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छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का नामोनिशान मिटेगा? हवा और जमीनी लड़ाई दोनों की बू!



क्या छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का सदा-सदा के लिये अंत होगा? बस्तर के घने जंगलों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक तो  कुछ ऐसा ही लग रहा है कि सरकार इस मौसम में कुछ ऐसा ही करने जा रही है कि आगे आने वाले समय में ऐसी कोई समस्या ही नहीं रहे. केन्द्र व राज्य सरकार का कोई भी जिम्मेंदार व्यक्ति यह नहीं कहता कि नक्सलवाद को समाप्त करने के लिये सेना को उतारा जायेगा. जब सेना की बात आती है तो नक्सली भी घबरा जाते हैं चूंकि सेना के अभियान में कोई नहीं बचता.छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के उदय को कई दशक बीत गये.कई मुठभेड़ें हुई और कई मारे भी गये, इनमे सुरक्षा बलों के लोग भी शामिल हैं. सामान्य वर्ग भी शामिल है और नेता भी शामिल हैं. सुरक्षा बलों के हाथों कई नक्सली भी मारे गये हैं. बहरहाल इन वर्षों में नक्सलियों ने भारी तादात मेें राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, कई का गला काटा तो कइयों को गोली से भूना. निर्दोष लोगों के खून से बस्तर की धरती लाल होती रही है.अब जिस अभियान का जिक्र कुछ समय से चल रहा है उसमें मिलट्री तो नहीं शामिल हो रही है लेकिन जानकारों के अनुसार यह पूरा अभियान मिलट्री स्टाइल पर होने वाला है तथा सुरक्षा बलों के जवानों को इसकी पूरी ट्रेनिंग भी दी जा रही है,मसलन अब जो भी होगा वह मिलट्री स्टाइल में ही युद्व की तरह ही होगा और इसमें भारी तादात में खून खराबे से भी इंकार नहीं किया जा सकता? इस अभियान में लगने वाले जवानों को पूर्वोत्तर के किसी सैन्य प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षित किया जा रहा है जबकि यह अंदेशा है कि कथित अभियान में जमीनी लड़ाई के साथ-साथ हवाई लड़ाई भी हो सकती है.बस्तर इन वर्षों में नक्सलियों का गढ़ बन चुका है. बीहड़ से आकर वे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों से हिल मिल जाते हैं और यह पता भी नहीं चलता कि कौन नक्सली है और कौन सामान्य नागरिक. ऐसे में यह निश्चित है कि कोई भी अभियान चलता है तो गेहूं के साथ-साथ धुन के भी पिसने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.नक्सलियों ने पिछले वर्षों में अपने गढ़ को काफी मजबूत किया है, उनके पास आधुनिक शस्त्रास्त्र है तो असला और बारूद की भी कोई कमी नहीं है.जंगल में रहते हुए भी यह सब मिल जाता है तो इसका मतलब तो यही है कि उनके तार दूर- दूर तक जुड़े हैं यहां तक कि उन्हें राशन भी आसानी से  उपलब्ध होता रहता है. इतने बड़े नेटवर्क को तोड़ने के लिये कितना बड़ा अभियान चलाना होगा और कितने लोग मारे जायेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती  है. अभियान के बाद क्या छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का सदा- सदा के लिये अंत हो जायेगा यह भी एक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है. आज की स्थिति में पूरे नक्सलवाद का नेट वर्क देश के अनेक राज्यों से जुड़ा हुआ है आसपास के राज्यों से नक्सली आना-जाना करते हैं. ऐसे में

नक्सलियों के अभियान से पहले ही नक्सलियों के बड़े नेताओं के निकल भागने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता.बीच में यह भी खबर आई थी कि छत्तीसगढ़ के किसी  स्थान पर नक्सलियों के बड़े लीडर एकत्रित हुए थे- इससे इस अनुमान को भी बल मिलता है कि सरकार के साथ साथ नक्सली भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं ऐसे में यह संघर्ष एक छोटे से युद्व के रूप में तब्दील हो जाये तो आश्चर्य नहीं।

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