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सुर्खियों का एक दिन-'मरे चौदह सौ , 'नक्सलियों पर नहीं होगा सेना का हमला... और गले मिले 'मूणत-बृज!

सुर्खियों का एक दिन-'मरे चौदह सौ , 'नक्सलियों पर नहीं होगा सेना का हमला... और गले मिले 'मूणत-बृज! देश का पारा इस समय सातवें आसमान पर है- अब तक भीषण गर्मी से करीब 1400 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. यह मुसीबत भी किसी भूकंप से कम नहीं है. दो चार दिन बाद अच्छे दिन आने की भी खबर है. मानसून तीस मई को केरल पहुंच जायेगा, ऐसा मौसम विभाग वाले ताल ठोककर कह रहे हैं. वैसे यह भी कहा जा रहा है कि अल नीनो की सक्रियता के कारण मानसून आने में देरी हो सकती है. बहरहाल भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर बुधवार को रायपुर में थे उनने यहां आने के बाद प्रमुख बात यह कही कि नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का उपयोग नहीं किया जायेगा. यह बात पूर्व रक्षा मंत्री व अब मंत्री वीपी सिंह भी कह चुके हैं. जबकि यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री ए. के. एंटोनी ने भी यह स्पष्ट किया था कि सेना का उपयोग नहीं किया जायेगा. सवाल अब यहां यह उठ रहा है कि सरकार किस फार्मूर्ले से इस समस्या का समाधान निकालने जा रही है? यह भी  सवाल है कि क्या समस्या सदैव ऐसी ही बनी रहेगी? मुख्यमंत्री  डा. रमन सिंह भी नक्सलियों को माटी प...

बुरे और अच्छे के पीछे पिसते 'हम,आखिर कब तक इंतजार करना होगा?

अ च्छे और बुरे की लड़ाई के बीच आज एक और खबर आई कि अगले महीने से बिजली भी सरकार की मर्जी पर चलेगी अर्थात बिजली का बिल भी ग्यारह प्रतिशत बढ़ाकर देना होगा. पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने के बाद फिर दाम पुराने ढर्रे पर याने  यूपीए सरकार के लेवल तक पहुंच गया है जबकि रसोई से दाल गायब हो चुकी है फिर यह चाहे तुअर  की दाल हो या चने की दाल, सबका भाव आसमान  छू रहा है. हम एक आम आदमी की तरह किसी पार्टी पालिटिक्स को छोड़कर देखें तो क्या हमें उस और इसमें कोई फर्क पिछले एक साल में दिखा? दोनों लगभग एक जैसे हैं. एक कम बोलता था दूसरा ज्यादा बोलता है-ऐसे माहौल में हमने आजादी के एक साल और काट दिये. इस वर्ष के शुरूआती दौर मेें पेट्रोल-डीजल के दाम कम हुए तो लगा वास्तव में अच्छे दिन आने  शुरू हो गये, बुरे दिन वालों की बोलती बंद हो गई  लेकिन बजट आते तक सारी आशाओं पर पानी फिरने लगे फिर जहां सपने दिखाने की झडी  लग गई तो यहां से वहां जाने का किराया  बढाकर हमारे आने जाने  को भी सीमित कर दिया. रेल,बस,प्लेन के किराये में तो बढौत्तरी हुई ही साथ ही खाना खाने नहाने धोने तक में सर्विस...

एक भीषण सड़क हादसा, जिसने पूरे राजधानी की आंखों को छलछला दिया!

क्या हमारी सड़कें इस लायक है कि यहां एसयूवी जैसी गाड़ियां सडकों पर 130 से 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकें?. टेड़ी-मेड़ी, उलझी और गड्ढेनुमा सड़कों पर कभी कुत्ता तो कभी अन्य पशु जहां टपक पड़ते हैं. ऐसे में गाड़ी अच्छे से अच्छे ड्रायवर के हाथों से नियंत्रण खोए बिना नहीं रह सकती. राजधानी रायपुर में शनिवार रात हुए दर्दनाक हादसे ने शहर के चार नौजवानों को जहां हमसे छीन लिया वहीं करीब पांच अभी भी मौत से संघर्ष कर रहे हैं. दुर्घटना का कारण अभी पुलिस जांच में है फिर भी जो प्राथमिक तौर  पर अनुमान लगाया जा सकता है वह यह कि एसयूवी गाड़ी जो तेज रफ्तार गाड़ियों में से एक है, हादसे के वक्त 130 से 160 किलोमीटर की रफ्तार पर रही होगी. वैसे भी लम्बे रूट पर ऐसे कारों के लिये कोई बड़ी रफ्तार नहीं है, आम तौर पर आजकल छोटी-मोटी गाड़ियां ही सौ किलोमीटर से ऊपर की रफ्तार पर दौड़ना आम बात है फिर अगर खाली सड़क मिल जाये तो रफ्तार किसी भी हद तक जा सकती है-इस बीच गाड़ी में सफर करने वाले युवा हो तो फिर क्या? मस्ती- गाने, हंसी, ठिठौली में लोग यह भी भूल जाते हैं कि सड़क पर हालात क्या हैं. खाली मिलने पर रफ्तार और भी तेज ...

पठारीडीह की घटना के लिये कौन जिम्मेदार?पुलिस की सक्रियता घटना के बाद ही क्यों?

पठारीडीह की घटना के लिये कौन जिम्मेदार?पुलिस की सक्रियता घटना के बाद ही क्यों? एस पी ओ.पी.पाल उरला के पठारीडीह की घटना के बाद अब भले ही यह कहें कि कानून हाथ में लेने की कोई भी कार्रवाही पुलिस बर्दाश्त नहीं करेगी लेकिन सवाल यह उठता है कि उरला के लोगों को कानून हाथ में लेने प्रेरित  किसने किया? घटना के सबंन्ध  में बताया जाता है कि पिछले कम से कम तीन सप्ताह से उरला और राजधानी रायपुर के आसपास आउटर में कुछ अज्ञात लोग बच्चा पकड़ने  में लगे हुए हैं-निवासियों का आरोप है कि यह बाहरी  लोग हैं जो घ्रेकी कर बच्चों को पकड़़़ रहे हैं.पुलिस से कई बार शिकायत करने के बाद भी कोईर् संज्ञान इस मामले में नहीं लिया गया यहां तक कि इस घटना के पूर्व भी कुछ संदिग्ध लोगों की पिटाई नागरिकों ने संदेह के आधार पर की लेकिन इसके बाद भी जब पुलिस ने किसी को गिरफतार नहीं किया तो आम लोगों ने अपनी सुरक्षा का दायित्व खुद सम्हाला. वे डंडे लेकर गली- गली में घूमने लगे. संंदिग्ध लोगों से पूछताछ भी की गई और संदिग्ध माने जाने पर उसकी पिटाई भी की गई.यह स्वाभाविक प्रक्रिया थी. जो काम पुलिस को घटना या अफवाह की...

अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद रूकीं... आज सड़क पर चलने वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में!

अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद रूकीं... आज सड़क पर चलने वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में! 'दुबई भी हमारे जैसा एक देश है, वहां एक तो चोरी नहीं होती दूसरी महिलाएं बेधड़क होकर किसी भी समय सड़कों पर घूमती हैं, उन्हें किसी प्रकार का कोई खतरा नहींÓ अगर किसी ने महिला से छेड़छाड़ की तो उसकी सजा भी इतनी कठोर होती है कि लोगों की रूह कांप जाये. हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान महिलाओं की सुरक्षा के बहुत से वादे किये थे-कुछ कानूनों में बदलाव भी हुए लेकिन अभी भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. सड़कों पर एक खौफ बना रहता है कि कब किसके साथ क्या हो जाये. कानून इतना लचीला है कि अपराध करने वाला पांच-सात साल की सजा भुगतने के बाद छुट्टा घूमता है और पीड़िता जिंदगीभर का दर्द झेलती है. मुम्बई की नर्स अरूणा शानबाग बयालीस वर्षों तक ऐसे ही मंजर से गुजरकर इस सोमवार को दुनिया से रूखसत कर गईं. लेकिन उसको इस हालत में पहुंचाने वाला वार्ड ब्वॉय सिर्फ सात साल सलाखों के पीछे रहने के बाद आज किसी छद्म नाम से हंसी-खुशी की जिंदगी बसर कर रहा होगा. अरूणा की कहानी जो भी सुनता है उसकी रूह कांप जाती हैं, आंखो...

ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली बिल अब लोगों के हार्ट पर भी आघात करने लगा!

ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली बिल अब लोगों के हार्ट पर भी आघात करने लगा! एक फुट दो इंच लम्बा होता है छत्तीसगढ़ के सीपीडीसीएल (छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड) का बिल! जो हर महीने उपभोक्ताओं को आन द स्पॉट परोसा जाता है. इसको देखने के बाद कइयों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है तो कइयों के दिल की धड़कन रूक जाती है. कई इस चिंता में खो जाते हैं कि आखिर इस बिल को पटाने के बाद मेरे परिवार का क्या होगा? कैसे बच्चे की फीस पटाई जायेगी, कैसे घर का किराया अदा किया जायेगा और कैसे बाबूजी के लिये दवा का प्रबंध किया जायेगा? क्या आप उपभोक्ताओं में से कोई सीपीडीसीएल द्वारा जारी किये जाने वाले बिल में से शुद्ध देयक और सकल देयक के अलावा आपसे वसूल किये जा रहे किसी बिन्दू का सही विश्लेषण कर सकता है? बिल उपभोक्ता को देने का पूरा तरीका तानाशाही, लालफीताशाही से भरपूर और त्रुटिपूर्ण रहता है जिसको विद्युत कंपनी का कोई अधिकारी अथवा इसे बनाने वाला कर्मचारी ही समझ सकता है. आम उपभोक्ताओं के लिये मुसीबत बना यह बिल आगे के दिनों में और आप सभी के लिये और मुसीबत बन सकता है, चूंकि कंपनी ने तय कर लिया है कि वह अपने उपभोक्त...

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा-

रायपुर बुधवार दिनांक 8 दिसबंर 2010 छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा- क्या अंतिम उपाय 'मौत ही रह गया ? यह अकेले नेहा भाटिया की कहानी नहीं हैं, संपूर्ण छत्तीसगढ़ में स्कूली छात्राओं से छेडख़ानी और उन्हें प्रताडि़त करना एक आम बात हो गई है। छेड़छाड़ से दुखी नेहा ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया था। मंगलवार को नेहा ने प्राण त्याग दिये। बहुत सी छात्राएं छेड़छाड़ को बर्दाश्त कर इसकी शिकायत इसलिये नहीं करती। चूंकि उन्हें डर लगा रहता है कि परिवार के लोग इसके पीछे पड़ कर बड़ी मुसीबत में पड़ जायेंगे। पुलिस में जाने से छेड़छाड़ पीडि़त महिला तो डरती ही है, उसका परिवार भी ऐसा नहीं करना चाहता। जबकि नेहा जैसी कई ऐसी छात्राएं भी हैं, जो अपमान को गंभीरता से लेकर उसे मन ही मन बड़ा कृत्य करने के लिये बाध्य हो जाती है। क्या स्कूल प्रबंधन इस मामले में बहुत हद तक दोषी नहीं है, जो ऐसी घटनओं की अनदेखी करता है? क्या छेड़छाड़ पीडि़तों के लिये यही एक अंतिम उपाय है कि वह मौत को गले लगा ले? नेहा कांड से पूर्व छत्तीसगढ़ के छोर सरगुजा से एक खबर आई कि एक युवक की लड़की के भाई और साथियों ने जमकर पिटाई कर दी, चूंकि वह...

आरटीओं की आग में भूतो का काम था तो यहां कहीं जिंदा भ्रष्ट भूत तो सक्रिय नहीं हो गये?

आरटीओं की आग में भूतो का काम था तो यहां कहीं जिंदा भ्रष्ट भूत तो सक्रिय नहीं हो गये? क्या राख से सबूत निकल पायेगा? जिस तरह से सिंचाई  विभाग की  फाइले  जली  है उसको देखने से तो  ऐसा लगता नहीं कि अब कोई सबूत बचा होगा.राजधानी रायपुर में महानदी गोदावरी कछार परियोजना का एक पूरा हाल इस विभाग की पुरानी फाइलों से अटा पड़ा था, मंगलवार-बुधवार को यह गोदाम धू -धू कर जलने लगा जिसने देखा वह यही कहता रहा कि घोटालेबाजो ने सबूत मिटाने के लिये जला दिया. लोगों के संदेह की पुष्टि इसी से होती है कि कुछ लोगों ने इस दफतर के पास से आते जाते समय धुआं उठते देख यहां आकर इस हाल को जलते देखा था,यह हाल आफिस के काफी पीछे एकांत स्थान पर स्थित है. बताते हैं वहां लोगों ने देखा कि आग लगने के बाद भी मौजूद कर्मचारियों में कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं थी जो आग लगने के बाद अक्सर देखने को मिलती है अर्थात पानी लेकर दौड़ना, रेत से बुझाने का प्रयास -इधर उधर दौड़ लगाना, फायर ब्रिगेड को फोन करके बुलाना आदि बल्कि वहां तैनात कुछ कर्मचारी तो ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसा उन्हें मालूम है कि आग लग गई है ठीक वैसे ही ज...

कोई बड़़ा अपराधी तो कोईछोटा, किसी को ऊंची सजा के साथ ऊंवी सुविधा भी.क्यों है ऐसा?

कोई बड़़ा अपराधी तो कोईछोटा, किसी को ऊंची सजा के साथ ऊंवी सुविधा भी.क्यों है ऐसा? अपराध घटित हुआ सन् 2002 में! फैसला आया सन् 2015 में! फैसले की घोषणा हुई सवेरे 11.15 पर! सजा सुनाई गई शाम 1.15 पर ! अभियोजन पक्ष जमानत लेने हाई कोर्ट की तरफ दौड़ा  दोपहर बाद 3 बजकर पन्द्रह मिनिट पर! जमानत पर सुनवाई हुई शाम चार बजे! जमानत की घोषणा हुई शाम 4.50 बजे! कौन कहता है भारतीय न्यायव्यवस्था काबिल नहीं है? लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सामान्य व्यक्ति इस ढंग का न्याय प्राप्त कर सकता है? न्यायपालिका का पूर्ण सम्मान करते हुए हम अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कुछ सवाल उठाना चाहते हैं कि दोहरी व्यवस्था को क्यों कायम किये हुए हैं?क्या आज हमारी व्यवस्था-सामान्य व्यक्ति और प्रभावशाली, धनवान, बाहुबलियो के बीच अलग अलग बट नहीं गई है? कानून में विभिन्नता क्यों हैं? एक सामान्य व्यक्ति अगर किसी ऐसे मामले में फंसता है तो उसका फैसला आने में देरी नहीं होती उसे तत्काल काल कोठरी के पीछे भेज दिया जाता किन्तु बड़े व पैसे लोग इस स्वतंत्र भारत में अपने  प्रभाव का भरूपूर  उपयोग करने लगे हैं.संविधान ...

ऐसी है हमारी शिक्षा नीति-प्रथम वर्ग, इंजीनियर,डाक्टर,द्वितीय वर्ग प्रशासक, तृतीय वर्ग राजनीति और चौथा-पांचवा....?

ऐसी है हमारी शिक्षा नीति-प्रथम वर्ग, इंजीनियर,डाक्टर,द्वितीय वर्ग प्रशासक, तृतीय वर्ग राजनीति और चौथा-पांचवा....? ''तेरे पिताजी क्या करते हेैं? मैरे पिताजी तो डाक्टर हैं और तेरे-मैरे पिता तो सरकारी कार्यालय में बाबू हैं....तो तूू बड़ा होकर बाबू बनेगा और मैं डाक्टर.ÓÓ-बच्चों के बीच स्कूली शिक्षा के दौरान अक्सर इस तरह की बात होती रहती है जिसमें पढ़ते पढ़ते ही भविष्य को तय कर दिया जाता है कि कौन बड़ा होकर क्या बनेगा और कौन किस व्यवसाय में लगेगा. सड़सठ साल की शिक्षा नीति में आज तक कोई बदलाव नहीं आ रहा है. कहीं यह प्रयास नहीं किया गया कि जो नीचे है या मध्यम स्तर पर है उसे ऐसा बनाया जाये कि समानता स्थापित हो सके.अगर रिक्शा चलाने वाले का लड़का या किसी बर्तन मांजने वाली बाई का बेटा  अथवा बेटी भी अच्छे नम्बरों  से पास हो तो उसे भी ऐसी परिस्थिति मिलनी चाहिये कि वह आईएएस आईपीएस बनजाये किन्तु ऐसे बच्चों के सामने सबसे बड़ी बाधा उनकी आर्थिक स्थिति आती है जिसके चलते पूरी योग्यता धरे रह जाती हे ओर वे या तो किसी संस्थान  में बाबूगिरी करते नजर आते  है या फिर शिक्षक बन किसी स्कूल में छ...

शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा!

शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा! कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं- इस कहावत में जहां हकीकत है वहीं अब आजकल की बेटियों को कपूत के पांव शादी की दहलीज पर ही दिखाई देने लगे हैं- इससे एक अ'छी बात यह होगी कि भविष्य में गृह कलह, तलाक, दहेज हत्या, आत्महत्या और अन्य बुराइयों से बेटियां बच सकें गी. छत्तीसगढ़ की उर्मिला, रेखा जैसी बेटियों ने जो मिसाल कायम की है वह अन्य उन लड़कियों के लिये भी प्रेरणादायक है जो किसी युवक के साथ अपना जीवन संवारने की तैयारी में हैं. छत्तीसगढ़ में इस दो महीने के अंतराल में चार बेटियों ने अपने घर की दहलीज तक पहुंचे दुल्हे को शराब के कारण वापस भेज चुकी हैं. यह उस समाज के लिये एक संदेश है जो खुशियां मनाने के लिये शराब को अपना साथी चुनते हैं. वैवाहिक जीवन का शुरूआती दौर आनंददायक है, लेकिन उसमें दरार तब पड़ जाती है जब पता चलता है कि युवक या युवती दोनों में से कोई एक आशा, प्रत्याशा के अनुरूप नहीं बैठता, मसलन पुरुष शराबी है, गे है अथवा लड़की के चरित्र में खामियां है, सारी बात...

प्राकृतिक आपदाओं से किसानों, आम जनता को बचाने 67 साल तक सरकारें क्या करती रहीं?

î प्राकृतिक आपदाओं से किसानों, आम जनता को बचाने 67 साल तक सरकारें क्या करती रहीं? हम जब से दुनियादारी समझने लगे, तब से लेकर अब तक स्वतंत्र भारत में कई बार सूखा पड़ा, ओलावृष्टि हुई, तूफान आया, बाढ़ से तबाही मची. विदेशों से गेहूं चावल आयात करना पड़ा. आम जनता के घर उजड़े, भारी तबाही मची, लोगों को घर जमीन सब छोड़कर भागना पड़ा. किसानों की खड़ी फसल बर्बाद हुई. खेत खलिहान ऐसे बन गये कि उपजाऊ लायक नहीं रह गई फिर भी देश के किसानों ने चू-चपड़ तक नहीं की. प्रकृति और ईश्वर का कोप मानकर उसने इसे गले लगाया लेकिन समय बीतता गया. यह सब देखते-देखते एक के बाद एक पीढ़ी निकल गई, सरकारें आई-गई लेकिन प्रकृति के ताण्डव से इन सरकारों में बैठने वालों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. इन सियासतदारों में से भी बहुत से ऐसे होंगे जिनके परिवार को प्रकृति के ताण्डव को झेलना पड़ा होगा लेकिन चूंकि वे सत्ता में हैं इस कारण उनकी समृद्धि की बढ़ोत्तरी  पर कोई असर नहीं पड़ा. नुकसान हुआ तो उन फटे हाल- हल फावड़ा, खुरपी, गैंती लेकर दिन रात हमारे और आपके लिये खाने का प्रबंध करने वाले अन्नदाताओं पर जिनकी ओर न उन लोगों ने देखा और न ही उ...

कब मिलेगा हर आदमी को समान अधिकार, कब अंत होगा अंग्रेजों की बनाई गई परंपरागत व्यवस्था का?

हम जानते हैं कि संविधान में लिखे गये कुछ अंशों को आसानी से बदला नहीं जा सकता लेकिन यह भी तो सत्य है कि हमने जिस संविधान की रचना की है उसमें लिखी बातों को जो हमें अच्छी नहीं लगती बदल देना चाहिये. स्वतंत्रता के सडसठ सालों बाद भी हम अंग्रेजों के बनाये नियमों और उनकी गलतियों को न केवल अंगीकार कर रहे हैं बल्कि कुछ लोगों को देश के गरीब, मध्यमवर्ग और अमीर की माली हालत के विपरीत अंग्रेजों के समय के ठाठ बाट और ऐशोआराम की जिंदगी में जीने का मौका भी प्रदान कर रहे हैं. बात अगर देश में लोकतांत्रिक प्रणाली से शुरू करें तो यहंा जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के पूरे अधिकार है. इसी प्रकार राज्यों में मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को भी उसी प्रकार के अधिकार है जैसा केन्द्र में प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को हैं.देश की न्यायव्यवस्था को चलाने के लिये उसकी न्यायपालिका है जो संपूर्ण देश व प्रदेश में न्यायिक मामलों का समय पर निर्वहन करती है. अब सवाल उठता है इस गरीब देश में मौजूद व हमारे द्वारा अंग्रेेजों के समय प्रदत्त उन संवैधानिक पदों के बारे में...

और कितने शरद प्रशंसा, लवकुमार मारे जायेंगे?

घरेलू हिंसा रोकने सरकार शराब बंद करें, मुफत अनाज की जगह काम के बदले राशन बांटे गौतम, शरद, विनय, प्रशंसा, लवकुमार यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ ऐसे मासूम बच्चे थे जिनने कम से कम ग्यारह माह से लेकर छह साल तक की जंदगी जी और बाद में माता पिता के बीच घरेलू कलह के चलते अथवा किसी प्रेम संबन्ध के चलते उन्हें इस दुनिया से रूकसत कर दिया. ऐस और भी बच्चे हैं,जिन्हें पूर्व में मार दिया गया जिनका नाम हमारें पास नहीं हैं. मारने वाले ओर कोई नहीं बल्कि इनकी खुद की मां थी या फिर इनका शराबी पिता. अपना अडियल रवैया या शराब की लत, अथवा जिद छोटे छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं.प्राय: सभी घटनाओं के पीछे घरेलू हिंसा,आर्थिक तंगी और शराब एक वजह है, जो परिवार की कलह और  मासूम बच्चों की मौत का कारण बन रही है. इन सबमें प्रमुख वजह शराब है.पिछले साल एक शराबी पिता ने वाल्मिकी नगर की गौतम छै साल, शरद चार साल और विनय दो साल को शराब के नशे में मौत के घाट उतार दिया था. इन बेचारों का क्या कसूर था? पति- पत्नी के बीच विवाद इनकी मौत का कारण बना. कोई सामान्य आदमी जो कृत्य नहीं कर सकता वह कृत्य शराब पीन...

अब धरती पर अत्याचार छोड़ आकाश की ओर बढों....! वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि पर लगे वृक्षों को भी नहीं काटा जा सकता. इसे भी काटने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.कहने का तात्पर्य सरकार अपनी तरफ से भी वनों की रक्षा के लिये कटिबद्व है लेकिन मजबूरियां ऐसी हैं कि सरकार को बाध्य होकर कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं जिसके चलते वृक्षों व वनों का सफाया करना अनिवार्य हो जाता है. बस्तर में बोधघाट परियोजना का ही उदाहरण ले- वृक्षों की भारी कटाई,कई गांवों के डुबान की स्थिति इन सबके चलते आज तक यह परियोजना अस्तित्व में नहीं आई. अब विकास की दौड़ मेंं सरकार के लिये यह मजबूरी है कि वह छत्तीसगढ़ के इस जंगल से आछादित क्षेत्र को नई दुनिया से जोड़ने के लिये यह यातायात की आधुनिकतम सुविधाएं मुहैया करायें.इसी कड़ी में राजधानी रायपुर से बस्तर तक रेल लाइन बिछाने का कार्य हाथ मेें लिया जा रहा र्है इस कड़ी में कई पहाड़, कई वृूक्ष उजडेंगें.तभी जाकर रेललाइन बिछेगी. यह बस्तर सहित पूरे देश की आवश्यकता है. इस परियोजना को अगर हम दूसरे नजरियें से देखें तो यह कुछ आसान है, जिसमें आम लोगों को सुविधा होगी, वन नहीं कटेगें पहाड़ों को नहीं हटाना पड़ेगा और सुविधाएं भी लोगों को मिलेंगी. सरकार रायपुर से बस्तर की दूरी जो करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक है धरती को छोडकर मेट्रो की तर्ज पर आकाश की तरफ धरती से ऊपर ट्रेेनें चलाये व सड़को को भी ऊपर ही ऊपर विकसित करें. विश्व के कई विकसित देशों में यह व्यवस्था है जिसके चलते धरती को छुए बगैर सारा यातायात चलता रहता है और किसी को जाम की स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ता. खर्चा इसमें भी होगा उसमें भी होगा लेकिन काम को चरण बद्व शुरू करने से यह काम आसान और कम खर्चीला होगा. अगर रायपुर से धमतरी तक या धमतरी से ये जगदलपुर तक इस योजना पर शुरूआती दौर पर काम किया जाय तो इसके फायदे नजर आने लगेंगे. सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कुछ ऐसा ही है. वे बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे जो सत्तर हजार करोड़ की तो सिर्फ एक बुलेट ट्रेन की है लेकिन यह योजना जो धरती से आकाश की ओर जाती है तो यह शायद उससे कम खर्च में पूरी हो सकती है. यातायात की गंभीर समस्या भविष्य में और पेचीदा होगी इसके लिये हम अब आकाश की ओर ताकना पड़ेगा ही.

वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि ...

आखिर हम किससे डर रहे हैं-अमरीका, चीन या अपने आप से?सईद ललकार रहा है क्यों न हो जाये आर पार की लड़ाई

अस्सी हजार से ज्यादा लोग अब तक  आतंकवादियों के हाथों मारे जा चुके...हमें मालूम है कि इस नरसंहार के पीछे पाकिस्तानी सेना, भारत से भागे दाउद इब्राहिम और वहां के उग्रवादी संगठन जमात उद दावा के सरगना हाफिज सईद का हाथ है-यह व्यक्ति मुम्बई हमले का भी मास्टर माइण्ड है- इस कुख्यात व्यक्ति के सिर पर अमरीका ने भी एक करोड़ रूपये का इनाम रखा है, फिर भी हम चुप हैं...इस बार उसके पिट्ठू आये तो ए के 47 का जखीरा, खाने पीने के लिये रेडीमेड चिकन आचारी, दाल, रोटी सहित काजू किशमिश, खजूर और अन्य कई किस्म के ड्राय फ्रूट भी लेकर आये-प्लान बनाया था कि भारत के मस्तक पर बैठकर कई दिनों तक आतंक का खेल खेलेंगे लेकिन इन छक्कों के मंसूबों को भारतीय फौज ने सफल होने नहीं दिया लेकिन इस कड़ी में हमारे कम से कम बारह जवानों को भी शहीद होना पड़ा. तीन दशक से ज्यादा का समय हो गया- हम अपने पडौसी की  मनमानी झेल रहे हैं?क्या हमने  चूडियां पहन रखी है कि वह अपनी मनमानी  करता रहे और हम चुप बैठे रहे? क्यों नहीं हम आर या पार की लड़ाई लड़े? हम किससे डर रहे हैं?अमरीका से? चीन से? या फिर अपने आप से?कि अगर हम पाकिस्तान से...

मौत फैक्ट्री से निकली दवा सिप्रोसिन-500

मौत फैक्ट्री से निकली दवा सिप्रोसिन-500 ने अब तक कितने लोगों को मारा, क्या इसका रिकार्ड भी कंगाला जायेगा? छत्तीसगढ़ में नसबंदी मौतों की वजह सिप्रोसिन-500 दवा है तो इस  सामूहिक हत्याकांड के पहले इस दवा ने और कितने लोगों की जान ली? क्या सरकार यह पता लगायेगी? अब तक नसबंदी  कांड में दवा खाने के बाद कम से कम उन्नीस लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन अब सवाल यह उठता है कि दवा तो कई दिनो, महीनों व सालों से बाजार में थी और चिकित्सक इस दवा को सर्दी झुखाम जैसी बीमारियों के लिये लिखते थे तथा कई जोग इसका सेवन भी करते थे इस दवा को खाने के बाद कई लोगों की हालत बिगड़ी भी होगी और उनकी मौत भी हुई होगी लेकिन माना यह ही गया कि स्वाभाविक रूप से ही संबन्धित व्यक्ति बीमारी के बाद चल बसा लेकिन ऐसे लोगों की संख्या तो हजारों में रही होगी क्योकि इस दवा की सप्लाई आज से नहीं वर्षो से हो रही थी.सारा  मामला तभी  उजागर हुआ जब सामूहिक रूप  से एक के बाद एक मौत होने का मामला सामने आया? अब सवाल  यह है कि आखिर इस बात का पता कैसे लगाया जायेगा कि सर्दी झुखाम या अन्य किसी  कारणों से सिप्रोसि...

सिर पर सिर का चक्कर,सुरक्षित रोमांचक किन्तु महंगा भी!

सिर पर सिर का चक्कर,सुरक्षित रोमांचक किन्तु महंगा भी! अभी तक लोगों को आंख पर अंाख लगाने का अनुभव था अब प्रशासन और सरकार ने लोगों को सिर पर सिर लगाना सिखाना शुरू कर दिया है. बड़े नगरों में यह बहुत पहले  से है किन्तु छत्तीसगढ़ में कम से कम तीन बार के प्रयोग के बाद पहली दफा है.कुछ लोगों को यह भारी भारी लग रहा है तो कुछ को अटपटा तो कुछ को शर्म आ रही है लेकिन प्रशासन है कि सिर फटने से मौत की लगातार घटनाओं से तंग आकर अब किसी की नहीं सुनने के मूड़ में है. प्रशासन  की सख्ती को देखते हुए कुछ लोगों ने अपने सिर पर सिर लगाने का यंत्र [हेलमेट] बेचने का कारोबार शुरू कर दिया है. इसके लिये वे बाहर से लाद लादकर सिर ला रहे हैं और सड़क पर बैठकर अपना कारोबार शुरू कर  रहे हैं. खूब ऊंचे& ऊंचे दाम  पर सिर की खरीदी बिक्री हो रही हैं. अब हेलमेट लगाने का तरीका देखिये..कुछ लोग अपने परिचित को देखते ही शरमा जाते हैं और तुरंत निकालकर हाथ में पकड़ लेते हैं या फिर अपने बाइक पर टांग देते हैं कहते हैं यार सिर पर सिर लगाने के बाद यह पता ही नहीं चलता कि मैं कौन और तुम कौन..अच्छी बला डाल दी  सरकार ...

एसीबी के जाल में मछलियां सिर्फ तडपती हैं, मरती नहीं

एक लम्बे अंतराल  के बाद छत्तीसगढ़ का एंटी करप्शन ब्यूरो जागा, शुक्रवार  को उसने  एक बड़ी मछली को अपने जाल में फांसा। छत्तीसगढ़ शासन के वन  विभाग मरवाही में डीएफओ पद पर कार्यरत राजेश चंदेला ने संपूर्ण राज्य में अपना  साम्राज्य फैला  रखा है। छापे  में यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारी ने अपनी आय से कई गुना ज्यादा की संपत्ति बना डाली है। एंटी करप्शन विभाग की दो दिनी कार्रवाई में ही करीब पांच करोड़  रूपये की संपत्ति का पता चला है, इससे एक बात तो साफ हुई कि छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचारी जंगल में ऐसे कई भ्रष्टखोर मौजूद है जो सरकार में रहकर सरकार को चूना लगा रहे हैं लेकिन एसीबी यह नहीं बता पा रहा है कि इससे पूर्व की गई कार्रवाहियों पर क्या कार्रवाई की गई इनमें जून सन् 2012 में जांजगीर-चांपा अस्पताल के डा. आर चन्द्रा और रामकुमार थवाइत के ठिकानों से नौ करोड़, 5 अक्ूबर 2012 को प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास योजना के कार्यपालन यंत्री जे.एस जब्बी के ठिकानों से 4.5 करोड़, 22 जनवरी को  डिप्टी सेक्रेटरी एम.डी दीवान के ठिकानों से 47 मिलियन की संपत्ति तथा अंबिकापुर कलेक्ट्रेट लै...

और कितने शरद प्रशंसा, लवकुमार मारे जायेंगे

घरेलू हिंसा रोकने सरकार शराब बंद करें, मुफत अनाज की जगह काम के बदले राशन बांटे गौतम, शरद, विनय, प्रशंसा, लवकुमार यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ ऐसे मासूम बच्चे थे जिनने कम से कम ग्यारह माह से लेकर छह साल तक की जंदगी जी और बाद में माता पिता के बीच घरेलू कलह के चलते अथवा किसी प्रेम संबन्ध के चलते उन्हें इस दुनिया से रूकसत कर दिया. ऐस और भी बच्चे हैं,जिन्हें पूर्व में मार दिया गया जिनका नाम हमारें पास नहीं हैं. मारने वाले ओर कोई नहीं बल्कि इनकी खुद की मां थी या फिर इनका शराबी पिता. अपना अडियल रवैया या शराब की लत, अथवा जिद छोटे छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं.प्राय: सभी घटनाओं के पीछे घरेलू हिंसा,आर्थिक तंगी और शराब एक वजह है, जो परिवार की कलह और  मासूम बच्चों की मौत का कारण बन रही है. इन सबमें प्रमुख वजह शराब है.पिछले साल एक शराबी पिता ने वाल्मिकी नगर की गौतम छै साल, शरद चार साल और विनय दो साल को शराब के नशे में मौत के घाट उतार दिया था. इन बेचारों का क्या कसूर था? पति- पत्नी के बीच विवाद इनकी मौत का कारण बना. कोई सामान्य आदमी जो कृत्य नहीं कर सकता वह कृत्य शराब पीन...