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कार्यपालिका, विधायिका सुस्त हो तो न्यायपालिका दखल तो करेगी ही!




कार्यपालिका और विधायिका पर बहस एक आम बात है किन्तु हमारी मौजूदा संसदीय लोकतांत्रिक पद्धति के तीसरे खंबे न्याय पालिका पर बहस नगण्य है जितनी है वह प्रकृति में अकादमिक है और केवल सेवा निवृत्त न्यायाधीशों, वकीलों के संगठनों और गिने चुने राजनेताओं तक सीमित है. आमजन उससे बहुत दूर है, विगत कुछ समय से न्याय व्यवस्था पर खुली बहस की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई है.संसदीय लोकतंत्र में न्याय पालिका की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन उसकी कार्यप्रणाली में अनेक कमजोरियाँ और कमियाँ भी हैं जिन्हें दुरूस्त किया जाना आवश्यक है जिससे न्याय व्यवस्था की दक्षता को उन्नत बनाया जा सके.
कुछ लोग यह राय प्रकट करते हैं कि न्यायपालिका की आलोचना से न्यायव्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठ सकता है जो कि अत्यन्त खतरनाक स्थिति होगी किन्तु जनतांत्रिक मूल्य इस राय से सहमत होने की अनुमति प्रदान नहीं करते.किसी भी व्यवस्था की आलोचना के बिना उसकी कमियों, कमजोरियों और दोषों को दूर किया जाना संभव नहीं है और ये कमियां, कमजोरियां तथा दोष ही व्यवस्था में जन-विश्वास को समाप्त कर देते हैं.न्याय प्रणाली में जन विश्वास को केवल कमियों, कमजोरियों और दोषों को दूर करने और सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली के द्वारा ही अर्जित किया जा सकता है.वर्तमान में न्यायपालिका और विधायिका के बीच संबन्ध कुछ ठीक नजर नहीं आ रहे हैं. दोनों में टसल अब कई मुद्दो को लेकर हो गई है जबकि विधायिका में बैठे लोग लोकतंत्र की दुहाई देते हुए न्यायपालिका पर दोषारोपण कर रहे हैं. कोई कह रहा है कि जजों को अपना पेशा छोड़कर चुनाव मैदान में उतरना चाहिये तो कोई न्यायपालिका के बढ़ते दायरे से नाराज है. हाल के दिनों में न्यायपालिका के कथित निर्देशो को विधायिका अपने अधिकार क्षेत्र की बात कहकर न्यायपालिका पर उसके कार्यो में हस्तक्षेप की बात कह डाली.केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी न्यायपालिका के बढ़ते दायरे पर नाराजगी जताई है उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इमारत धीरे धीरे गिराई जा रही है। इससे पहले गडकरी ने भी तंज भरे लहज़े में जजों को इस्तीफा देकर चुनाव लडऩे की नसीहत दी थी. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कार्यपालिका और विधायिका में न्यायपालिका के बढ़ते दखल पर चिंता जताते हुए चेताया कि टैक्स और वित्तीय मामले भी अदालतों के हवाले नहीं किए जाने चाहिए. जेटली ने सूखे के लिए राहत कोष पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाए.सुप्रीम कोर्ट ने सूखे को लेकर राज्य सरकारों को फटकार लगाई थी और केंद्र को सूखे पर एसटीएफ बनाने का निर्देश दिया थर.अदालत के इस रवैये को सरकार अपने अधिकारों में दख़ल मान रही है. राज्य सभा में बजट पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री ने इसके दूरगामी परिणामों के बारे में आगाह किया. इस बहस के दौरान कांग्रेस की यह मांग थी कि जीएसटी मामले में अगर केंद्र और राज्य के बीच मामला फंसता है तो जज इस पर फैसला सुनाए, इस पर जेटली ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह लोकतंत्र पर एक तरह से हमला होगा.हाल के दिनों में तमाम मुद्दों पर पीआईएल के ज़रिए अदालती दखल बढ़ा है. दिल्ली के पर्यावरण का सवाल, कारों की बिक्री और टैक्सियां चलाने का सवाल और राज्यों में राष्ट्रपति शासन तक का सवाल अदालती गलियारों में निपटाया जाता रहा है। जब कांग्रेस ने जीएसटी विवाद निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत ट्राइब्युनल बनाने की मांग की तो जेटली ने इस पर भी चेतावनी दी. उनके अनुससार कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.जीएसटी मामले में विवाद को लेकर काउंसिल कह सकती है कि दो वरिष्ठ मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री मिलकर राजनीतिक तौर तरीके से इस मुद्दे को सुलझा सकते हैं। यह कानूनी मसला नहीं है कि कितना फीसदी बंगाल को जाए और कितना फीसदी हमारे पास रहे. दूसरी और बड़ी  विपक्षी पार्टी कांग्रेस  अदालत के सामने विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी करने से बचने की बात करती है, हालांकि संसद में कांग्रेस के सदस्यों को मेजे थपथपाते हुए भी देखा गए याने विधायिका अपने कथित अधिकार क्षेत्र में किसी  प्रकार का हस्तक्षेप बर्दाश्त करने कतई तैयार नहीं है. न्यायपालिका पर जनता का विश्वास है हमारी न्यायपालिका विश्व स्तर की है उसपर किसी को उंगली डठाने का अधिकार नहंीं चाहे वह विधायिका ही क्यों न हो. अगर जनता के काम को विधायिका और कार्यपालिका दोनों नजर अंदाज करें तो उसका कोई  तो रखवाला होना ही चाहिये.न्यायपालिका अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वाह कर रही है.

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