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एक माननीय पर हर माह 2.92 लाख का खर्चा तो टैक्स और मंहगाई नहीं बढ़ेगी तो और क्या होगा?





कहते हैं परिवार में एक अधिकारी, एक पुलिसवाला, एक पत्रकार तथा एक नेता जरूर होना चाहिये जो परिवार की हर मुसीबतों को हल करें, लेकिन अब इस युग में उक्त बात में कोई दम नहीं रह गया. इन चारों में से अगर तीन को अलग कर दिया जाये तो सिर्फ नेता बच जाता है, परिवार में सिर्फ एक नेता ही काफी है और अगर यह नेता माननीय हो जाये तो सोने में सुहागा. हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाइली क्वालीफाइड आउट परफोर्मिगं सीईओ और अन्य ज्यादा वेतन पाने वालों से कहा है कि वे अपने वेतन में कटौती करें और एलपीजी की सब्सिडी न लें लेकिन क्या हाईली वेतन प्राप्त करने वाले देश के माननीय अपने वेतन में कटौती करने तैयार हैं? या वे एलपीजी सब्सिडी नहीं लेंगे? प्रधानमंत्री के विचारों का हम स्वागत करते हैंं. इसमें दो मत नहीं कि निजी क्षेत्रों में काम करने वालों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं अन्य लोगों से बहुत ज्यादा है, उनकी क्वालिफिकेशन भी उसके लायक है लेकिन देश के माननीयों पर क्या यह नियम लागू हो सकता है? जो जनता के बीच से उनकी सेवा के नाम पर चुनकर विधानसभा या लोकसभा में पहुंचते हैं-लाखों रुपये की कमाई का जरिया बना लेते हैं. एक माननीय जो देश के सबसे ऊंचे दरबार में पहुंचता है, क्या आम जनता जानती है कि उसकी आमदनी कितनी है? तथा वह निर्वाचित होने के बाद कितने भोग-विलासपूर्ण जिंदगी की ओर दाखिल हो जाता है? तो जानिये-उच्च दरबार में पहुंचे एक माननीय को एक महीने में वेतन के रूप में मिलता है पचास हजार रूपये, फिर उसे मिलता है पंैतालीस हजार रूपये जो उसका क्षेत्रीय भत्ता होता है. यात्रा भत्ते के रूप में आठ रूपये प्रतिकिलोमीटर जो करीब पड़ता है अड़तालीस हजार रूपये या मान लीजिये एक माननीय केरल से दिल्ली तक की 6000 किलोमीटर यात्रा करता है तो उसका भत्ता पक जाता है अड़तालीस हजार रूपये. संसद की बैठक के दौरान प्रतिदिन माननीय को मिलता है एक हजार रूपये. मामला यहीं खत्म नहीं होता-पूरे भारत में माननीय कितनी ही बार कहीं भी ट्रेन से एसी प्रथम दर्जे में बिना पैसा खर्च किये फ्र ी में सफर कर सकते हैं. इसी प्रकार हवाई जहाज में अगर माननीय चढ़ते हैं तो यहां भी सपत्नीक उन्हें सालभर में चांैतीस बार बिजनेस क्लास में बैठकर नि:शुल्क यात्रा की सुविधा है. माननीयों को दिल्ली में बिना किराये के नि:शुल्क रहने की सुविधा है. पचास हजार यूनिट तक बिजली भी नि:शुल्क  उपयोग कर सकता है. माननीय 1,50,000 टेलीफोन काल भी बिना कोई पैसा दिये कर सकते हैं. वह ससंद के होटल में अन्य होटलों से तीन या चार गुना सस्ता खाना भी उच्च कोटि के स्वादिष्ट व्यजंनों के साथ खा सकता है. एक माननीय का जो शिक्षित हो या न हो अथवा साधु-संत हो पर खर्च प्रति माह दो लाख बयानवे हजार रूपये है जो प्रति साल 35,00,000 के करीब जाता है. पांच साल के कुल खर्च का हिसाब लगाया जाये तो यह पहुंचता है करीब 1,75,00,000. गरीब और मध्यमवर्ग से भरपूर इस देश की सबसे बड़ी व्यवस्थापिका में इस समय माननीयों की संख्या 543 है और उनपर पांच साल में खर्च 9,50,25,00,000 अर्थात करीब 950 करोड़ रूपये का. क्या इतना खर्च होने के बाद हमारे देश का गरीब व मध्यमवर्ग का व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सकेगा? जबकि अभी हाल ही वेतन में और बढ़ोत्तरी की मांग की गई है. हमारे जेब पर प्रतिदिन प्रहार हो रहा है. टैक्सों में रोजमर्रा बढ़ोत्तरी हो रही है, वस्तुओं के भावों में निरंतर वृद्वि हो रही है. आखिर माननीयों पर खर्च होने वाला पैसा कहां से निकल रहा है? कुछ लोगों को सुविधाएं देने के लिये हमारे बच्चों को भूखे मारने का सिलसिला आखिर कब तक चलेगा?

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