शनिवार, 18 सितंबर 2010

खरगोश प्रजाति के मानव, जोजीने के लिये सब करते हैं...!

रायपुर दिनांक 19 सितंबर
खरगोश प्रजाति के मानव, जो
जीने के लिये सब करते हैं...!
जानवरों में खरगोश एक ऐसा मूक् प्राणी है जो कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। आप कुछ भी कर लो वह आपके हाथ में चुपचाप बैठा रहेगा। उसे नोचों, दुखाओं तो भी उसके मुंह से आवाज़ नहीं निकलती। सरकारी महकमे में भी खरगेश की तरह के कुछ मानव हैं, जो उनकी भांति चुप रहते हैं। इन मानवों को जो काम सौपा जाता है। उसे बिना किसी विरोध के कर डालते हैं। होम गार्ड नाम का यह मानव सरकार के हर मर्ज की दवा है- साहब के घर सुरक्षा गार्ड से लेकर घर के प्राय: कामों में तो यह भागीदार होते ही हैं, इन्हें महत्वपूर्ण ड्यूटियों में भी पुलिस के साथ लगाया जाता है, लेकिन इन बे चारों को तनख्वाह सबसे कम मिलती है। गांव से कम पढ़े लिखे बेरोजगारों को ढूंढकर इस काम में लगाया जाता है। दिखने में यह पुलिस वालों से कम नहीं है लेकिन काम इनसे जो करा लो। बेचारे उफ तक नहीं करते। कई को सुरक्षा ड्यूटी के अलावा ट्रैफिक सम्हालने,पुलिस वालों की मदद करने व साहबों की चाक री के लिये लगाया जाता है। कुछ दफ्तर में तो, कुछ घरों पर। ऐसे ही इनकी पूरी नौकरी कट जाती है। फलाने साहब के घर से मैं होमगार्ड बोल रहा हूं या फलाने मंत्री के बंगले से मैं होमगार्ड बोल रहा हूं, जैसी आवाज आपको अक्सर सुनने को मिल जाती है। इन्हे तनख्वाह के मामले में भी अन्य सुरक्षा बलों के मुकाबले कम की ही गिनती में रखा जाता है। पुलिस को जो अधिकार दिये गये हैं। वैसे अधिकार इन्हें प्राप्त नहीं हैं। एक होम गार्ड ने शिकायत की- साहब हमारे दर्द को कोइ नहीं सुनता। हमारी चुनाव ड्यूटी मध्यप्रदेश में लगी थी। हमें इसके लिये सिर्फ भत्ता सौ रूपये दिया गया। जबकि छत्तीसगढ़ में चुनावी ड्यूटी पर हमें चार सौ रूपये दिया जाता है। हम इस भेदभाव पर चूप इसलिये भी हैं कि किसी से बोलने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो जाती है। हमने इस मामले में संतोष इसलिये कर लिया। चूंकि हमारे साथ ड्यूटी पर गये पुलिस वालों को भी इतना ही पैसा दिया गया। होम गार्ड की तरह एक दूसरा वर्ग भी है जो खरगोश की श्रेणी में आने वाला दूसरा वर्ग है। अर्दली कह लाने वाला यह वर्ग बड़े अफसरों के घर में मेम साहब के कपड़े धोने और बच्चों को खिलाने से लेकर साहब के कपड़े प्रेस करने व जूते साफ करने तक का काम करता है। यह प्रथा सिविल सर्विसेज के मुकाबले सेना में ज्यादा है। यहबेरोजगार मजबूर वर्ग है, जो अर्दली के काम में लगता है। उसे इतना समय भी नहीं मिलता कि वह अपने परिवार के साथ समय बितायें। अर्दली प्रथा या सरकारी सेवक से घर का काम लेने का चलन वर्षो से चला आ रहा है। अँग्रेज़ तो इसका भरपूर उपयोग करते रहे। अर्दली प्रथा को बंद करने की लाख कोशिशें की गई, लेकिन इसे बंद नहीं किया जा सका। सरकारी काम से लूप लाइन में डाले गये अधिकांश लोग इस ढंग के अत्याचार के शिकार होते हैं। ब्यूरोके्रटस की सेवा के लिये लगा ये जाने वाले इन कर्मियों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं...क्योंकि यह मानव होते हुए भी खरगोश प्रजाति के हैं।