सोमवार, 11 अप्रैल 2016

भयंकर सूखा...पानी के लिये त्राहि-त्राहि



बिन पानी सब सून-जल  ही जीवन है,जल हैं तो कल है- देश के दस राज्य इन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में हैं,हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोगों के सामने खाने  पीने  के लाले  पड़ रहे हैं. भीषण सूखे की मार सह रहे लोग गांव छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में जाने  मजबूर हो गये हैं. इस स्थिति से निपटने की  जिम्मेदारी  राज्य और केन्द्र सरकारों की है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता.संकट की इस घड़ी में कुछ करने की जगह सरकारें आंखे मूंदे हुए हैं लेकिन जिसका कोई नहीं उसका खुदा या भगवान है कि तर्ज पर राज्य व केन्द्र सरकार को  सरकार को पिछले  दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ी  फटकार लगाई हैं 'स्वराज अभियानÓ की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और एनवी रमण की पीठ ने कहा है कि पारा पैंतालीस डिग्री के पार पहुंच रहा है और लोगों के पास पीने का पानी नहीं है।उन्हें मदद पहुंचाने के लिए कुछ तो करिए! सूखे से निपटने के लिए अदालत ने राज्यों को पर्याप्त कोष जारी न करने पर केंद्र की खिंचाई करते हुए उसे हलफनामा देकर यह बताने का भी निर्देश दिया कि सूखाग्रस्त राज्यों में मनरेगा पर किस तरह अमल किया जा रहा है। इसमें दो मत नहीं कि पिछले दो साल में कम बारिश के कारण महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जबर्दस्त सूखे की मार झेल रहे हैं।महाराष्ट्रे लातूर का जो परिदृश्य अखबारों में देखने को मिल रहा है उससे वहां की भयानकता का अंदाज लगाया जा सकता है. पीने के पानी के लिये दंगे की स्थिति निर्मित हो रही है तथा लोग पलायन करने मजबूर हो गये हैं.  योगेंद्र यादव की अगुआई वाले 'स्वराज अभियानÓ ने सुप्रीम कोर्ट में जारी अपनी याचिका में सूखा-पीडि़त राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न उपलब्ध कराने के साथ ही अदालत से राहत और पुनर्वास के उपाय करने का अनुरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट की फटकार से सरकार के कान मेंं जू रेंगेगी  कि नहीं यह तो नहीं कह सकते लेकिन लगभग आधे देश के समक्ष उपस्थित गंभीर संकट से  आगे आने वाले दिनों में मौत के आंकड़े आने लगे तो आश्चर्य नहरं करना चाहिये.  वैसे भी महाराष्ट्र सेलगे आंन्ध्र और तेलंगाना में गर्मी इतनी  बढ़ चुकी है कि वहां लू लगने से लोगों की  जान जाने लगी हैं.सूखे और बाढ़ की कहानी  इस देश के लिये कोई नई बात नहीं है. मौसम ने साथ दिया तो अच्छी  बारिश और उसके बाद बाढ़ के हालात और फसलों को नुकसान और अगर बारिश नहीं हुई तो सूखा-यह देश को चलाने वाले  अच्छी तरह जानते हैं फिर भी दतने वर्षो बाउ श्राी इस हालात से निपटने का स्थाई प्रबंध अडसछ वषो्र्र बाद भी क्यों नहीं किया जाता यह प्रश्न सदैव बना रहता है.परिणाम सामने  है. कई राज्यों में हालात बेकाबू हो चले हैं और लोग पानी के लिए हिंसा पर भी उतारू होने लगे हैं. महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में तालाबों और नलों के आसपास धारा 144 लगानी पड़ी है। कई स्थानों पर लोग पानी पर शस्त्र लेकर पहरा डाले  बैठै हैं.कोई  पानी चुरा न ले जाये इसके लिये लोग रखवाली कर रहे हैंॅ. नासिक जिले में गोदावरी नदी का घाट पिछले 139 सालों के इतिहास में पहली बार सूख गया है. छत्तीसगढ़ मेंं सूखे के हालात उपस्थित होने लगे  हैं.गांवों में तालाब, कुए सूख गये हैं पानी के  लिये घरों से काफी दूर जाना पड़ रहा है.छत्तीसगढ़ में अपेै्रल महीने के पहले दिन से ही पारा चढऩा शुरू हो गया और यह पहला सप्ताह बीतते बीतते  पैतालीस उिग्री  को पार कर गया. यही हाल रहा तो छत्तीसगढ़ के शहरों में भी  पानी के लिये लोगों को संघर्ष करना पड़ेगा.टेंकरों से पानी की सप्लाई होते ही  पानी  के लिये किस प्रकार मारा मारी  चलती है कि आगे आने वाले दिने छत्तीसगढ़ के लिये भी कितने  खतराक होंगे इसका अंदाज लगाया जा सकता है.सरकार को  सूखे से निपटने के लिए जल संरक्षण के साथ जल प्रबंधन की भी समग्र रणनीति बना कर उस पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करने की जरूरत है। वर्षा जल संचय, भूजल परिवर्धन, नदी-तालाब संरक्षण, वनीकरण से लेकर जलशोधन की नई तकनीकें इसमें सहायक हो सकती हैं।