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पहुंच,प्रभाव के आगे फिरबौना हुआ देश का तराजू!

रायपुर,7 सितंबर 2010
पहुंच,प्रभाव के आगे फिर
बौना हुआ देश का तराजू!
हमारी न्याय व्यवस्था को विश्व ने सराहा है, चाहे वह अयोध्या में राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला हो या फिर मुम्बई में आंतकी हमलों में जीवित बचे एक मात्र आंतकी अब्दुल अजमल कसाब के मामले में हाईकोर्ट का फैसला हो। किंतु पिछले कुछ समय से जो फैसले आ रहे हैं। वह अपराधियों के लिये तो राहत देने वाला है, मगर समाज में इसका गलत संदेश जा रहा है। न्याय व्यवस्था पर पिछले कुछ समय से लगातार उंगली उठ रही है जिसमें न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार से भी संबन्धित है। कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है। भोपाल गैस ट्रेजडी पर दिये गये फैसले ने पहली बार सबको चौकाया और उसकी जगह-जगह थू -थू हुई। क्योंकि जिस मामले में आरोपियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिये था। उन्हें मामूली जुर्माने और कम सजा में ही निपटा दिया गया। ऐसे लगा कि न्याय को खरीद लिया गया। इस मामले में हजारों लोगों की जान चली गई थी तथा इसमें हत्या का मुकदमा दायर करना था। उसकी जगह कम धाराएं लगाकर मामला कोर्ट में पेश किया गया और आरोपी एक तरह से छूट गये। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टृ मामले में जो फैसला दिया उसने पूरे देश को चौका दिया। लोगों में यह प्रतिक्रिया है कि गरीब व पहुंच विहीन लोगों के लिये अलग न्याय है और पहुंच वालों के लिये अलग न्याय। इस मामले में आरोपी एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का बेटा है। संतोष कुमार सिंह को छात्रा प्रियदर्शिनी की बलात्कार के बाद हत्या करने के आरोप में फांसी पर लटकाएं जाने का आदेश था। सुप्रीम कोर्ट में मामला पहँुचने के बाद इस मामलें में न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संतोष कुमार सिंह के खिलाफ इतने पुख्ता सबूत नहीं है कि उसे फांसी पर लटकाया जाए। जेल में रहने के दौरान उसके चाल- चलन में बदलाव की बात भी फैसला देते समय कही गई है। ऐसे कितने ही लोग आज देश की जेलों में सजा भुगत रहे हैं जिनके अपराधों के पुख्ता सबूत नहीं है और वे जेल की सींखचों के पीछे सड़ रहे हैं। उनके पास न पहुंंच हैं, न साधन और न ही वे सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ सकते हैं। इस फैसले के बाद प्रियदर्शनी की मां नीलम कटारा का यह बयान भी देश की न्याय व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है कि- भारत में उम्र कैद का मतलब गुनहगारों के लिये आजादी होता है। वर्ष 2006 में संतोष सिंह को दिल्ली की उच्च न्यायलय ने फांसी की सजा सुनाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद में बदल दिया। इस मामले में शुरू से कानूनी पचड़ा रहा। हत्या और बलात्कार के बाद आरोपी आईपीएस के लड़के को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन निचली अदालत ने उसे दोषी बताने के बावजूद सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। मामला सीबीआई के पास गया और उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इस सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुुनौती दी गई और अंतत: निराशाजनक फैसले ने यह संदेश दिया कि पहुंच, प्रभाव के आगे कहीं- कहीं न्याय भी बौना है। अगर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाइ्रकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता, तो शायद इस फैसले की इतनी आलोचना नहीं होती।

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …