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हर आदमी के हाथ बंधे हैं फिर पीड़ितों की मदद में कैसे हाथ बढ़ायें?




कोई सड़क पर किसी गुण्डे से पिटता रहे, कोई गुण्डा किसी महिला की सरेराह इज्जत उतार दे, कोई राह पर दुर्घटना में कराहता रहे, किसी को क्या फर्क पड़ता है? हमारे देश के कानून ने लोगों को कुछ ऐसा ही बना दिया, चाहते हुए भी वह मजबूर है! पिछले  शुक्रवार, शनिवार और रविवार को इलेक्ट्रानिक चैनल दिल्ली में मीनाक्षी मर्डर केस के संदर्भ में दिनभर चिल्लाता रहा कि 'कौन बचायेगा दिल्ली कोÓ? -शायद उन्हें नहीं मालूम कि अकेली दिल्ली नहीं पूरा देश यह पूछ रहा है कि कौन बचायेगा देश को? हर जगह न स्त्री सुरक्षित हैं और न पुरुष और न ही बच्चे. मीडिया में होने के कारण हम भी यही सवाल करते हैं कि कौन बचायेगा हमें? देश के करोड़ों सामान्य लोगों की जिंदगी आज सड़क पर कभी भी लाश में बदल सकती है. घर से निकलने वाला हर आदमी असुरक्षित है. वह सुरक्षित घर लौट आये तो भाग्यशाली वरना उसका दुर्भाग्य! मीनाक्षी, निर्भया और भी कई अन्य तो एक बार में इस दुनिया की बुराई से छुटकारा पाकर चली गईं लेकिन अन्य जीवितों के सामने आज भी प्रश्न बना हुआ है कि उनके सुरक्षा की क्या गारंटी?. सड़क, गली-कूचे पर होने वाली हर गंभीर घटना आम लोगों के लिये आज सिर्फ एक तमाशा बनकर रह गया है, इस तमाशे को देखने वालों में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो गुण्डे, मवालियों से शक्तिशाली व प्रभावशाली होते हैं किन्तु उन्हें भी उनका भविष्य मन को मसोसकर रखने मजबूर कर देता है. चूंकि आगे उनके सामने भी इससे बड़ी मुसीबतें हैं जिनका सामना करने में शायद वह सक्षम न हो. इससे खामोश रहने में ही वह अपनी भलाई समझता है. मीनाक्षी नामक दिल्ली की लड़की को दो गुण्डे भाइयों ने चाकू से 32 बार गोद-गोदकर मार डाला. इसे देखने वाला पूरा मोहल्ला था- इसमें उन गुण्डों से शक्तिशाली भी थे, युवा भी थे और बुुजुर्ग भी थे जो शायद इसलिये आगे नहीं आये कि चूंकि यह प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त गुण्डे पुलिस की पकड़ में नहीं आये तो उनके दुश्मन बन जायेंगे. दूसरा अगर पुलिस को बयान दिया तो वे खुद परेशानी में पड़ जायेंगे, इसके बावजूद कुछ महिलाएं कैमरे के सामने आकर बोलीं- उनकी हिम्मत को दाद देना चाहिये. ऐसे मामलों में प्राय: लोगों का नजरिया एक जैसा है. मदद सब करना चाहते हैं किन्तु दूसरा काम छोड़कर गवाही के लिये अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, यह विचार आते ही अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाते हैं. असल बात तो यह है कि मानवता के नाते हर कोई मदद करना चाहता है लेकिन ऐसे प्राय: सभी मामलों में लोग हाथ बांधकर तमाशबीन रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. सामूहिक विरोध कर ऐसे किसी व्यक्ति की पीटने से मौत हो जाये तो भी पुलिस और कानून उन्हें नहीं बख्शता. उल्टे उन्हें ही अपने किये पर दण्ड भोगना पड़ता है. ऐसे कई मामले हुए हैं और होते रहते हैं जिसमें किसी गुण्डे या अपराधी को पीटने वालों को ही पुलिस ने अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया. अपराधियों के अदालतो से छूटने पर क्या गारंटी की  गवाही देने वाला या उसका परिवार खुले में सांस ले सकेगा? ऐसे में कौन किसकी मदद करेगा? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घायलों की मदद कर उन्हे पहुंचाने वाले को कानून के दायरे से बाहर रखने के आदेश के बावजूद कानून पसंद लोग पूर्व के अनुभवों से इतना डरे हुए हैं कि वह किसी घायल को आज भी अस्पताल पहुंचाने से डरते हैं.

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
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चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …