो शायद यह उसके लिये बहुत बड़ी हार होती. जीत इतने कम मार्जिन से है कि उसे अब अगले चुनाव के लिये सतर्क हो जाना चाहिये. अपने गृह राज्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इतना पसीना बहाने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिये थी. इसमें दो मत नहीं कि यहां कांग्रेस ने कड़ा मुकाबला कर भाजपा को इस बात की चेतावनी तो दे दी है कि अब आगे उसे अपनी रणनीति में काफी बदलाव करना होगा.उण्णीस वर्षो से भाजपा गुजरात की सत्ता पर काबिज  हैं. प्राय: हर पार्टी की सरकार को सत्ता में रहते हुए नकारात्मक वोटो का सामाना करना पड़ता है किन्तु यह गुजरात की जनता का मोदी प्रेम था कि उसने उन्हें फिर मौका दिया और बीजेपी सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने में  कामयाब रही, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृहनगर वडनगर जिस विधानसभा क्षेत्र में आता है, वहां बीजेपी की हार हो गई. कांग्रेस प्रत्याशी आशा पटेल ने बीजेपी के नारायण पटेल को हराया.यह भी दिलचस्प है कि वडनगर में पीएम मोदी और राहुल गांधी दोनों ने रैलियां की...

किस्मत बदलती है,दाना अब खुशहाल लेकिन...!

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मनुष्य जीवन के बारे में बहुत सी बाते कहीं गई हैं-कहा जाता है कि इंसान पैदा होते ही अपने कर्मो का सारा फल अपने साथ लेकर आता है. यह भी कहा जाता है कि जिसके किस्मत में जो हैं उसे मिलकर ही रहेगा. यह भी कहा गया है कि मनुष्य को अपने कर्मो का फल भी इसी जन्म में भोगना पड़ता है.हम जब ऐसी बातों को  सुनते हैं तो लगता है कि कोई हमें उपदेश दे रहा है या फिर ज्ञान बांट रहा है, किन्तु जब हम इसे अपने जीवन में ही अपनी आंखों से देखते व सुनते हैं तो आश्चर्य तो होता ही है कि वास्तव में कुछ तो है जो सबकुछ देखता सुनता और निर्णय लेता है. यह बाते हम उस व्यक्ति के बारे में कह रहे हैं जिसने पिछले साल पैसे न होने के चलते अपनी पत्नी की लाश को 10 किलोमीटर तक पैदल अपने कंधे पर ढोने के बाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया था. ओडिशा के गरीब आदिवासी दाना मांझी की जिंदगी साल भर में अब पूरी तरह बदल चुकी है. उसकी गरीबी अब उसका पीछा छोड़ चुकी है.इसी सप्ताह मंगलवार पांच तारीख को मांझी कालाहांडी जिले के भवानीपटना से अपने घर तक उस होन्डा  बाइक पर सफर करता हुआ पहुंचा ,जिसे उसने शो रुम से 6...

ऐसे लाकर जिसमें रखे पैसे की कोई सुरक्षा नहीं!

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14 सिंतंबर 2004 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर मेेंं  दिन-दहाड़े सुबह करीब साढ़े दस बजे शहर के मुख्य मार्ग स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंदौर से पाँच करोड़ रुपए लूट लिए गये थे. यह बहुत बड़ी लूट थी तब से अब तक का लम्बा समय गुजर गया लेकिन न बैंक वाले चेते न पुलिस और न प्रशासन. सुरक्षा व्यवस्था में कोइ्र्र तब्दीली नहीं हुई. इसके बाद से अब तक पूरे छत्तीसगढ़ में बैंक डकैतियों का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ा है लेकिन सुरक्षा का मामला तब गर्म होता है जब फिर कोई वारदात होती है.छत्तीसगढ़ में अभी दो दिन पहले हुई दो डकैतियों के बाद से मामला फिर गर्म है. बैकों की सुरक्षा व्यवस्था पर जहां गंभीर सवाल उठे हैं वही लाकरों पर भी सवाल खड़े किये गये हैं. इतने नियम-कानून के बाद भी हमारा पैसा बैंकों मेें कितना सुरक्षित है? यह सवाल उस समय ठठता है जब बैंक में कोई हादसा होता है. लोग अपने मेहनत की कमाई को चोरों से बचाने के लिये बैंक का सहारा लेते हैं यह मानकर कि उनका पैसा यहां सुरक्षित रहेगा.बैकों में खाता खुलवाने से पहले बड़ा सा आवेदन पत्र ठीक उसी तरह भरवाया जाता है जिस तरह विद्युत मंडल वाले बिजली का मीटर देने क...

ट्रेन दुर्घटनाओं की कड़ी बढ़ रही है फिर भी खाली पड़े है एक दशमलव इकत्तीस लाख पद !

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ट्रेन दुर्घटनाओं की कड़ी बढ़ रही है फिर भी खाली पड़े है एक दशमलव इकत्तीस लाख पद !  यूपी के चित्रकूट के पास हुए आज सुबह करीब चार बजकर तीस मिलिट पर एक ट्रेन हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई और नौ घायल हो गए हैं. ये हादसा मानिकपुर स्टेशन पर हुआ है. रेल मंत्रालय ने हादसे में मरनेवाले के परिवार को 5 लाख और गंभीर रूप से घायलों को 1 लाख रुपये और घायलों को पचास हजार रुपये के मुआवजे का एैलान किया है.बताया जा रहा है कि वास्को-डि-गामा पटना एक्सप्रेस पटरी से उतर गई. इस हादसे में ट्रेन के 13 डिब्बे पटरी से उतरे जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई. जब रेल लाइनों की निगरानी के लिये आदमी ही नहीं है तो कैसे नहीं होगी ऐसी घटनाएं? इस और इससे पहले हुई दुघटनाओं के परिपे्रक्ष्य में यह सवाल इसलिये उठर चूंकि रेलवे बोर्ड के अफसरों  ने यह बात स्वीकार की है कि रेलवें  में ट्रेन पातों की निगरानी के लिये लगाये जाने वाले आदमियों की कमी है. इस काम के लिये अभी करीब साठ हजार गेंगमेनों की जरूरत है और यह पद खाली पड़े हैं. हमारी ट्रेनें गेंगमेनों के बगैर कैसे पटरियों पर दौड़ रही है और हम कितने सुरक्षित हैं इ...

यह अकेले फोर्टिस अस्पताल का मामला नहीं!

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गुडग़ांव के फोर्टिस हॉस्पिटल में डेंगू से पीडित एक सात साल की बच्ची को पन्द्रह दिनों तक भर्ती करके उसका इलाज किया गया और उसके बाद उसकी मौत हो गई इसके बाद परिवार पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. बच्ची को पन्द्रह दिन तक इलाज करने के नाम पर परिवार पर करीब अठारह लाख  रूपये का बिल थमा दिया.यह सुनकर ही एक आदमी का कलेजा सूख जाता है किन्तु अगर बच्ची पर इतना पैसा खर्च करने के बाद ठीक हो जाती तो शायद किसी को इतना ऐतराज नहीं होता. इलाज के बाद परिवार खुशी खुशी बच्ची को अपने घर ले जाते लेकिन इलाज के बाद भी इतनी रकम की वसूली किसे रास आयेगी?. यह तो  बच्ची के पिता जयंत सिंह के दोस्त का टिवटर एकाउंट था जिसने इस पूरे मामले को देश के बड़े स्वास्थ्य मंत्री के कानो  तक पहुुंचा दिया वरना अस्पतालों में होने वाली इस तरह की बड़ी बड़ी घटनाओं की तरह यह भी यूं ही दब जाता. जो बात इस पूरे मामले में सामने आई है उसके अनुसार जयंत सिंह की 7 साल की बेटी डेंगू से पीडि़त थी और वह  इलाज के लिए 15 दिन तक फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती रही. हॉस्पिटल ने इसके लिए उन्हें 18 लाख का बिल थमा दिया। इसमें 2...

हम बस सत्तर सालों से 'आजाद हैं!

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लोकतंत्र का बड़ा पर्व चुनाव अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां आम आदमी के मुकाबले ज्यादातर पैसे वालों व बाहुबली की भागीदारी हो रही है. गरीब, मजदूर और किसान की कोई पूछ नहीं होती, क्योंकि इस पर्व में सिर्फ पैसा बोलता है. अगर अवैध धन की बात छोड़ भी दें तो आधिकारिक रूप से भी चुनाव में उम्मीदवारों को 28 लाख रुपये तक खर्च करने की छूट दी गई है. समानता -सर्वकल्याण जैसी संकल्पना लोकतंत्र की मूल भावना में निहित हैं किन्तु चुनाव के दौरान आम आदमी जिसके मतों से चुनकर सरकार का अस्तित्व कायम होता है वह किनारे लगकर सिर्फ नारेबाजी करने और लाइन में लगकर अपने संविधान प्रदत्त अधिकार का उपयोग करने का साधन मात्र रह जाता है. पूरे पांच साल तक चुनकर भेजने वालों में से बहुत लोग जहां जनता के पैसे से सुख सुविधाएं भेागते हैं और बेचारा वह व्यक्ति जो वोट देने के बाद उस किसान की तरह हो जाता है जो कभी  बारिश न होने से आसमान की तरफ ताक लगाये बैठा रहता है. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाते हुए हम यह तो इंगित करना चाहते हैं कि चुनाव में खर्च की सीमा तय करते समय उसे यह भी ध्यान में रखना चाहिए था कि क्या ...

युवा पीढ़ी के दिमाग में सिर्फ किताबी किस्से ही क्यों?

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आजादी के बाद के कई वर्षो तक प्राथमिक शिक्षा का जो माहौल था वह बच्चों में थोड़ा या कहीं -कहीं  ज्यादा डर पैदा कर कुछ सिखाने का रहता था. मंशा यह रहती थी कि बच्चा पढ़ाई के साथ कुछ ऐसा भी सीख ले कि वह आगे जाकर किसी कारणवश पढ़ाई छोड़ भी दे तो उसे जो बुनियादी सीख दी गई है वह उसके आधार पर अपना व्यवसाय उद्योग खेती कर अपना व अपने परिवार को पाल सके किन्तु आगे आने वाले वर्षो में यह सोच खत्म हो गई. बुनियादी शिक्षा के नाम पर पूर्व के कई स्कूलों में पढ़ाई के साथ साथ हस्तशिल्प, चित्रकारी खेलकूद, व्यायाम स्काउट, एनसीसी आदि के भी प्रशिक्षण का बोलबोला था. व्यावसायिक शिक्षा पद्वति अपनाने से छात्रों की पुस्तकों के प्रति होने वाली कथित बोरियत बहुत हद तक कम हो जाती थी. वैसे हम पूरे तौर पर यह नहीं कह सकते कि स्कूलों ने पुस्तकों के बोझ के परिप्रेक्ष्य में  पुरानी पढ़ाई की पद्वति को पूरी तरह तिलांजलि दे दी लेकिन इसका स्वरूप बदल गया. सरकारों ने इसे बहुत हद तक अलग कर इसके अलग-अलग विंग बना दिये या कहीं कहीं तो इसके अलग विभाग ही स्थापित कर दिये. बच्चे जो पहले पढ़ाई के साथ बुनाई, कढ़ाई, कला चिंत्राक...

कोई दलील नहीं, कोई सुनवाई नहीं- फैसला ऑन द स्पॉट!

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हमारे आसपास होने वाली कुछ घटनाओं को सुनकर या देखकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है और उस कानून पर भी तरस आता है जिसके रहते मनुष्यों या जानवरों पर जुर्म करने वालों पर कार्रवाई नहीं होती. हाल ही बिहार के अजासैरा जिले की ग्राम पंचायत में एक व्यक्ति जिसका नाम महेश ठाकुर है को कथित रूप से बिना अनुमति के घर में घुसकर आने के लिए इतनी बड़ी सजा दी कि वह किसी के मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा, जिसने भी सुना वह दहल उठा. वह दिन दीवाली का था और उस दिन पूरा देश खुशियां मना रहा था तथा भगवान राम के अयोघ्या वापसी की खुशी में पटाखें फोड़ रहा था तभी नालंदा पंचायत के फरमान पर एक शख्स लोगों के थूक चाटकर अपनी सजा पूरी कर रहा था। कसूर यह था कि दिवाली के मौके पर वह बिना दरवाजा खटखटाए सुरेन्द्र यादव के घर के अंदर आ गया। उसे यह नागवार गुजरा और बुरा भला कहते हुए महेश ठाकुर नामक शख्स को मुखिया दयानंद मांझी के घर ले गया जहां सरेआम गांववालों के सामने बेइज्जत तो किया गया साथ ही वहां मौजूद मुखिया ने सजा सुनाकर उसे अपना थूक चाटने के लिए मजबूर किया इतने पर भी यह सजा पूरी नहीं हुई, महिलाओं ने उसे चप्पलें मारीं। पीडि़त व...

ढोल बजा नहीं,शोर गूंजने लगा!

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ढोल बजा नहीं,शोर गूंजने लगा! जी हां कुछ ऐसी ही स्थिति है गुजरात चुनाव की.चुनाव आयोग ने अभी गुजरात में चुनाव तिथियों का ऐलान नहीं किया है किन्तु इस बीच गुजरात को फतह करने  जोड़तोड़ शुरू हो गई है. जनता जिसे सबकुछ करना है वह शांत व मूक दर्शक है लेकिन सत्ता पर काबिज होने के लिये बेताब रणबाकुरे कोइ्र्र भी खेल इस दौरान  खेलने बेताब हैं. यह कोशिश वास्तव में  दिलचस्प है. गुजरात की सत्ता से कई सालों से बेदखल कांग्रेस को जहां इस बार गुजरात से काफी उम्मीद है वहीं उसके शुरूआती दाव पैच भाजपा को बैचेन कर रही है. प्रधानमंत्री के गृह राज्य में होने वाले इस चुनाव में उनकी दिलचस्पी स्वाभाविक है वहंी उनकी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है.इससे पूर्व यूपी में चुनाव हो चुका है जहां कांग्रेस व समाजवादी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था. बात यहां कुछ उलटी ही है. वह समय लहर का था लेकिन अब काम देखा जाने वाला भी हो सकता है.वोटरों को रिझाने सारे प्रयास जहां तेज हैं वहीं खीचतान का सिलसिला भी जारी है. मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की वजह से गुजरात के व्याप...

भारत में 19 करोड़ लोग रोजाना भूखे पेट सोते हैं

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 देश में चार में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है।   58 फीसदी बच्चों की ग्रोथ 2 साल से कम उम्र में रुक जाती है  ...और दूसरी और वीवीआईपी संस्कृति में जीने वाला एक पूरा कुनबा भी है जो हीरे और सोने से लदा है फिर भी खुश नहीं! इतनी सुविधाएं कि आंखे फटी रह जाये ! हम भले ही अपने आपको विश्व के बड़े देशों के समकक्ष स्थापित करें लेकिन हकीकत हमही जानते हैं कि हमारे देश का एक बड़ा समुदाय नंगा, भूखा और बहुत गरीब है जबकि मुट्टीभर लोगों के हाथ में बहुत कुछ आ गया है और वह देश की जनता को उंगलियों पर नचाने की ताकत भी रखता हैं. हां हम जिस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं उसमें सत्तासीन कई लोगों की सपंत्ति से दूसरे देशों की तुलना करेंं तो यह उनसे कई गुना है जबकि जिनकी मदद से वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं वे उनके सामने एकदम बौने हैं. आजादी के बाद के वर्षो में ऐसे लोगों की संपत्ति मेंं जो इजाफा हुआ है वह आश्चर्यजनक ,अविश्वसनीय है शायद यही कारण है कि देश में राजनीतिक दलों में घुसने और कुर्सी पाने की होड़ सी मची हुई है.इसमें भी वे लोग हैं जिसके पास अकूट संपत्ति है या जिनक...

आखिर हत्यारें कौन? क्यों मिली निर्दोष को सजा

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यह विचित्र बात है कि नौ साल बाद भी हमारे देश की जांच एजेंसिया यह पता नहीं लगा पाई कि बाहर से  बंद बंगले में रह रहे चार लोगों के बीच रह रहे दो व्यक्तियों की सनसनीखेज ढंग से की गई हत्या का  असली मुलजिम कौन हैं.सवाल यह उठता है कि क्या यह मामला भी अब उन पुराने मामलों की तरह गुमनामी में चला जायेगा जिसमें वास्तविक हत्यारों का पता लगाने या साक्ष्य प्रस्तुत करने में एजेंसियां विफल हो गई. कई मामलों में तो वास्तविक हत्यारें छुट्टा घूम रहे होते हैं जबकि डमी या निर्दोष पेश किये गये साक्ष्यों के आधार पर सजा भुगत रहे होते हैं.आरूषी-हेमलाल हत्याकांड में निचली अदालत ने आरूषी के माता पिता को उम्र कैद की सजा सुनाई थी जिसके विरूद्व उनके वकीलों ने हाईकोर्ट  में अपील की और हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में उन्हें बरी कर दिया. इस दौरान जो मानसिक व शारीरिक यातानांए इस परिवार को झेलनी पड़ी उसका जिम्मेदार कौन है? दूसरा प्रशन यह कि अगर आरूषी और हेमलाल की हत्या इन दोनों ने नहीं की तो किसने की? यह अब कभी पता चल पायेगा? कई ऐसे प्रश्न इस फैसले के बाद लोगों के दिमाग में कौद रहे हैं और पुलिस की जांच प्र...

जनता के मूड पर निर्भर रहेगा अब का चुनाव!

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जनता के मूड पर निर्भर रहेगा अब का चुनाव! इस साल के आखिर तक होने वाला गुजरात विधानसभा का चुनाव यह बतायेगा कि अगले चुनावों में देश की दिशा क्या होगी? क्या भाजपा अगले सालों में सता पर बनी रहेगी? क्या अहमद पटेल की जीत के बाद गुजरात में माहौल बदला है? कांग्रेस इसी उत्साह से मैदान में उतरेगी कि उसे यहां  फिर सत्ता में आसीन होने का मौका मिलेगा. भाजपा- कांग्र्र्रेस के बीच जहां टक्कर होगी वहीं  तीसरी पार्टी के रूप में आम आदमी भी मैदान में उतरकर आगे के लिये अपनी रणनीति व किस्मत दोनो आजमा सकती है. गुजरात विधानसभा चुनाव जहां भाजपा के परफोरर्मेंस की नापझोक करेगा वहीं कांग्रेस को यह संदेश देगा कि उसकी किस्मत में आगे क्या लिखा है. असल में विधानसभा का यह चुनाव न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए भी यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है. दोनों सियासी महारथी इसी राज्य से आते हैं, इसलिए इन्हीं दोनों के कंधों पर गुजरात चुनाव का दारोमदार भी टिका है.वैसे गुजरात का माहौल पिछले वर्षो में बदला है. पटेल आंदोलन को ठीक से हैन्डिल न कर पाने के कार...

दंडधारी, चौकीदार, दरोगा से 'पुुलिस तक का सफर कितना सफल?

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प्राचीन भारत का स्थानीय शासन मुख्यत:  ग्रामीण पंचायतों पर आधारित था गाँव के न्याय एवं शासन संबंधी कार्य ग्रामिक नामी एक अधिकारी द्वारा संचलित किए जाते थे. इसकी सहायता और निर्देशन ग्राम के वयोवृद्ध करते थे. पुलिस व्यवस्था के विकासक्रम में उस काल के दंडधारी को वर्तमान काल के पुलिस जन के समकक्ष माना जा सकता है यह ग्रामिक राज्य के वेतनभोगी अधिकारी नहीं होते थे वरन् इन्हें ग्राम के व्यक्ति अपने में से चुन लेते थे. ग्रामिणों के ऊपर 5-10 गाँवों की व्यवस्था के लिए गोप एवं लगभग एक चौथाई जनपद की व्यवस्था करने के लिए स्थानिक नामक अधिकारी होते थे.इन निर्वाचित ग्रामीण अधिकारियों द्वारा अपराधों की रोकथाम का कार्य सुचारु रूप से होता था और उनके संरक्षण में जनता अपने व्यापार उद्योग-निर्भय होकर करती थी.हिन्दू काल के बाद सल्तनत और मुगल काल में भी ग्राम पंचायतों और ग्राम के स्थानीय अधिकारियों की परंपरा अक्षुण्ण रही.मुगल काल में ग्राम के मुखिया मालगुजारी एकत्र करने, झगड़ों का निपटारा आदि करने का महत्वपूर्ण कार्य करते थे और निर्माण चौकीदारों की सहायता से ग्राम में शांति की व्यवस्था स्थापित की जाती थी....

स्वच्छ भारत अभियान के तीन साल ...!

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स्वच्छ भारत अभियान के तीन साल ...! भले ही हम दावा करें कि स्वच्छता के मामले में हमने बहुत कुछ कर लिया है किन्तु हकीकत यही है कि अभी हमें बहुत कुछ करना है.आज सुबह जब मैं मार्निंग वाक पर निकला तो मुझे इस बात का एहसास हुआ कि इतना सब कुछ होने के बाद भी लोग जागरूक नहीं है. हम राजधानी मे रह रहे हैं और यहां की  गरीब बस्ती में रहने वाले आज भी शौचालय के अभाव में बोतल और लौटा लेकर खुले मैदान का सहारा ले रहे है किन्तु इसके बावजूद पिछले तीन वर्षों में स्वच्छता को लेकर समाज में एक सकारात्मक माहौल बना है किन्तु अभी भी बहुत कुछ करना है. सबसे पहली बात तो यह कि गंदगी फैलाने की आदत से बाज नहीं आने वालों के प्रति थोड़ी बहुत सख्ती जरूरी है उसके बगैैर इस मिशन के पूरा होने की संंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंभावना कम है. कागजी तौर पर देखा जाये तो  सफाई देश के एजेंडे पर आ गई है. सर्वे के अनुसार शहरों और कस्बों के करीब आधे लोगों ने माना है कि पिछले तीन वर्षों में स्वच्छ भारत स्कीम का ठीकठाक असर उन्हें अपने आसपास देखने को मिला है लोग यह भी मान रहे हैं कि एकदम से तो सबकुछ नहीं बदला  है, मगर...