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हां हम विश्वास कर सकते हैं, इस साल बारिश अच्छी होगी!




हमारा मौसम विभाग कितना सटीक है वह हमें  इस साल अर्थात कम से कम दो महीने बाद पता चलेगा वैसे गलत भविष्यवाणी के कारण हम अपने मौसम विभाग को कोसते रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक के उसके दावों पर नजर डाले तो  वह जो कहता है वही  हो रहा ह है इसलिये अब हम दावे के साथ तो नहीं  हां विश्वास के साथ यह कह ही सकते हैं कि इस वर्ष मानूसन बेहतर होगा. इस साल औसत छह प्रतिशत अधिक बारिश होने का अनुमान है मौसम विज्ञानी  लगे रहे हें. भारी गर्मी  पडऩे से भी  इस संभावना को बल मिल रहा है कि   देश में 104 से 110 प्रतिशत के बीच बारिश हो सकती है, यानी इस साल मानसून औसत 106 प्रतिशत पर रह सकता है.मौसम विभाग ने पिछले एक दशक से लगभग सही  सही अनुमान लगाया है सिर्फ एक दो प्रतिशत ही इधर उधर हुआ है. सन् 2005 में उसने कहा था- 98 प्रतिशत बारिश होगी और बारिश हुई 99 प्रतिशत एक प्रतिशत ज्यादा.  2006 में 93 प्रतिशत की जगह 100 प्रतिशत, 2007 में 95 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2008 में 99 प्रतिशत की  98 प्रतिशत, 2009 में 96 प्रतिशत की जगह 78 प्रतिशत, 2010 में 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2011 में भी 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2012 में 99 प्रतिशत की जगह 93 प्रतिशत, 2013 में 98 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2014 में 93 प्रतिशत और बारिश हुई 89 प्रतिशत  2015 में 93 प्रतिशत की जगह 86 प्रतिशत बारिश हुई. अब तक अल नीनों  की स्थिति थी अब यह कमजोर  होने लगा है बारिश अच्छी होने का एक कारण यह भी है. प्रशांत महासागर के कतिपय स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है, ऐसी स्थिति में अल नीनो से विपरीत घटना होती है जिसे लॉ-नीना कहा जाता है. लॉ नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है. मसलन, 2009 में अल नीनो के कारण कम बारिश हुई, जबकि 2010 व 2011 में ला नीना से अच्छी बारिश हुई.,. दूसरी तरफ 1997 में अल नीनो प्रभाव के बावजूद देश में अच्छी बारिश हुई. मानसूनी हवाएं मई के दूसरे सप्ताह में हिंद महासागर में उत्पन्न होती हैं और बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपों में दस्तक देती हैं। मानसूनी हवाएं बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ती हैं और हिमालय से टकरा कर वापस लौटते हुए उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को भिगोती हैं. एक जुलाई तक मानसून देशभर में छा जाता है.देश के अनेक क्षेत्रों में जो जल संकट हैं उसका समाधान अच्छे मानूसन से ही संभव है. हालांकि हम वर्षा के पानी  का  बेहतर परंपरागत प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं इस कारण  ढांचा एक तरह से  ध्वस्त हो गया तथा समस्याएं बढ़  गई. कम बारिश के क्षेत्रों में ही नहीं, जहां ज्यादा बारिश होती है वहां भी पानी की समस्या से लोगों को जूझना पड़ता है जिसका समाधान पानी के बेहतर प्रबंधन से ही संभव है. इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है पर प्रबंधन तभी न होगा, जब बारिश हो. पर्याप्त वर्षा से नदियों, झीलों या हर प्रकार के जलाशयों-तालाबों में पानी भर जाता है, भूजल का स्तर भी ठीक हो जाता है यानी इससे जल-चक्र का नियमन होता है. यदि मानूसन अच्छा नहीं रहा तो भूजल का भी स्तर गिर जाता है और उसे निकालने के लिए काफी खर्च करना पड़ता है. वास्तव में बारिश से सबसे ज्यादा प्रभावित हमारी कृषि होती है और यह कई प्रकार से होती है. असिंचित क्षेत्र में बारिश ही सिंचाई का एकमात्र साधन है और फसल लहलाने का आधार भी. लेकिन जहां सिंचाई के साधन हैं वहां भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है कमजोर मानसून के कारण खाद्यान्न पैदावार वर्ष 2014-15 (जुलाई से जून) में घट कर 25 करोड़ 20 लाख टन रह गई जो उसके पिछले वर्ष 26 करोड़ 50 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर थी.अगर पैदावार अच्छी है तो उसमें लागत कम है तो इसका असर महंगाई पर पड़ता है,यानी महंगाई कम होगी। इससे पूरी अर्थव्यवस्था को ताकत मिलती है इससे अर्थव्यवस्था की गति तेज होगी।ब्याज दर घटेगी.भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि अगर मानसून अच्छा हुआ तो हमारी विकास दर आठ प्रतिशत के आसपास रह सकती है अर्थात  विकास की गति भी मानसून पर निर्भर है.मौसम विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि किस प्रदेश में कब मानूसन आएगा, इसके अनुसार केरल में मानसून एक जून को आएगा तो हैदराबाद और गुवाहाटी में पांच जून को, मुंबई तथा रांची में दस जून को, दिल्ली उनतीस जून तक पहुंचेगा. इन संकेतों से साफ है कि छत्तीसगढ़ में भी मानसून अपने निर्धारित समय पर दस्तक दे देगा, इससे किसानों को अपनी फसलों के लिए पूर्व तैयारी का संदेश मिल गया है.

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