शनिवार, 25 सितंबर 2010

हर चार दिन में वस्तुओं के दाममें वृद्वि !

रायपुर दिनांक 25 सितंबर 2010
हर चार दिन में वस्तुओं के दाम में वृद्धि,कैसे
महँगाई कम करने की बात करते हैं!
चार दिन पहले शरीर में लगाने की एक दवा चौंसठ रूपये में खरीदी। दो दिन बाद यही दवा सत्तर रूपये की हो गई। पैक की हुई वस्तुओं पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। कंपनियां जब मर्ज़ी आती है तब भाव बढ़ा देती हैं जिसका असर अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर पड़ता है। सरकार की कोई पकड़ पैक वस्तुएँ बेचने वाली कंपनियों पर नहीं हैं। चूंकि कंपनियों से सरकार या पार्टियों को चंदा मिलता है। उपभोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग खुली वस्तुओं की जगह पैक- सील बंद वस्तुओं को लेने में ही अपना व अपने परिवार की भलाई समझता है। उपभोक्तओं की इस मानसिकता का पूरा फायदा कंपनियां उठा रही हैं। आम उपभोक्ता के इस बदले रू ख का फायदा चिल्हर दुकानदारों ने भी उठाना शुरू कर दिया है। वे हल्दी, मिर्च, धनिया जैसी रोजमर्रा उपयोग में आने वाली वस्तुओं को अपने पैक में डालकर बाजार में अनाप- शनाप भावों पर उतार रही है- इसमें पैक वस्तु अधिनियम का पालन नहीं होता। उपभोक्ताओं को इस लूट से बचाने का प्रयास आज तक किसी स्तर पर नहीं हुआ। सरकार बढ़ी महँगाई के लिये देश के कई इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ को जिम्मेदार मानती है। सरकार का कहना है कि बारिश और बाढ़ के चलते आपूर्ति बाधित होने से खाद्यान्न कीमतों में लगातार चौथे सप्ताह वृद्धि हुई। 11 सितंबर को समाप्त- सप्ताह में महँगाई बढ़कर 15.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे पिछले सप्ताह खाद्य महँगाई दर 15.10 प्रतिशत थी। मोटे अनाज, चुनिंदा सब्जियों और दूध की कीमत में तेज बढ़त दर्ज की गई। अर्थशास्त्री बिना कोई कारण बताए यही रट लगाये हुए है कि बारिश के थमते ही कीमतों में नरमी आएगी। महँगाई पर सरकार को कोई ठोस सुझाव देने की जगह अर्थ शास्त्री बाढ़ और बारिश को जिम्मेदार मानते हुए कोई सुझाव सरकार को नहीं देते। रेलीगेयर कैपिटल मार्केट्स के मुख्य अर्थ शास्त्री जय शंकर का कहना है कि आपूर्ति प्रभावित होने से मांग और आपूर्ति के बीच अंतर पैदा हो गया है। इस वर्ष जून के बाद अब दिसंबर में महँगाई कम होने की बात की जा रही है। अर्थ शास्त्री भी महँगाई के बारे में कुछ सरकारी भाषा में ही बात कर रहे हैं। पता नहीं उनके पास कौन सी जादू की छड़ी आ गई, जो दिसंबर में महँगाई कम कर देगी? ऐसा लगता है कि विशेषज्ञों का सारा दारोमदार बंद कमरे में अनुमान और आंकड़ों पर निर्भर रहता है। नवंबर- दिसंबर में यूं ही फसल कटने का समय आ जाता है। तब महंगाई तो अपने आप ही कम होना है। यही बात विशेषज्ञ कहते हैं कि दिसंबर के अंत तक आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। दाल, चावल और गेहूं की कीमतें ऊंची होने से वार्षिक आधार पर मोटे अनाज की कीमतें 6.75 प्रतिशत ऊंची है। इस बीच दालें 4.01 प्रतिशत, गेहूं 9.21 प्रतिशत और चावल 5.52 प्रतिशत महंगी हैं। अन्य खाद्य वस्तुओं में दूध 23.41 प्रतिशत और फल 10.33 प्रतिशत तक ऊंचे हो गए हं। सब्जियों भी औसतन 6.84 प्रतिशत महंगी हुईं। आलू की कीमत में 48.56 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई है। अर्थशास्त्रियों ने महँगाई दर में बढ़त के रुख की वजह मूल्य सूचकांक की नई सीरिज़ को बताया हैं। क्योंकि पुरानी सीरीज 1993-94 की कीमतों पर आधारित थी, जबकि नई सीरिज़ 2004-05 की कीमतों पर आधारित है। महँगाई के संबंध में विशेषज्ञों व सरकार दोनों का रवैया उपभोक्ताओं को लॉलीपॉप दिखाने जैसा है। महँगाई आज घट जायेगी, कल घट जायेगी कहते हुए पूरा साल निकल गया किंतु महँगाई देश में ज्यों की त्यों है। महँगाई से सर्वाधिक मध्यमवर्ग का उपभोक्ता प्रभावित हो रहा है।