मंगलवार, 15 मार्च 2016

हर्षद,तेलगी,केतन,सत्यम, ललित-माल्या, और कितने ?


अब तक दस था, अब ग्यारह हो गया!-हम बात कर रहे हैं देश में हुए बड़े घोटालों की, जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को झकजोर कर रख दिया. जो पैसा हमने अपने देश के विकास और उन्नती के लिये संजोकर रखा था उसे धोखेबाज या ठग खा गये-अरबों रूपये का चूना हमारे खजाने पर लगाकर कुछ जेलों में पड़े सड़ रहे हैं तो कुछ विदेशों में मौज मस्ती की जिंदगी जी रहे हैं. दस स्केण्डल पहले से थे अब विजय माल्या का एक और फ्राड इसमें जुड गया. पहला बड़ा स्केडंल देश में सन् 2004-9 के बीच  कोयला घोटाला के रूप में उजागर हुआ जिसमें भारतीय खजाने को करीब 1,86,000 करोड़ रूपये का पलीता लगा.मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या इससे कई गुना ज्यादा करीब 10,60,000 करोड़ रूपये का है.इसके बाद आया हवाला कांड: इसे खुली राजनीतिक लूट कहा गया, जिसने भी खजाने को अच्छा खासा झकजोर दिया.तीसरे नम्बर पर स्टाक मार्केट की बारी थी  जिसमें हर्षद मेहता ने जाली बेैंक रसीदों के मार्फत भारतीय बैंकों को चार हजार करोड़ रूपये का चूना लगाया. चौथे नम्बर पर बोफोर्स सौदे में घोटाला था जिसमें कई करोड़ रूपयें  का लेन देन हुआ. आंतरिक सुरक्षा  से जुड़े इस मामले में खूब राजनीतिक हल्ला मचाया लेकिन ऐसी चोटे केंसर की तरह हमारे शरीर में यूं ही पड़ा रहता है. पांचवे क्रम पर  था बिहार का चारा घोटाला, जिसमें भी करोडों रूपये की चपत देश के खजाने को लगी. छठवे क्रम पर सत्यम कांड.करीब चौदह सौ करोड़ रूपये का यह घोटाला था. इसके बाद अब्दुल करीब तेलगी ने जाली स्टैम्प पेपरों के जरियेे देश के खजाने को बीस हजार करोड़ रूपये की चपत दी. राष्ट्र मंडल घोटाले का प्रमुख आरोपी लंदन में छिपा है करीब 70 हजार करोड़ रूपये के इस घोटाले पर भी कार्रवाही बस हवा-हवा है. टूजी स्पेक्ट्रम में 1.76 लाख करोड़ रूपये का चूना सरकार को लगा.और अब विजय माल्या ने नौ हजार  करोड़ रूपये का घोटाला कर टाप टेन के बाद टाप इलेवन मे अपना स्थान बना लिया.चूंकि टाप टेन के बाद का यह ग्यारहवा मामला है इसपर चर्चा भी गरम  है. सीबीआई के  'लुक आउटÓ नोटिस को ठेंगा दिखाते हुए शराब कारोबारी और राज्यसभा सांसद विजय माल्या विदेश भाग गये.हम और आप अगर एक दो लाख लोन लेने के  बाद एक भी किश्त देने  से भूल जाते तो यही बैंक जिनका पैसा माल्या लेकर उड गये वह आपके द्वार पुलिस लेकर पहुंच जाते लेकिन माल्या को यही लोग हवा में पतंग की तरह उडते हुए जाते देखने के बाद भी उसकी डोर को ख्रीच नहीं पाये और वह पतंग दूसरे देश में जा गिरी. अब नौ हजार करोड़ गवाकर सिर पर हाथ धरे बैठे हैैं.माल्या पर देश की सबसे अकड़बाज बैंक भारतीय स्टेट बैंक सहित देश के सत्रह बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज बकाया है.सुप्रीम कोर्ट ने माल्या को नोटिस जारी कर उनसे बैंकों की याचिकाओं पर दो हफ्ते में जवाब मांगा है लेकिन इतने भर से डूबी हुई रकम वापस मिलने की उम्मीद पालना खुद को धोखे में रखना ही कहा जाएगा.अपनी बेलगाम शाहखर्ची, रंगीली फितरत और चकाचौंध भरी जीवनशैली के चलते माल्या ऋणदाताओं-निवेशकों को हकीकत से बेखबर रखने में कामयाब होते रहे. जब उन्होंने शराब कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट में अपनी हिस्सेदारी पांच सौ पंद्रह करोड़ रुपए में बहुराष्ट्रीय कंपनी डियाजियो को बेची और उसका चेयरमैन पद छोडऩे पर राजी हुए तभी आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि वे सबकुछ समेट कर भागने की फिराक में हैं, तब भी उन्हें कर्ज देने वाले बैंक नहीं चेते, मगर अब उनके विदेश भाग जाने पर लकीर पीट रहे हैं.विजय माल्या का मामला देश में उदारीकरण के दौरान व्यावसायिक घरानों की लूट के प्रति हमारे समूचे वित्तीय तंत्र की बेहिसाब उदारता की एक बेहद अफसोसनाक मिसाल है. किंगफिशर एअरलाइंस बढ़ते घाटे के कारण लगातार डूबती रही लेकिन जाने-माने बैंकों ने इसके बहीखातों की गहन पड़ताल किए बगैर हजारों करोड़ का ऋण उदारतापूर्वक दे दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि आखिर इतना कर्ज दिया ही क्यों था.क्या किसी कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और भविष्य की योजनाएं परखे बगैर कथित 'ब्रांड वैल्यूÓ या तामझाम पर रीझ कर ऋण-वर्षा कर देने को उचित ठहराया जा सकता है? जब यह तथ्य जगजाहिर हो चुका था कि किंगफिशर पर बकाया कर्ज की वसूली जनवरी 2012 से नहीं हो रही है, तो ये सब चार साल तक क्यों सोते रहे? अब जाकर इन्हें मनी लांड्रिंग या विदेशी मुद्रा विनिमय कानून के तहत मामले दर्ज करने या किसी विशेष रकम की निकासी पर रोक लगाने की सुध अब आई है जब माल्या पकड़ से दूर जा चुका हैं. माल्या  विदेश  में है-राष्ट्र मंडल खेलों का विलन ललित मोदी भी विदेश में है और हमारे  देश की  करोड़ों की ब्लेक मनी भी विदेश में है. कई वादे हमसे किये जाते रहे हैं.यह सारा पैसा हमारे देश की जनता की मेहनत का है अगर चंद लोग इसे यूं ही बर्बाद करते हैं तो यह देशद्रोह से कम नहीं  है. क्या हम अपनी सरकार से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह यह पैसा निकालकर हमारे देश की उन्नती और विकास में लगायेगें या फिर यूं ही हमें मृग तृष्णा की तरह इसकी खोज कराते रहेंगें?