गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

पहुंच,प्रभाव के आगे फिरबौना हुआ देश का तराजू!

रायपुर,7 सितंबर 2010
पहुंच,प्रभाव के आगे फिर
बौना हुआ देश का तराजू!
हमारी न्याय व्यवस्था को विश्व ने सराहा है, चाहे वह अयोध्या में राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला हो या फिर मुम्बई में आंतकी हमलों में जीवित बचे एक मात्र आंतकी अब्दुल अजमल कसाब के मामले में हाईकोर्ट का फैसला हो। किंतु पिछले कुछ समय से जो फैसले आ रहे हैं। वह अपराधियों के लिये तो राहत देने वाला है, मगर समाज में इसका गलत संदेश जा रहा है। न्याय व्यवस्था पर पिछले कुछ समय से लगातार उंगली उठ रही है जिसमें न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार से भी संबन्धित है। कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है। भोपाल गैस ट्रेजडी पर दिये गये फैसले ने पहली बार सबको चौकाया और उसकी जगह-जगह थू -थू हुई। क्योंकि जिस मामले में आरोपियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिये था। उन्हें मामूली जुर्माने और कम सजा में ही निपटा दिया गया। ऐसे लगा कि न्याय को खरीद लिया गया। इस मामले में हजारों लोगों की जान चली गई थी तथा इसमें हत्या का मुकदमा दायर करना था। उसकी जगह कम धाराएं लगाकर मामला कोर्ट में पेश किया गया और आरोपी एक तरह से छूट गये। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टृ मामले में जो फैसला दिया उसने पूरे देश को चौका दिया। लोगों में यह प्रतिक्रिया है कि गरीब व पहुंच विहीन लोगों के लिये अलग न्याय है और पहुंच वालों के लिये अलग न्याय। इस मामले में आरोपी एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का बेटा है। संतोष कुमार सिंह को छात्रा प्रियदर्शिनी की बलात्कार के बाद हत्या करने के आरोप में फांसी पर लटकाएं जाने का आदेश था। सुप्रीम कोर्ट में मामला पहँुचने के बाद इस मामलें में न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संतोष कुमार सिंह के खिलाफ इतने पुख्ता सबूत नहीं है कि उसे फांसी पर लटकाया जाए। जेल में रहने के दौरान उसके चाल- चलन में बदलाव की बात भी फैसला देते समय कही गई है। ऐसे कितने ही लोग आज देश की जेलों में सजा भुगत रहे हैं जिनके अपराधों के पुख्ता सबूत नहीं है और वे जेल की सींखचों के पीछे सड़ रहे हैं। उनके पास न पहुंंच हैं, न साधन और न ही वे सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ सकते हैं। इस फैसले के बाद प्रियदर्शनी की मां नीलम कटारा का यह बयान भी देश की न्याय व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है कि- भारत में उम्र कैद का मतलब गुनहगारों के लिये आजादी होता है। वर्ष 2006 में संतोष सिंह को दिल्ली की उच्च न्यायलय ने फांसी की सजा सुनाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद में बदल दिया। इस मामले में शुरू से कानूनी पचड़ा रहा। हत्या और बलात्कार के बाद आरोपी आईपीएस के लड़के को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन निचली अदालत ने उसे दोषी बताने के बावजूद सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। मामला सीबीआई के पास गया और उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इस सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुुनौती दी गई और अंतत: निराशाजनक फैसले ने यह संदेश दिया कि पहुंच, प्रभाव के आगे कहीं- कहीं न्याय भी बौना है। अगर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाइ्रकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता, तो शायद इस फैसले की इतनी आलोचना नहीं होती।