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सवालों के घेरे में भारतीय टे्न, गंतव्य तक की यात्रा या मौत की दौड़!




चांपा रेल दुर्घटना के बाद मध्यप्रदेश के हरदा के पास खंडवा-इटारसी सेक्शन में हरदा के पहले खिरकिया और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना ने रेल यात्रियों में दहशत व कई सवाल पैदा कर दिये हैं-क्या रेलवे यात्रियों को सुरक्षा दे पा रहा है कि वह यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचा देगा? अगर जान की गारंटी नहीं दे पा रहा तो वह यात्रियों के माल की गारंटी भी तो नहीं दे पा रहा! यात्री विशेषकर महिलाएं रेलों में पहले ही सुरक्षित नहीं हैं, दूसरा बहुत ज्यादा वेतन पाने वाले कतिपय भ्रष्ट कर्मियों के व्यवहार से भी यात्री परेशान हैं जबकि ट्रेनों में अनअथराइज्ड लोगों की घुसपैठ, सफाई, छेड़छाड़, गुण्डागर्दी की घटनाओं ने भी यात्रियों के लिये कई समस्याएं पैदा कर रखी हैं. खिरकिया-भिरंगी स्टेशनों के बीच दो ट्रेनें दुर्घटनाग्रस्त हुुुई हैं जिसमें 30 से 37 लोगों के मारे जाने की अधिकृत जानकारी है, दुर्घटना के फोटोग्राफ दुर्घटना की भीषणता को दर्शा रहे हैं. ऐसे में क्या दुर्घटना के इन अधिकृत आकड़ों पर विश्वास किया जा सकता है? बोगी जिस ढंग से उलटी-पलटी है वही दर्शाते हैं कि दुर्घटना के समय इन ट्रेन के डिब्बों में भारी संख्या में लोग भरे थे तथा घायलों और मौत का आंकड़ा भिन्न हो सकता हैे! नब्बे के दशक में छत्तीसगढ़ के चांपा में अहमदाबाद-हावड़ा ट्रेन एक्सीडेंट में भी हालात कुछ ऐसे ही थे. उक्त दुर्घटना के पांच-छह घंटों के भीतर ही मैं भी इस दुर्घटना की रिपोर्टिंग के लिये घटनास्थल पर पहुंच गया था, लाशों का ढेर देखकर हम चौंक गये थे. दुर्घटना की वीभत्सता और दुर्घटना का परिदृश्य ठीक ऐसा ही था जैसा खिरकिया-और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना के बाद दिखाई दे रही है, फर्क बस इतना था कि उसमें कम से कम तीन बोगी पुल से नीचे की ओर लटकी हुई थी तथा यात्रियों की लाश उसमें भरी पड़ी थी, बहरहाल हरदा दुर्घटना के बाद हम अपने देश की रेल सेवा को दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा होने का दंभ भरते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी बिछी हुई पटरियों की देखरेख इतनी पुरानी हो चुकी है कि इनपर से ट्रेनों का दौडऩा ही आश्चर्यजनक लगता है. अंग्रेजों के समय की रेल लाइनें आज भी उसी माहौल में पड़ी है जैसे वह बिछाई गई थी- थोड़ा बहुत परिवर्तन के कुछ नहीं किया गया? ऐसे में दुर्घटनाएं नहीं होंगी तो क्या होगा? सरकार बुलेट ट्रेन की बात करती है, करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट भी तैयार हो रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या रेलवे के वर्तमान माहौल में ही देश में तेज गति से दौड़ऩे वाली बुलेट ट्रेनें चलेंगी?

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …