रौशनी पर मंहगाई....बिजली का बिल या गले का फंदा?



रोजमर्रा की भाषा में बात करें तो हमें रोज कई प्रकार के लेन -देन के लिये हमें पहले बिल दिया जाता है फिर हम उसका भुगतान करते हैं किन्तु छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल द्वारा जारी किया जाने वाला बिजली का बिल इन सब बिलों में अनोखा है-करीब सोलह इंच लम्बे इस बिल को न तो कोई समझ सका है और न  समझ पाता है. वास्तविकता यही है कि यह किसी भी आम आदमी के न तो पल्ले पड़ता है और न पड़ सकता है. यहां तक कि पड़े लिखे लोगों के भी पल्ले नहीं पड़ता. बिजली बिल हर माह पहुंचता है. किसी माह बराबर आता है तो किसी माह उसमें दुनियाभर का मीटर चार्ज,सर्विस टैक्स,फिक्सेड डिपाजिट और फलाना ढिकाना मिलाकर उपभोक्ता का ब्लड प्रेशर बढा देता हैं. बिल ऐसा लगता है जैसे गले में डालने के लिये फंदा भेज दिया हो.अगर किसी के घर में  एक मीटर हो तो सोलह इंच लम्बा एक फंदा और अगर किसी के घर में दस मीटर लगा हो तो सोलह- सोलह इंच के दस फंदे पहुंच जाते हैं. यह आज से नहीं वर्षो से यूं ही चला आ रहा है. मशीन से घर पर बिल देने से पहले एक कापी के कागज साइज का छोटा बिल आता था उसे तो लोग कुछ पड या समझ भी लेते थे किन्तु अभी का बिल सुविख्यात हिन्दी और अंगे्रजी के विशेषज्ञों द्वारा तैयार कर तकनीकी क ठोर भाषा का प्रयोग कर परोसते हैं. शायद इसलिये भी कि कोई इसे आसानी से समझकर विद्युत मंडल के दफतर न पहुंच जाये. बात सही भी है जब किसी को समझ में आये तब तो वह विवाद करें! विद्युत भगवान के इस बिल के आगे लोगों के सामने बस एक ही चारा रहता है कि वह चुपचाप विद्युत नियामक आयोग का बिल दोनों हाथों से ग्रहण करें और चुपचाप जितने का बिल आया है उसे नेट से या विद्युत नियामक आयोग की दुकान लगाये बैठे लोगो के हाथ में थमाकर पैसा पटा दे. हां चिल्हर जरूर साथ में रखे नहीं होने पर उसे भी या तो काटकर वहीं रख लिया जाता है या फिर जोड़कर दूसरे बिल में दे दिया जाता है.इस तरह अद्भुत विद्युत बिल जारी करने वाले विद्युत मंडल ने एक अप्रेल से फिर बिजली की दरें बढ़ा दी है यह ज्यादा बिजली उपभोग करने वाले उद्योगपतियों के लिये राहत देने वाला है तो उन गरीब लोगों के लिये मुसीबत खड़ी कर देने वाला है जो  शून्य से लेकर सौ यूनिट का उपयोग भी मुश्किल से करते हैं.हमारे प्रदेश में बिजली का उत्पादन इतना होता है कि हमें किसी से कटोरा लेकर मांगने नहीं जाना पड़ता, हम दूसरो को देते हैं और उनसे इसकी  एवज में पैसा भी वसूल करते हैं. कोयला हमारा, पानी हमारा संयंत्र हमारे और श्रम शक्ति हमारी- सब कुछ हमारा-हम स्वंय विद्युत उत्पादन करते हैं.  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही गर्व से यह घोषणा की थी कि हम बिजली किसी से लेने वाले नहीं देने वाले हैैं-हमे इस बात पर गर्व करना चाहिये लेकिन क्या बिद्युत मंडल का नियामक आयोग इस प्रदेश के लाखों करोड़ों लोगों के दर्द को महसूस करता है? इस अंचल के वासियों के लिये सिर्फ  रोशनी ही एक आवश्यकता नहीं है. तन ढकने के लिये कपड़े और सिर छिपाने के लिये छत के साथ उसे  हर महीने एक बहुत बड़ी रकम अन्य आवश्यक उपभोक्ता मदो पर भी खर्च करनी पड़ती है.ऐसी चीजो के दाम भी आज रौशनी से भी दुगनी है. विद्युत मंडल हर महीने की 22 और पच्चीस के बीच बिल पटाने का आदेश देता है्र नहीं पटाओ तो बडों की बिजली तो नहीं कटती लेकिन छोटे विद्युत उपभोक्ता जरूर उसकी चपेट में आ जाते हैं.. एक आम आदमी जो महीने में दस से बीस हजार रूपये कमाता है वह किस प्रकार सबसे बड़ी आवश्यकता बिजली का दर्दभरा मंहगा बिल पटायें? उसके सर  पर यह अकेला बिल  नहीं  रहता. घर का किराया, बच्चों की  फीस, टेलीफोन -मोबाइल के बिल, कपडे,स्वास्थ्य,गैस, पेट्रोल ओर न जाने ऐसे बिलो की समस्याएं भी रहती है. विद्युत विनायक ने अपनी  बात कहते हुंए और अपनी समस्याएं रखते हुए लोगों के सामने अपनी बढ़ी हुई चौदह प्रतिशत की दर को रख दिया लेकिन उसने लोगों के दर्द को न समझने की कोशिश की और न ही दूसरे स्त्रोतो से अपने  खर्चे का उपाय खोजने की कोशिश की.विद्युत अधिनियम 2002 की धारा 62के अंतर्गत बिजली की दरों का निर्धारण कर दिया गया है. चौदह प्रतिशत की बढ़ी हुई दरें अप्रेल फूल के दिन से लागू भी हो गई है.विद्युत नियामक आयोग ने दरों का निर्धारण करते समय प्रस्तावित सिद्वान्तों के अनुसरण की दुहाई दी है लेकिन क्या वास्तव मे छत्तीसगढ़ की गरीब जनता इस बडे हुए बोझ को अन्य बड़े हुए बोझ के साथ सहन करने को तैयार है? विद्युत मंडल वास्तव मे इस प्रदेश का सबसे कमाऊ विभाग है उसे ऐसे समय जबकि भीषण सूखे और अकाल की स्थिति व मौद्रिक संकट की स्थिति का समय है थोड़ा बहुत रहम आम लोगों पर करना था.

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