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राजनीति के मकडजाल में नया क्रांतिकारी!




 पिछले गुरुवार की रात जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद कन्हैया कुमार  तमाम विश्वविद्यालयों के परिसरों में छात्रों के बीच अभिभूत हो गए. एक नये नाम ने भारतीय राजनीति में भी खलबली मचा दी. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसे लेकर भारी गहमा गहमी थी, जो कन्हैया कुमार के भाषण के बाद कुछ- कुछ एक तरफा हो चला. वास्तविकता यही है कि कन्हैया ने अपनी रिहाई के बाद के पचास मिनिटों तक देशाभक्ति का झरना-सा बहा दिया, उसके तार्किक भाषण से लोगों को भी शायद पता चल गया होगा कि एक छात्र की नैतिक सुरक्षा में जेएनयू के प्रोफेसर तक सड़क पर क्यों निकल आए थे? कन्हैया का उदय उसके कथित देशद्रोही नारों से हुआ. यह कहा गया कि जेएनयू में लगे देशद्रोही नारे में उसकी आवाज भी थी उसी को लेकर उसे जेल भेजा गया और बाहर आकर देश के राजनीतिक धरातल में एक नये क्रांतिकारी की तरह पेश  हुआ- उसकी एंट्र्री भले ही सरकार को पसंद नहीं आई हो लेकिन विपक्ष ने तो उसे हाथों हाथ ले लिया यहां तक कि आगे आने वाले चुनावों के लिये भी पेक्ट करना शुरू कर दिया.देश में कहने-बोलने में बढ़ते भय के बीच जेएनयू मामले के इतना बढ़ जाने के कई कारण हो सकते हैं। आगे-पीछे सारी बातें पता चलेगी, लेकिन इस मामले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सांप्रदायिकता,भ्रष्टाचार, काला धन और ऐसे दूसरे मुद्दों पर सोच-विचार के लिए एक बड़ा मौका पैदा कर दिया. जेएनयू में कन्हैया के भावपूर्ण नेतृत्व में घंटे भर के इस अपूर्व आयोजन में वाद्ययंत्रों की ज़रूरत नहीं पड़ी. आयोजन के फौरन बाद सोशल मीडिया पर कन्हैया का क्रांतिगीत ट्रेंड होने लगा. अब जल्द ही पलटकर इस बात पर भी ध्यान जाएगा कि जेएनयू  मामले का आगा-पीछा है क्या...? इसमें वक्त जितना भी लगे। हकीकत कुछ यह भी सामने आई कि कन्हैया प्रकरण के जरिये कुछ दिनों के लिए तार्किकों के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया गया था कि उनके बोलते ही वे अविश्वसनीय लगने लगें.फिर भी अकादमिक स्तर पर कुछ जटिल बातों पर चर्चाएं शुरू होना स्वाभाविक है.लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत की पहचान अब तक नहीं हो पाई है। गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव, अटल, मनमोहन और मोदी के अपने-अपने दौरों में लोकतंत्र के विकास-अविकास के मामले में क्या हुआ, इसका कोई निर्विवाद लेखा-जोखा बन नहीं पाया है.आजाद भारत के शुरुआती दशकों में जब अभिव्यक्ति की चरम-परम स्वतंत्रता का दौर था, तब भी आज़ादी के बारे में या समानता के बारे में और उसे हासिल करने के बारे में हानिरहित उपायों को ढूंढते ही रहे। इसी तलाश में वाद-विवाद और संवाद होते हैं.वाद-विवाद की पहली ज़रूरत अभिव्यक्ति की आज़ादी होती है. बुद्धिजीवी वर्ग के सामने यह बिल्कुल नई चुनौती है. खासतौर पर तर्कशास्त्रियों पर यह जिम्मेदारी आन पड़ी है कि बहुत कम समय लगा साफ करें कि बौद्धिकता या बौद्धिक कर्म या विचार-विमर्श किसी भी रूप में आतंकवाद हो भी सकता है या नहीं. हम कभी  कभी आदमी की कद काठी देखकर उसका आंकलन सही नहीं कर पाते क्या इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ?यह आगे आने वाले समय में पता चल पायेगा बहरहाल यह एक राजनीतिक विस्फोट है जो अब तक कहीं दबा पड़ा था जो अचानक फूट गया है इसका प्रभाव भी बाद में ही दिखाई देगा.

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
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