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'इनमे से कोई नहीं के बाद भी एक आप्शन है,सरकार को चिंता नहीं

आप अपना वोट जरूर दे कि अपील आसान लेकिन वोट किसे दें? हालाकि अगला चुनाव शायद जल्द आ जाय या फिर पांच साल पूरे करे लेकिन इस चुनाव ने फिर कई सवालों को यूं ही छोड़ दिया है?सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, सुपर स्टार आमिर खान सहित कई प्रमुख हस्तियों और सरकारी विज्ञापनों ने जनता को इस चुनाव में जागृत करने का प्रयास किया लेकिन वोटों का प्रतिशत कहीं शत प्रतिशत नहीं रहा. लगातार वोट के प्रतिशत में कमी या लोगों मे वोट न देने की प्रवृत्ति पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तो यहां तक कह दिया कि जो वोट न दे उसपर कानूनी कार्रवाही करनी चाहिये. चुनाव आयोग की सिफारिश पर जिस नोटा को संवैधानिक अधिकार में शामिल कराने में राजनीतिज्ञों और सरकार की अडगेंबाजी के कारण ग्यारह साल का समय लग गया वे वोट न डालने पर सजा की बात किस मुंह से करते हैं? भारत का नागरिक होने का हमें गर्व है और एक सच्चे नागरिक के तौर पर हम भी वोट देना चाहते हैं लेकिन किसे? वे जिन्हें पार्टियां चुनाव मैदान में उतारती हैं?जिनके खिलाफ कई किस्म के अपराध,आरोप और मामले दर्ज हैं या उन्हें जो चुनकर जाने के बाद संसद का समय बर्बाद क रते हैं य...

कौन जिम्मेदार है शहर में पीलिया फैलाने के लिये?

जब प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदते हें और जब बीमारी से मौते होने लगती है तब हमें याद आती है सफाइ!र् स्वास्थ्य कार्यक्रम! और दुनियाभर के एहतियाती कदम! राजधानी रायपुर के मोहल्लों में कम से कम तीन महीनों से पीलिया महामारी का रूप धारण किये हुए हैैं और हमने अपने इन्हीें  कालमों में यह भी बताया था कि इसके पीछे कौन से प्रमुख कारण है किन्तु किसी ने इसपर संज्ञान नहीं लिया, अब जब आज यह बीमारी संक्रामक रूप ले चुकी है और एक साथ दो-दो मौते हो चुकी है तब प्रशासन को याद आ रहा है कि हां कुछ तो करना पड़ेगा नहीं तो लोग कीड़े मकोडा़ें की तरह मरने लगेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी आनन फानन में बीमारी की गंभीरता से अवगत करा दिया गया.लगातार लोगों के बीमार पड़ने के दौरान इसकी गंभीरता से अवगत कराने की जगह दो मौतों के बाद खबर उनके उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान ही पहुंचाई गई.रविवार को एक एनआईटी छात्र और बाद में एक महिला की मौत ने संपूर्ण प्रशासन को हिलाकर रख दिया और शहर  में सनसनी व दहशत का माहौल निर्मित हो गया.अफसरों ने बीमारी की गंभीरता से तो मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया पैसे भी स्वीकृत करा लिया ल...

जल प्रबंधन इतना कैसे बिगड़ा कि गांवों में सूखा पड़ने लगा!

  कोई यह नहीं कह सकता कि इस वर्ष बारिश कम हुई, इन्द्र देवता खुश थे, खूब लबालब बारिश से नदी नाले सब भर गये, यहां तक कि मनुष्य द्वारा निर्मित बांधों में भी इतना पानी भर गया कि बांधों के गेट खोलकर पानी बहाया गया,इससे कई गांवों में बाढ़ की स्थिति निर्मित हुई.सवाल यहां अब यही उठ रहा है कि मानसून अनुकूल व सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में सूखे के हालात क्यो पैदा हो रहे हैं. क्यों महासमुन्द और अन्य  अनेक  क्षेत्रों में सूखे की नौबत आई?क्यों महानदी का पानी सूख गया और क्यों धरती का जलस्त्रोत नीचे गिरता जा रहा है?क्या यह हमारी प्रबंध व्यवस्था की खामियां थी जिसके कारण अप्रैल महीने से लोगों को सूखे की भयानक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. यह अब स्पष्ट होने लगा है कि शहरी क्षेत्रों के साथ साथ ग्रामीण इलाकों में पेय  जल के साथ निस्तारी की  समस्या भी गंभीर रूप  धारण करती जा रही है. गांव के गाव खाली होना शुरू हो गया है, मवेशियों तक  के लिये पीने का पानी गांवों में नहीं रह गया है. सूखे पर लोग अपना व्यापार चलाने लगे हैं एक एक टेैंकर पानी  की कीमत ...

क्या देश लहर पर लहरा रहा

          सिर्फ 22 दिन..प्रतीक्षा कीजिये... अच्छे या पुराने दिन का! - क्या देश में किसी एक पार्टी की लहर है? -क्या इस बार देश में सत्ता का परिवर्तन होगा?  -क्या सौ साल से ज्यादा पुरानी कांग्रेस की ऐसी स्थिति हो जायेगी जो आज तक कभी नहीं हुई? -क्या आज देश में वैसी लहर बह रही है जो कभी इमेरजेंसी के बाद थी या वैसी लहर,जो इंदिरा  गांंधी के पुन: सत्ता में आने के समय थी?  -क्या भाजपा आज अटल बिहारी बाजपेयी के समय से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है?अथवा यह नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है जिसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने सिर पर ले रखा है   नरेन्द्र मोदी की सभाओं में जनसैलाब को अगर लहर मान लिया जाये तो देश के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में यह लहर है. हिन्दी चैनलों में भी यह लहर है, मगर क्या यह लहर पूरे देश की फिजा को ही बदलकर रख देगा? यह गंभीर किन्तु कठिन प्रन है जिसका जवाब 16 मई के बाद ही प्राप्त होगा लेकिन इससे पहले देश का आधे से अधिक भाग मोदी और सुषमा स्वराज के साथ यही कह रहा है कि ''अच्छे दिन आने वाले हैं....

मानसिक अस्वस्थों की जिंदगी सड़क पर..जिम्मेदार कौन

एक व्यक्ति तीन दिन तक एक बड़े घराने की गेट के सामने भीषण गर्मी आंधी बारिश में पड़ा रहा. घर के लोगों ने भी उसे देखा, किन्तु पुलिस को खबर करने की जगह उसे अपने नौकरों के मार्फत सरकाकर गली तरफ डाल दिया. आते जाते लोगों ने भी देखा किन्तु किसी को उसपर दया नहीं आई आखिर तीसरे दिन आसपास के लोगों को लगा कि यह शख्स अब मरने वाला है और यहीं पड़ा-पड़ा सड़ जायेगा तो इसकी सूचना पुलिस को देने के लिये दौड़ धूप शुरू हुई और अंतत: पुलिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया.जब पुलिस से यह पूछा गया कि शहर में ऐसे घूमने वाले मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के पास आपके पास क्या व्यवस्था है तो पुुलिस का जवाब था कि हमको सूचना मिलती है तो हम पहुंचते हैं गाड़ी बुलावते हैं, गाड़ी नहीं तो अपने खर्चे पर ही किसी गाड़ी में डालकर मानवता के नाते उन्हें सरकारी अस्पताल पहुंचा देते हैं अस्पताल में ऐसे लोगों के साथ कौनसा ट्रीटमेंंट होता होगा यह सब जानते हैं.  ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचाने वाले पुलिस के लोगों का ही यह कहना है कि थोड़ा बहुत ठीक होने के बाद फिर वैसे ही यह सड़क पर नजर आते हैं. कहीं कूड़ेे के ढेर के पास तो कहीं उस स्थान पर जहां कोई शाद...

गांवों में बिजली-पानी नहीं होने का दर्द...!

यह सन् 1950 के बाद के वर्षो की बात है जब हम भोपाल में रहा करते थे, एक ऐसी कालोनी जहां बिजली होते हुए भी हमारे पास पंखा नहीं था, प्रकृति की हवा मे जीना ही हमारी दिनचर्या थी.गर्मी में सारे शरीर पर घमोरियां परेशान  करती थी,हमें इंतजार रहता था बारिश का कि बारिश होगी तो इस समस्या से मुक्ति मिलेगी लेकिन आगे के वर्षो में हम भाइयों ने गुल्लाख में जेब खर्च इकट्ठा करके एक टेबिल फेन लिया तो लगा कि इसके नीचे सोने वालों को कितना मजा आता रहा होगा.हमें पानी   सार्वजनिक नल या कुए से भरना पड़ता था जहां अलग अलग राज्यों से आये लोगो से झगड़ा भी करना पड़ता था चूंकि कोई एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे. बहरहाल इस दुखड़े के पीछे छिपा है वही दर्द जो आजादी के पैसठ वर्षो बाद भी हमारे देश के करोड़ों लोगों को झेलना पड़ रहा है जो बिना बिजली-पानी के दूरदराज गंावों में निवास करते हैं.उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं. वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की बात करने वाले हमारे मंत्री नेता सिर्फ बाते ही करते हैं.जनता की सेवा के नाम पर  वोट मांगते हैं लेकिन उस गरीब, आदिवासी, हरिजन या सामान्य वर्ग की जनता की कुटिया की ...

मायावी चक्रब्यूह खूनी पंजों का, जो फंसा वह मरा

शहीदों की बोली कब तक लगेगी?कितने और लोगों को यूं ही जीवन गंवाना होगा-सरकार बताये? &''एक ब्लास्ट... कई जवान शहीद, &प्रत्येक के परिवार को तयशुदा बीस लाख का मुआवजा- &श्रद्वांजलि, निंदा, तोपों की सलामी और उसके बाद सब भूल जाओं... मुआवजा लेेने के लिये परिजन चक्रब्यूह में फंस जाते हैं, उन्हेें कभी दस्तावेज के लिये प्रताड़ित होना पड़ता है तो कभी किसी अन्य कारण सेÓÓ इसके बाद  फिर वही विस्फोट...नौजवानों का एक नया बेच मायावी नक्सली गुफा में शहीद हो जाता है.आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा?क्या सरकार बस्तर सहित देश के कतिपय राज्यों में इस प्रकार के नक्सली संयत्र खोलकर रखे हुए हैं जो देश के नौजवानों और सरकारी अफसरों को मौत के घाट उतारने के लिये बना रखा है?या नेताओं व सरकार के संरक्षण में इस प्रकार के मायावी संयत्र चल रहे हैं?संदेह इस बात को लेकर भी उठता है कि क्यों नहीं सख्त कदम उठाये जाते?देश के नौजवानों को जानबूझकर मौत के सौदागरों के हाथ सौंपा जा रहा है.एक जवान मरता है तो उसके साथ- साथ उसका पूरा परिवार मरता है. ऐसे गुमराह लोग इस खूनी ताण्डव में लगे हैं जो यह भी नहीं बता ...

यह चुनाव है या जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर मारकाट का ऐलान

'''मार डालेंगे, काट डालेंगें , टुकड़े टुकड़े कर देंंगें- हमें सत्ता में आ जाने दो तब हम बतायेंगेÓं- ÓÓऐसे कुछ बयान  हैं जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व में उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के मुख से निकल रहे हंै.आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य क्या यही है जो हमारे नेताओं के श्रीमुख से सुनाई दे रहा है. सिंहासन पाने के लिये कोई मुस्लिमों को रिझा रहा है तो कोई हिन्दुओं को तो कोई दलितो को रिझाकर आगे बढ़ रहा है. युवाओं को दिग्भ्रमित करने की कोशिशे भी की जा रही है. मुद्दे, जनता तथा देश हित को लेकर बात करने की जगह नेता ये कहां एक दूसरे को लड़ाने वाले मुद्दे लेकर सामने आ गये? दिलचस्प तथ्य तो यह है कि कोई यह नहीं कह रहा कि वह अगर सिहासन पर काबिज होता है तो देश और देश की जनता के लिये क्या करेगा? उसकी विदेश नीति क्या होगी? आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर बनने वाली सरकार क्या करने वाली है? पडौसी राष्ट्रों, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के प्रति उसका रवैया क्या होगा? ऐसे अनेक मद्दों के अलावा यह भी कोई नहीं बता रहा कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के...

शहरों में आबादी का बोझ

शहरों में आबादी का बोझ अब चिंता का सबब बनता जा रहा है। सरकार इसपर चिंतित हैं किंतु क्या सिर्फ ङ्क्षचंता करने से इस समस्या का समाधान निकल जायेगा? बढ़ते बोझ से कई प्रकार की समस्याएं जन्म ले रही हैं। शहरों के ट्रैफिक में वूद्वि हो रही है, तो अपराध बढ़ रहे हैं। अलग- अलग गांवों से लोग रोजगार की तलाश में शहरों में पहुंचते हैं। जब रोजगार नहीं मिलता तो अपराध का रास्ता ढूंढ लेते हैं। जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के पांच वर्ष पूरे होने के बाद शहरीकरण संबंधी योजनाओं-परियोजनाओं को थोड़ी गति मिलने के आधार पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट होने का मतलब है, सामने खड़ी चुनौतियों से मुंह मोडऩा। शहरों के आसपास पड़ी कृषि भूमि जहां कांक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही हैं। वहीं गांव के अपने खेतों को जोतने के लिये आदमी नहीं मिल पा रहे हैं। धीरे- धीरेे हमारे नीति-निर्धारकों को उन विशेषज्ञों के सुझावों पर तत्काल प्रभाव से गंभीरता प्रदर्शित करनी ही होगी। जिन्होंने शहरों की परिवहन व्यवस्था और अन्य समस्याओं का उल्लेख करते हुए एक निराशाजनक तस्वीर पेश की है। यह ठीक नहीं कि शहरो...

छत्तीसगढ़ में तेजी से फैल रहा लेबर 'फलू

निर्माण कार्य में लगे एक ठेकेदार को उस दिन काफी गुस्से में देखा गया, पता चला कि रात में उसके बंधक बनाये मजदूरों में से कुछने भागने का प्रयास किया. कुछ तो पकड़ लिये गये, कुछ भागने में सफल हुए. इस संपूर्ण मामले पर से जब पर्दा हटा तो पता चला कि ठेकेदार बंगाल से गरीब परिवार के लड़कों को बर्गलाकर छत्तीसगढ़ में लाते हैं और उनसे यहां सस्ते में काम कराते हैं. मजदूरों को उनका पैसा उनके घर पर ही एक मुश्त राशि के रूप में दे दिया जाता है,जो, करीब पांच छै हजार रूपये होता है,फिर चाहे उनसे जितनी भी देर, सुबह नौ बजे से लेकर देर रात दस बजे तक भी हो काम कराओ. यह धंधा अकेले बंगाल के  गरीब परिवार के युवकों के साथ ही नहीं हो रहा बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीबों के साथ भी हो रहा है. छत्तीिसगढ़ में तेजी से फैल रही इस रोजगार बीमारी- जिसे लेबर फलू का नाम दिया है, के कारण छत्तीसगढ़ के प्राय: घरों से यह आवाज सुनने को मिल रही है कि 'लेबर नहीं मिल रहे, काम रूका पड़ा है...Óचूंकि सारा काम ठेके पर चल रहा है. बंगाल, बिहार,उडीसा और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ छत्तीसगढ़ के मजदूरों को भी देकेदार उसी रेट पर खरीद ले...

खून की प्यासी क्यों हो रही नई पीढ़ी?

एक बारह साल की लड़की ने अपने नौ साल के भाईर् की गला काटकर हत्या कर दी.जुवेनिल कोर्ट ने दिल्ली दुष्कर्म कांड के नाबालिग सर्वाधिक क्रूरतम कर्म करने वाले आरोपी को तीन वर्ष की कैद की सजा दी. यह खबरे सुनकर सभी को आश्चर्य तो हुआ होगा साथ ही यह भी मन में विचार आया होगा कि वर्तमान पीड़ी किस बहाव में बह रही है.बहन द्वारा भाई की निर्ममतापूर्वक हत्या का मामला अभी बुधवार का ही है जिसने संपूर्ण  जगन्नाथपुर जमशेदपुर झारखंड सहित पूरे देश को सोचने के  लिये मजबूर कर दिया कि देश की युवा पीढ़ी का एक बहुत बड़ा वर्ग किस तरफ बढ़ रहा है और हमारा समाज उसे क्यों गंभीरता से नहीं ले रहा. यह भी सवाल उठने लगा है कि आजकल टीवी चैनलों में दिखाये जा रहे इंटरनेट के एक विज्ञापन की तरह क्या बच्चा पैदा होते ही इतना ज्यादा एडवांस हो गया है कि वह सारी दुनियादारी को समझकर समाज के एक बहुत बड़े हिस्से के लिये खतरनाक साबित होने लगा है.अभी कुछ दिन पहले की बात है रायपुर की एक कालोनी में दो तीन बच्चे जिनकी उमर करीब दस बारह साल के आसपास की होगी एक घर में चंदा मांगने पहुंचे वहां उनकी उस व्यक्ति से चंदे को लेकर कु छ विवाद हुआ. ...

कौन है पब्लिक सर्वेंट नेता या अफसर?

कौन है पब्लिक सर्वेंट नेता या अफसर?  पब्लिक सर्वेंट कौन? एक बड़े नेता के अनुसार हम पब्लिक सर्वेंट हैं? अगर हां तो नौकरशाहों को क्या कहें? नेता किस तरह के पब्लिक सर्वेटं? जो अपनी योग्यता नौकरशाहों से कम रखते हैं?तथा पब्लिक सर्वेंट होने का दंब भरते हैं, नेता जनता का सेवक मानते हैं तो तो उनका चुनाव भी उन सरकारी सेवकों की तरह क्यों नहीं? जो पढ़ लिखकर बड़ी- बड़ी इंटर्व्यू फेस करते हें और उसके बाद ही ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठने का हक हासिल करते हैं.आईएएस,आईपीएस,आईआरएस, आईएफएस जैसी सेवाओं की नौकरी पाने के लिये दिन रात मेहनत व ऐडी चोटी एक करनी पडती है लेकिन दुर्भाग्य कि बाद में यही नौकरशाह उन मिडिल और हायरसेकेण्डरी पास या फैल लोगों के आगे सलूट ेमारने और हाथ जोड़कर खड़े होने के लिये मजबूर हो जाते हैं.क्या यह इस देश के नौजवानो का अपमान नहीं है? क्या चुनाव आयोग या देश की सर्वोच्च अदालत को इस भेदभाव पर गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? क्यों नहीं देश के कर्णधार बन जाने वाले कथित पब्लिक सेवकों के लिये भी एक ऐसी तगड़ी व्यवस्था से गुजरने का रास्ता बना देती जो इस विषम विभिन्नता  को दूर नहीं क...

क्यों की सीएसपी देव ने आत्महत्या?

25 फरवरी 2014  पिछली रात जज मारपीट कांड में निलंबित सीएसपी देवनारयण पटेल के घर जो कुछ हुआ वह चौका देने वाला है। प्रारंभिक रिपोर्ट यही कह रही है कि 2007 बेच के देवनारायण पटेल ने अपने घर में पत्नी प्रतिमा व दो बच्चों को गोली मारने के बाद खुद को भी गोली मार दी। दोनो बच्चों का रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में इलाज चल रहा है जहां बच्ची की  हालत गंभीर बताई जा रही है वहीं बेटे को खतरे से बाहर बताया गया है।। देवनारायण एक दबंग पुलिस अफसर के रूप में माने जाते रहे हैं उन्हें नक्सलियों से मुकबले के लिये वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपूर्ण घटना के पीछे रविवार रात का वह मामला है जिसमें पुलिस वालों की एक टीम सीएसपी के नेतृत्व में ढाबों व होटलो में अवैध शराब की जांच के लिये निकली थी, इस दौरान  सीएसपी की टीम संगम होटल  के पास पहुंची जहां जाम लगा हुआ था, इसी बीच डीएसपी व एडीजे ए. टोप्पो के बीच कहा सुनी हो गई और बात मारपीट तक आ पहुंची। बताया जाता है कि मारपीट के दौरान जज ने अपना परिचय भी दिया था लेकिन इसका असर पुलिस वालों पर नहीं हुआ, पुलिस का  आरोप था कि जज नशे में थ...

चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल के बीच एक युग का अंत!

चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल के बीच एक युग का अंत! आडवानी मान गये, जसवंत सिंह रूठ गये और छाया का बी फार्म रूक गया... ऐसी खबरों के बीच आज देश के एक महान लेखक खुशवंत सिंह  के निधन ने सभी प्रबुद्व वर्ग को दु:खी कर दिया. सबसे पहले भाजपा के उस महान नेता कि, जिसे लोग जनसंघ काल से जानते हैं तथा भाजपा को आज इस  मुकाम तक पहुंचाने में महान योगदान दिया हैं. इस पड़ाव में आकर इस वरिष्ठ नेता को मानसिक यातना झेलनी पड़ रही है वह अपने आप में एक विचित्र स्थिति है. अपनी मनचाही सीट पाने के लिये उन्हें जद्दोजेहद करनी पड़ी, अंत में वे उस बहुमत के आगे झुक गये जो उन्हें अपने निर्णयानुसार चलने की ताकीत दे रहा था. वास्तव में यह सोचने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों? आडवानी का इस बार कोप उनको भोपाल से टिकिट नहीं देना था, पार्टी उन्हें गांधीनगर या बडौदरा से टिकिट देना चाहती थी लेकिन वे भोपाल पर अड़े थे. अंतत: उन्हें अपने हाईकमान के आगे नतमस्तक होना पड़ा. जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को संयोजक बनाया जा रहा था तब भी आडवानी का रूख कुछ इसी प्रकार ही था, जो कम से कम अडतालीस घंटे तक चला और ...

नक्सलियों पर सेना का उपयोग करने में क्यों कतराती है सरकार?

आखिर वे कौन से कारण है, जिसके चलते सरकार नक्सलियों के खिलाफ सेना का उपयोग नहीं करती?हमने भी झीरम घाटी कांड के बाद इन्हीं कालमों में यह बात कही थी कि नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का उपयोग किया जाना चाहिये ताकि इस समस्या का तत्काल निदान हो जाये. वास्तविकता क्या है?आप और हम सोचते हैं कि जब सरकार युद्व के साथ देश की अन्य समस्याओं जैसे बाढ़,दंगे, कर्फयू, यहां तक कि किसी गांव के बोर में बच्चा गिर जाय अथवा तेन्दुए के उत्पात से निपटने के लिये भी सेना बुला लेती है तो लगता है कि छत्तीसगढ़ सहित देश की नक्सली समस्या को निपटाने के लिये सेना का उपयोग किया जा सकता है! जो चंद घंटों में ही इस समस्या का हल निकाल सकती है लेकिन यह इतना आसान नहीं चूंकि ऐसा हुआ तो सेना को भारी संख्या में नक्सलियों के साथ- साथ कई निर्दोषों का खून भी बहाना होगा, शायद यही एक कारण है कि वह सेना को इस काम के लिये उपयोग में नहीं ला रही. सेना अपने दुश्मनों से सीधे मुकाबला करती है जबकि नक्सलियों से  मुकाबला कुछ भिन्न है, जो एक तरह से आम ग्रामीणों के जीवन को खतरे में डालना भी है. असल में नक्सलियों की लड़ाई का तरीका ही भिन्न ह...

भागम भाग....और अंतिम पढ़ाव राजनीति!

भागम भाग....और अंतिम पढ़ाव राजनीति! जंगल परिवार में जानवरों पक्षियों के बीच एक आदत पाई जाती है- जब  उनके बीच कोई अपरिचित प्राणी आ जाये तो उनका व्यवहार बदल जाता है मसलन वे कू्ररता करने लगते हैं, यहां तक कि उनपर हिंसक हो जाते हैं. यह बात मनुष्यों के बीच पलने वाले जानवरों विशेषकर डागी में भी पाई जाती है फिर मनुष्य इससे क्यों अलग हो- स्कूल कालेजों में कोई नया छात्र आ जाये तो उससे रेगिंग के नाम पर जो कुछ होता है उससे कोई अपरिचित नहीं है, उसके कपड़े तक फाड डाले जाते हैं.... और अब वर्षो बाद राजनीति में भी कुछ इसी प्रकार की प्रवृत्ति शुरू हो गई है. भारतीय राजनीतिक इतिहास में यूं तो कई राजनीतिक पािर्टयों का उदय और अस्त हुआ किन्तु यह भी पहली बार हो रहा है जब हाल ही उदित हुई एक नई पार्टी विशिष्ट तरह की परिस्थितियों का सामना कर रही है. किसी की नजर उसपर टेड़ी है तो कोई उसे घूरकर देख रहा है तो कोई उसपर झपट रहा है तो कोई हिंसक रूप धारण कर रहा है इतना ही नहीं मीडिया की भी उसपर कोई मेहरबानी नहीं ह,ै विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया जो कभी उसके बहुत ही फेवर में दिखाई पड़ता है तो कभी ऐसा लगता है कि उसे बाह...

वोटर कौन हो?प्रत्याशी कैसा हो इसमें कौन करेगा चेंज?

वोटर कौन हो?प्रत्याशी कैसा हो इसमें कौन करेगा चेंज? एक आम मतदाता, जो पढ़ा लिखा है व सब समझता है- वर्तमान चुनाव पद्वति के बारे में क्या सोचता है? विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा तो हम करते हैं और पिछले पैसठ वर्षो से उप चुनाव, मध्यावधि या आम चुनाव हो रहे हैं लेकिन क्या इस व्यवस्था ने आम मतदाताओं के दर्द को कभी देखा,समझा या महसूस किया है? पांच साल की अवधि के लिये एक बार मतदाता को यह अधिकार दिया जाता है कि वह अपने जनप्रतिनिधि या माननीय जो भी कहे का चुनाव करें लेकिन उसके बाद वोटर किन परिस्थितियों से गुजरता है?उसको दिये गये वायदों को कितना पूरा किया गया?और उस जनप्रतिनिधि का पांच साल का परफोरमेंस कैसा रहा यह सब देखने का प्रयास किसी स्तर पर नहीं होता. हमें अपने बीच से एक व्यक्ति को चुनने का तो विकल्प दे दिया जाता है लेकिन क्या कभी इस बात पर गौर किया जा  रहा है कि वह व्यक्ति कौन है, केैसा है उसका बैक ग्राउण्ड क्या है? उसकी क्वालिफिकेशन क्या है?क्या वह चुनाव जीतने के बाद कभी जनता के बीच गया है? क्या उसने विधानसभा या लोकसभा में कभी जनता की आवाज उठाई? प्रत्याशी कोई भी हो, पार्टियां...

थोड़े बहुत ही ईमानदार बचे हैं, उन्हें जीने दो!

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपना काम ईमानदारी और निष्ठा से करते हैं ऐसे में किसी दूसरे का दखल उसकी आत्मा को कचोटता है, यह उस समय और भी आत्मघाती हो जाता है जब वह खुद भी यही महसूस करता है कि मैने जब कोई गलती ही नहीं कि तो मुझ्ंो यह सजा क्यों दी जा रही है। आत्मसम्मानी लोगों के साथ ऐसा होता है और वे इन परिस्थितियो में ऐसा कोई भी कदम उठाने में संकोच नहीं करते। जगदलपुर के सीएसपी देवनारायण शर्मा और बिलासपुर के एसपी राहुल शर्मा को क्या हम इस श्रेणी में नहीं रख सकते? जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से निभाता है तो उसे किसी का भय नहीं रहता वह किसी की परवाह किये बगैर आगे बढता जाता है, कोई बाधा आने पर भी उसका मुकाबाला भी उसी दबंगता के साथ करता है लेकिन लेकिन ऐसे लोगों को मुसीबतों का सामना भी बहुत करना पड़ता है। अंदर से नरम और अच्छे दिलवाला होने के बावजूद भी लोग उसे कठोर,अडियल,  जिद्दी जैसे शब्दों का प्रयोग करते है, इसकी परवाह भी उसे नहीं रहती मगर जब उसे काम सौपने वाले ही किसी के बहकावे में आकर अथवा स्वंय ही निर्णय ले बैठते हैं तो यह एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाता है। कुछ सालों से ...

लहर किस ओर ? फिफटी-फिफटी या एक तरफा?

सेोलह मई... कौन बनेगा प्रधानमंत्री? एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले सबसे बड़े लोकतंत्र में इक्यासी करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के बीच से इस सवाल का जवाब खोजना आसान नहीं, जितनी मुंह उतनी बाते.. देश की जनता क्या चाहती है?यह उसी समय पता चलेगा जब मतों की गणना होगी मगर यह जरूर कहा जा सकता है कि किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यूपीए फिर सत्ता में आयेगी और यह भी नहीं कहा जा सकता कि एनडीए सत्ता पर काबिज होगी लेकिन इस समय सिहासन के सबसे करीब कोई अपने आपको देख रहा है तो वह है भारतीय जनता पार्टी. चुनाव घोषणा से पूर्व तक उसने देश के कुछ हिस्से में कम से कम माहौल तो ऐसा  बना लिया है किन्तु यह भी मानकर चलना चाहिये कि भाजपा का अकेले सत्ता पर काबिज होना आसान नहीं वह दो सौ बहत्तर का बहुमत  लाने का दावा कर रही है लेकिन इतनी सीटे कहां से लायेंगी?खुद बहुमत के लायक सीटो पर भाजपा चुनाव नहीं लड़ रही जबकि कुछ सीटे उसने अपने सहयोगियों को बांट दी है. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रेलियों में लच्छेदार भाषणों से माहौल बनान का प्रयास जरूर कर रहे हैं लेकिन रेैलियों की भीड़ जो टीवी...

सिंहासन छीनने, पाने व अस्तित्व कायम रखने की लड़ाई!

 सिंहासन छीनने, पाने व अस्तित्व कायम रखने की लड़ाई! यूपीए, एनडीए, तीसरा मोर्चा और छुटकू(?) पार्टी- 'आप -यह चार पहलवान इस बार लोकसभा चुनाव के अखाड़े में हैं इनमें से कौन सत्ता पर काबिज होगा इस पर अभी से कयास लगाना मुश्किल है लेकिन पार्टियां जिस ढंग से ताल ठोक रही हैं उससे लगता है कि मुकाबला न केवल रोमांचक होगा वरन कई पार्टियों का अस्तित्व भी दाव पर लगा हुआ है। ससंद में पिछले एक सप्ताह के दौरान जो कुछ हुआ वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभूतपूर्व समय माना जा सकता है जो सत्ता पर काबिज होने के लिये अब तक किया गया सबसे बड़ा कूटचक्र कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सत्ता पर दस साल काबिज रहने के बाद कांगे्रस नीत यूपीए चुनाव के बाद क्या फिर सत्ता पर काबिज होगी? या एनडीए, तीसरा मोर्चा अथवा 'आपÓ? राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने देश के चुनाव का समीकरण ही बदलकर रख दिया है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान,और मणिपुर चुनाव में जहां भाजपा और कांग्रेस काबिज हो गये वहीं दिल्ली में किसी पार्टी को बहुमत न मिलना तथा आम आदमी पार्टी का उदय तथा बाद में उसका कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बन...