सोमवार, 27 सितंबर 2010

थल,वायु,जल सबसे तो ले ली दुश्मनी

रायपुर दिनांक 27 सितंबर 2010

थल,वायु,जल सबसे तो ले ली दुश्मनी,
अब तैयार रहो परिणाम भुगतने..!
जाने-अनजाने में हम धरती को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं और जल वायु को कितना दूषित कर रहे हैं -क्या कभी इसकी कल्पना की है? हमने कल्पना की भी होगी तो हम अपने लोगों के सामने ही इस मामले में बे बस हैं। चूंकि जानते हुए भी लोगों को इसकी चिंता नहीं हैं। हम आमने- सामने होने वाले रोज़मर्रा कामों पर एक नजर डालें तो यह बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है कि हम जिस धरती में सोना उगाते हैं। उसी धरती पर कई जगह बुरी तरह गंदगी फैला प्रदूषित कर उसका अपमान कर रहे है। अपनी धरती को हम मां कहकर पुकारते हैं और उसी मां के सीने पर गंदगी फैला कर यातना दे रहे हैं। क्या यही हाल हमारी नदियों व तालाबों का नहीं है? जहां हर साल अपने धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर वह सब कुछ उस मां रूपी नदियों के साथ करते हैं, जो नहीं करना चाहिये। हाल ही संपन्न मूर्ति विसर्जन के बाद किये गये एक आकलन में कहा गया है कि मूर्तियों के विसर्जन से नदी के पानी में इतना रसायन घुल मिल गया है कि वह न पीने लायक रहा और न ही नहाने लायक। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो नदियों के प्रदूषण से लोगों को न केवल अलग- अलग किस्म की बीमारियों से पीड़ित होना पड़ेगा। वरन हमारे समक्ष निस्तारी व अन्य कई किस्म की समस्याएं उत्पन्न हो जायेगी। नदियों के जल को सदैव पवित्र माना जाता रहा है, किंतु मानव उपयोग की बढ़ोत्तरी और आस्थाजन्य कर्मो के चलते न केवल गंगा मैली हो गई बल्कि देश में बहने वाली प्राय: सभी प्रमुख व सहायक नदियों भी मैली हो गई। नदियों की तरह धरती को भी इस ढंग से रसायन युक्त किया जा रहा है कि आने वाला समय यह इंसानों के रहने लायक नहीं रह जायेगा। धरती अनाज उगाना बंद कर देगी और वायु, जल प्रदूषण का बढ़ता दायरा हर वर्ग के लिये खतरनाक होता जायेगा। न्यूयार्क टाइम्स में हाल ही प्रकाशित एक रिपोर्ट पर अगर गौर किया जाये। तो यह आने वाले भीषण संकट का एक संकेत मात्र है। रिर्पोट में कहा गया है कि विकासशील देशों में हर साल लगभग 20 लाख लोग चूल्हे के धुएं से होने वाली फेफड़े की बीमारियों के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। ओबामा प्रशासन ने हाल ही एक प्रोजेक्ट की घोषणा की है जिसके तहत अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के गांवों में दस करोड़ धुआंरहित स्टोव वितरित किए जाएंगे। ये स्टोव एक बड़ी आबादी को भोजन पकाने या पानी गर्म करने के लिए लकडिय़ां, भूसा और कोयला जलाने से निजात दिलाने का प्रयास है। भारत जैसे विकासशील देश में हर कदम पर प्रदूषण है। कहीं धूल है कहीं गंदगी, कहीं रसायन तो कहीं पानी में गंदगी से उपजा प्रदूषण। ध्वनि प्रदूषण भी एक समस्या है। भारत में चूल्हे से निकलने वाले धुएं के दुष्प्रभावों पर कभी ध्यान दिया गया हो , इसकी जानकारी नहीं किंतु यह धुआँ न्यूमोनिया से लेकर फेफड़े का कैंसर जैसी बीमारियाँ तक को आमंत्रित कर सकती हैं। ये चूल्हे ग्लोबल वार्मिंग को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा थल- जल और वायु को भी प्रदूषित कर हमने अपना दुश्मन बना लिया है।