वे गर्दन काट रहे और ये...इनमें उनमें क्या अंतर? इंसान हैं या दरिन्दे!

 वे गर्दन काट रहे और ये...इनमें उनमें क्या अंतर? इंसान हैं या दरिन्दे!

27 अप्रैल 2017   |  एंटोनी जोसफ


 वे गर्दन काट रहे और ये...इनमें उनमें क्या अंतर? इंसान हैं या दरिन्दे!
लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ठीक ही कहा है-''ये मूर्ख माओवादी जवानों को क्यों मारते हैं? ये बिल्कुल आईएसआईएस जैसे हैं. विचित्र सपने पाले कातिलों का एक झुंड हैं ये आईएसआईएस इंसानों का कत्ल क्रूरता की हद तक जाकर करते हैं जबकि सुकमा के जंगलों में कथित रूप से सत्ता पाने की जंग लड़ रहे लोगों की दुष्टता अमानवीयता यह सिद्व करती है कि यह मानवता को जानतेे ही नहीं.शवों तक को नहीं छोड़ते- हिंसक लड़ाई आखिर किसके लिये है? किसके प्रति है? उस सिद्वान्त के प्रति जो 1967 में नक्सलवादियों के जनक चारू मजूमदार, कनू सान्याल और जंगल संताल ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में शुरू किया था? या उनके खिलाफ जो बेचारे अपने बाल बच्चों का भरण पोषण करने दो जून रोटी कमाने के लिये सरकार के हुक्म का पालन कर रहे हैं? कभी आपस में मिल बैठकर यह क्रूरता करने वाले उन जवानों से मिले और उनकी बाते शांतिपूर्वक सुने तो शायद वे उनको गले लगाये बगैर भी नहीं रहेंगे मगर जिस तरह का क्रूर व्यवहार सुकमा जिले के बुरकापाल में नक्सली हमले में शहीदों के शवों के साथ किया यह तो अमानवीयता की सारी हदे तोड़ देता है अैार यह उन हिंसक जानवरों से भी बदतर हैं जो कुछ भी समझने के लिये तैयार नहीं. अमानवीय कृत्या शवों के साथ जिस किसी ने भी किया वह जंग की हर हदे तोड़ देता है.सनसनीखेज बात जो सामने आई है वह यह बता रही है कि बरामद शवों में से करीब 6 शहीदों के गुप्तांग काट दिए गये.

अब तक जो रिपोर्ट आ रही है वह यही कहती है कि यह काम महिला नक्सलियिों का है जिन्होंने पौने दो घंटे में धारदार हथियार से अंग काटने की वारदात को अंजाम दिया. बुरकापाल हमले में शामिल नक्सलियों में लगभग एक तिहाई महिलाएं थीं, इसके चलते इस बात को और बल मिल रहा है लेकिन यह सवाल भी पैदा होता है कि ऐसा महिलाओं ने क्यों किया? क्या जैसी खबरे पुलिस के बारे में आती है कि वे घरों में घुसकर महिलाओं से अत्याचार करते हैं उसकी पुष्टि करने या बदला लेने के लिये ऐसी वारदात को अंजाम दिया गया? इस बात की गहराई तक जांच कर हमें अपने सुरक्षा बलों को भी ऐसे आरोपों से दूर रखना चाहिये.नक्सली हमले छत्तीसगढ़वासियों के लिये अब नई बात नहीं रह गई है चूंकि ऐसा होते- होते सालों निकल गये और सरकार का प्रयास, वादे कार्यवाही सब कुछ हर हमले में रिपीटेशन होता है.मुआवजे की घोषणा, श्रद्वांजलि, हम कठोर कार्रवाही करेंगे, ओर सुरक्षा बल बढायेंगे यह सब बाते सुनते -सुनते अब जनता भी इससे थक चुकी है. सरकार चाहे तो इस समस्या का समाधान तुरंत कर सकती है लेकिन हमेशा से सारा मामला तब ही गर्म होता है जब कोई बड़ा हादसा होता है उसके बाद शांति और नये हमले का इंतजार. नक्सलियों की क्रूरता, अमानवीयता अब सारी हदे पार कर चुकी है.

उन्होंने इस हादसे को अंजाम देने के पूर्व ऐसा दहशत भी फैलाया था जिसने गांव गांव तक यह बता दिया था कि जो उनके खिलाफ जायेगा उसका अंजाम भी कठोर होगा.सरकार हर बार यह दावा करती रही कि नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं-नक्सलियों का उन्मूलन कर दिया जायेगा वहीं नक्सली पुलिस की नाक के नीचे बुर्कापाल में उसपर हमले की रणनीति दो माह से बनाते रहे. बुरर्कापाल वही इलाका है जहां सीआरपीएफ का कैम्प लगा है,नक्सलियों ने बुर्कापाल के पूर्व सरपंच माडवी दुला को जनअदालत लगाकर 9 मार्च को मौत की सजा भी शायद इसीलिये दी कि पूरा गांव दहशत में कोई सूचना पुलिस को न दे. दुला की हत्या से पूरे गांव में दहशत थी इसके साथ ही ग्रामीणों को फोर्स के जवानों से दूर रहने की चेतावनी भी दी थी उसके बाद से ही इस गांव से सीआरपीएफ कैंप को सूचनाएं मिलनी बंद हो गईं. इस मामले को अंग काटने की घटना से भी जोड़कर देखा जा सकता है कि पुलिस का व्यवहार सूचना मिलना बंद होने के बाद गांव के लोगों से कैसा हो गया होगा इसकी कल्पना भी की जा सकती है. कैंप से महज तीन-चार किमी दूर जंगल में 300 नक्सली आराम से एंबुश लगाते रहे और फोर्स को भनक भी नहीं लगी. सूखे पहाड़ी नाले में खाने के बाद बैठे जवान इसी वजह से नक्सलियों की गोलियों की जद में आ गए. उन्हीं ग्रामीणों को बाद में नक्सलियों ने ढाल बनाकर हमला भी किया. छत्तीसगढ़, कश्मीर, उत्तर-पूर्व...क्या आज हमें और सतर्क व मुस्तैद रहने की जरूरत नहीं है? अब तक सैकड़ो जवान मारे जा चुके हैं आखिर यह खेल कब तक? कोई समाघान तो इसका निकलना ही चाहिये.              

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