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रसूकदारों की जिद...बेबस प्रशासन....भक्तों की मौत!


यह बात समझ में नहीं आती कि एक हादसा हो जाने के बाद भी लोग सबक क्यों नहीं लेते? यह शायद इसलिये कि मनुष्य में वह स्वभाव विद्यमान है कि जो उसे कहा जाये  इसे नहीं करना तो वही करता है-देश में होने वाले अधिकांश हादसों के पीछे एक यही लाजिक विद्यमान है.केरल में  कोल्लम के पास स्थित  पुत्तिंगल देवी मंदिर में लगी भीषण आग में 112 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 383 गंभीर रूप से घायल हैं. मंदिर में आतिशबाजी की  मनाही थी किन्तु रसूकधार लोगों ने प्रशासन  की कोई बात नहीं मानी और  फटाके बाजी से भयानक आग लग गई तथा कई भक्त मारे गये.जो खबरें आई वह चौका देने  वाली है- कोल्लम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ए शाइनामोल और एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ए शानवाज ने मंदिर में आतिशबाजी की इजाजत नहीं दी थी इसके बाद स्थानीय  संगठनों ने धमकी दी और आरोप लगाया कि सांप्रदायिक मकसद के चलते आतिशबाजी की परमीशन नहीं दी गई, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ए शाइनामोल और एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट दोनों मुस्लिम हैं इसके चलते शनिवार दोपहर तक असमंजस की स्थिति थी, लेकिन मंदिर प्रशासन ने राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल कर लिया।मंदिर प्रशासन को भरोसा था कि आतिशबाजी में कोई बाधा नहीं डालेगा, क्योंकि अभी केरल में चुनाव का समय चल रहा है. स्थानीय लोगों के लिए यह भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है, इसके बाद बताया जा रहा है कि मंदिर प्रशासन ने आतिशबाजी कराने का फैसला ले लिया. प्रशासन की ओर से आतिशबाजी पर जो बैन लगाया गया था, उसका पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी. शनिवार रात को जब आतिशबाजी की गई, तब बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात भी थे. आयोजकों ने पुलिस से गुजारिश की थी कि परंपरा के लिए थोड़ी बहुत आतिशबाजी की इजाजत दे दी जाए याने मनामुना के कैसे भी आतिशबाजी  की ढील ले ली गई या कहे कि सारा काम फर्जी तौर पर चला. कमिश्नर कि बातों से भी इस बात का अहसास होता है कि- हमने आयोजकों से परमीशन लेने की बात कही तो उन्होंने कहा कि उनके पास प्रशासन की मंजूरी है, जब उनसे लिखित आदेश दिखाने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया और आतिशबाजी शुरू कर दी.पूरा खेल चंद लोगों की जिद के आगे एक बड़े हादसे में परिवर्तित हो गया.हर दूसरे मामलों की तरह अब इसमें राजनीति गर्माई हुई है.हादसे की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को दिया गया है, इसके साथ ही आतिशबाजी से जुड़े कॉन्ट्रेक्टर के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया ह ैजिन पांच लोगों ने आतिशबाजी की उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया है.इस संपर्ण हादसे में प्र्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार संज्ञान लिया यह काबिले तारीफ है. घटना की खबर पाते ही मोदी ने  हालात का जायजा लिया, उनके साथ 15 बर्न स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम भी गई थी.ऐसा देश में शायद पहली बार  हुआ जब ऐसी  किसी घटना के बाद प्रधानमंत्री स्वंय अपने  साथ डाक्टरों की टीम को लेकर घटनास्थल पर पहुंचे. इसका असर भी  तत्काल देखने को मिला. लोगों को हर तरफ से मदद मिलनी शुरू हो गई. मोदी के कुछ गुणों मे यह गुण भी शामिल है वे मानवता के इस धर्म को अच्छी तरह समझते हैं. उन्होंने इस त्रासदी को दुखद और अकल्पनीय करार दिया. पीएम ने केरल की सरकार को हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया है.कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी घटनास्थल का दौरा किया. केरल में हुए इस हादसे ने देश में अब तक  हुए ऐसे हादसों पर सवाल खड़े कर दिये हैं आखिर इन सबके लिये जिम्मेदार कौन है? निर्दोष लोगों को मौत
देने वाले ऐसे कार्यक्रमों के आयोजकों को कडी़ सजा देने के लिये सरकार को कुछ कठोर कदम उठाने ही होंगे.इससे पूर्व देशभर में ऐसे कई बड़े हादसे कतिपय लोगों की लापरवाही की वजह से हुए हैं जिसमें इस घटना की  तरह कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है, इसमें चाहे वह शबरीमला का मामला हो या बिहार की घटना अथावा कोई अन्य. बड़े आयोजनों की जानकारी कई महीनों पूर्व स्थानीय प्रशासन  व सरकार के लोगों को रहती है. केरल के शबरीमला में भी अभी  कुछ माह पूर्व ऐसा बड़ा हादसा हो चुका है फिरभी प्रशासन ने  एहतियाती  कदम नहीं उठायें यह चिंताजनक है.जब आतिशाबाजी गैर कानूनी ढंग से शुरू की गई  तो उसे रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया  गया?हादसों के बाद उत्पन्न होने वाले अनेक प्रश्न इस हादसे के बाद भी मौजूद है किन्तु अब सरकार को भी कुछ ऐसे कदम उठाये जाने चाहिये जो अकाल मौतों पर किसी  प्रकार अंकुश लगा सके.

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

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मनुष्य जीवन के बारे में बहुत सी बाते कहीं गई हैं-कहा जाता है कि इंसान पैदा होते ही अपने कर्मो का सारा फल अपने साथ लेकर आता है. यह भी कहा जाता है कि जिसके किस्मत में जो हैं उसे मिलकर ही रहेगा. यह भी कहा गया है कि मनुष्य को अपने कर्मो का फल भी इसी जन्म में भोगना पड़ता है.हम जब ऐसी बातों को  सुनते हैं तो लगता है कि कोई हमें उपदेश दे रहा है या फिर ज्ञान बांट रहा है, किन्तु जब हम इसे अपने जीवन में ही अपनी आंखों से देखते व सुनते हैं तो आश्चर्य तो होता ही है कि वास्तव में कुछ तो है जो सबकुछ देखता सुनता और निर्णय लेता है. यह बाते हम उस व्यक्ति के बारे में कह रहे हैं जिसने पिछले साल पैसे न होने के चलते अपनी पत्नी की लाश को 10 किलोमीटर तक पैदल अपने कंधे पर ढोने के बाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया था. ओडिशा के गरीब आदिवासी दाना मांझी की जिंदगी साल भर में अब पूरी तरह बदल चुकी है. उसकी गरीबी अब उसका पीछा छोड़ चुकी है.इसी सप्ताह मंगलवार पांच तारीख को मांझी कालाहांडी जिले के भवानीपटना से अपने घर तक उस होन्डा  बाइक पर सफर करता हुआ पहुंचा ,जिसे उसने शो रुम से 65 हजार रुपये मे…