बुधवार, 5 अगस्त 2015

सवालों के घेरे में भारतीय टे्न, गंतव्य तक की यात्रा या मौत की दौड़!




चांपा रेल दुर्घटना के बाद मध्यप्रदेश के हरदा के पास खंडवा-इटारसी सेक्शन में हरदा के पहले खिरकिया और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना ने रेल यात्रियों में दहशत व कई सवाल पैदा कर दिये हैं-क्या रेलवे यात्रियों को सुरक्षा दे पा रहा है कि वह यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचा देगा? अगर जान की गारंटी नहीं दे पा रहा तो वह यात्रियों के माल की गारंटी भी तो नहीं दे पा रहा! यात्री विशेषकर महिलाएं रेलों में पहले ही सुरक्षित नहीं हैं, दूसरा बहुत ज्यादा वेतन पाने वाले कतिपय भ्रष्ट कर्मियों के व्यवहार से भी यात्री परेशान हैं जबकि ट्रेनों में अनअथराइज्ड लोगों की घुसपैठ, सफाई, छेड़छाड़, गुण्डागर्दी की घटनाओं ने भी यात्रियों के लिये कई समस्याएं पैदा कर रखी हैं. खिरकिया-भिरंगी स्टेशनों के बीच दो ट्रेनें दुर्घटनाग्रस्त हुुुई हैं जिसमें 30 से 37 लोगों के मारे जाने की अधिकृत जानकारी है, दुर्घटना के फोटोग्राफ दुर्घटना की भीषणता को दर्शा रहे हैं. ऐसे में क्या दुर्घटना के इन अधिकृत आकड़ों पर विश्वास किया जा सकता है? बोगी जिस ढंग से उलटी-पलटी है वही दर्शाते हैं कि दुर्घटना के समय इन ट्रेन के डिब्बों में भारी संख्या में लोग भरे थे तथा घायलों और मौत का आंकड़ा भिन्न हो सकता हैे! नब्बे के दशक में छत्तीसगढ़ के चांपा में अहमदाबाद-हावड़ा ट्रेन एक्सीडेंट में भी हालात कुछ ऐसे ही थे. उक्त दुर्घटना के पांच-छह घंटों के भीतर ही मैं भी इस दुर्घटना की रिपोर्टिंग के लिये घटनास्थल पर पहुंच गया था, लाशों का ढेर देखकर हम चौंक गये थे. दुर्घटना की वीभत्सता और दुर्घटना का परिदृश्य ठीक ऐसा ही था जैसा खिरकिया-और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना के बाद दिखाई दे रही है, फर्क बस इतना था कि उसमें कम से कम तीन बोगी पुल से नीचे की ओर लटकी हुई थी तथा यात्रियों की लाश उसमें भरी पड़ी थी, बहरहाल हरदा दुर्घटना के बाद हम अपने देश की रेल सेवा को दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा होने का दंभ भरते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी बिछी हुई पटरियों की देखरेख इतनी पुरानी हो चुकी है कि इनपर से ट्रेनों का दौडऩा ही आश्चर्यजनक लगता है. अंग्रेजों के समय की रेल लाइनें आज भी उसी माहौल में पड़ी है जैसे वह बिछाई गई थी- थोड़ा बहुत परिवर्तन के कुछ नहीं किया गया? ऐसे में दुर्घटनाएं नहीं होंगी तो क्या होगा? सरकार बुलेट ट्रेन की बात करती है, करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट भी तैयार हो रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या रेलवे के वर्तमान माहौल में ही देश में तेज गति से दौड़ऩे वाली बुलेट ट्रेनें चलेंगी?