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बीएसएनएल-सिर्फ बड़ी सरकारी कंपनी होने का घमंड, कान बंद कर रखे हैं इस विभाग के लोगों ने!



198 -यह बीएसएनएल की आटोमेटिक कम्पलेंट बुकिंग सेवा है- इसमें लैण्डलाइन में आई खराबी और इंटरनेट की कंम्पलेंट दर्ज होती है. सूचना दर्ज होते ही आपके मोबाइल पर सूचना आती है कि आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है, आपको कम्पलेंट नम्बर भी दे दिया जाता है, यह भी बताया जाता है कि आपके नम्बर की खराबी को दूर करने के लिये व्यक्ति को अधिकृत किया गया है उसका फोन नम्बर भी दिया जाता है लेकिन यह व्यक्ति कभी किसी का फोन नहीं उठाता. इस एक व्यक्ति की बात छोडिय़े पूरे डिपार्टमेंट में जिन लोगों को उपभोक्ताओं की शिकायतों को हल करने का दायित्व सौंपा गया है वे कभी अपना मोबाइल उठाने की जरूरत नहीं समझते. बीएसएनएल दावा करता है कि वह देश की सबसे बड़ी कंपनी है किन्तु आज स्थिति यह है कि इससे बकवास कंपनी और कोई नहीं है, चूंकि इसकी सर्विस इतनी लचर है कि इसे लेने के बाद लोग कोसते रहते हैं. बीएसएनएल बड़ी कंपनी होने के कारण लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं किन्तु यह कितनी अच्छी सेवा देती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रायपुर एयरपोर्ट और दुर्गा कॉलेज ने अपने क्षेत्र में इस सरकारी कंपनी से वायफाई लगवाने से इंकार कर दिया. जब बड़ी-बड़ी संस्थाओं का यह हाल है तो आम आदमी का क्या हाल होगा? रायपुर के पश्चिम क्षेत्र में दो या तीन एक्सचेंज है- एक टाटीबंध, उरला एवं एक कोटा में. उपभोक्ताओं को यह नहीं मालूम कि वे किस क्षेत्र में आते हैं. सर्वोदय नगर कालोनी में बीएसएनएल के सिर्र्फ  दो ग्राहक हैं. दो ग्राहक होने के बावजूद उन्हें सही सेवा नहीं मिल रही. यहां सड़क पर तो फाइबर केबल बिछा दिये गये हैं लेकिन उपभोक्ता के घर तक  सेवा पहुंचाने वाले केबल इतने पुराने हैं कि फोन में हमिंग होती है तथा आवाज सुनाई नहीं देती. वायफाई में भी इसका प्रभाव पड़ता है. स्पीड कम हो जाती है तथा कभी-कभी बंद भी हो जाता है. आम उपभोक्ता यद्यपि इस सेवा को अन्य निजी कंपनियों के मुकाबले इसे बेहतर समझते हैं लेकिन जब परेशानी आती है तो इस विभाग के लोग सोये रहते हैं. बीएसएनएल लैण्डलाइन के फोन भी पुराने हो चुके हैं. नये फोन आते ही अफसर दबाकर बैठ जाते हैं, यह उपभोक्ताओं तक पहुंचते ही नहीं. पैसा देने के बाद भी फोन उपभोक्ताओं को नहीं मिलता.

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …