शनिवार, 14 नवंबर 2015

इतिहास को इतिहास के पन्नों पर ही रहने दो, देश की सोचो!



इतिहास पुरूषों को इतिहास में ही रहने दीजिये,देश की सोचिये- परिवार के किसी के भी गुजरने का गम पूरे परिवार व सगे संबन्धी को रहता है और यह  देश का महान व्यक्ति रहा तो यह दायरा ओर बढ़ जाता है लेकिन ईश्चर ने हम मनुष्यों को इतनी शक्ति तो दी है कि हम कुछ दिनों में ही उनके जाने के गम को भूलक र अपने काम में जुट जाये. हर मृतात्मा की याद तो बहुत आती है लेकिन सिर्फ उसे ही याद करके हमारा बाकी जीवन तो नहीं चल सकता. कुछ दिनों से देश में इतिहास के पन्नों को खोजकरआत्माओं को डिस्टर्ब करने का खेल शुरू हुआ है जो किसी के लिये राजनीतिक रोटी पकाने का साधन बन गया तो किसी के लिये अपने को खोने और उनकी आत्मा की शंाति के लिये सकल कर्म करने का! क्या कुछ ऐसा ही कर्नाटक में नहीं हो रहा जहां इतिहास पुरूषों को इतिहास के पन्नों से निकालकर सड़क पर हल्ला मचाने के लिये ला खड़ा किया गया है? कर्नाटक में कांग्रेस का राज है, यहां पिछले कुछ महीनों से जो कुछ हो रहा है वह किसी भी सभ्य व्यक्ति के गले नहीं उतर रहा. इतने दिनों बाद अचानक एक मृत महापुरूष को अचानक उनकी जयंती मनाने का सपना किसने देखा और यह क्यों साकार करने की ठानी? ऐसी कौनसी उपलब्धि इस आयोजन से मिल जायेगी जिससे राज्य या देश का भला होगा? हम इस विषय को यही छोड़ देश में मृतकों के नाम पर जो कृुछ हो रहा है उसकी ओर प्रबुद्व वर्ग का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जो इतिहास पुरूप हो गये उन्हें अपने पन्नों पर ही रहने क्यों नहीं दिया जा रहा? क्यों उन्हें बुत बनाकर किसी चौक चौराहे पर प्रदर्शित किया जा रहा ? कुछ दिन या खास दिन तो उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोडी जाती लेकिन बाद में उनकी मूर्तिया या उनकी सड़क, उनके नाम से भवन धूल गंदगी  खाती पड़ी रहती  है या फिर पक्षियों को बीट करने व आते जाते लोगों को उनके सामने लघु शंका करने के लिये छोड़ दिया जाता?क्यों लोग यह नहीं समझते कि हम एक तरह से उन इतिहास बन गये लोगों की मूर्ति को चौराहे या सड़क गलियों में स्थापित कर उनका सम्मान करने की जगह पूर्णत: उनका अपमान कर रहे हैंै-देश की आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी में से तो कई महात्मा गांधी, भगतसिह, सुुभाषचंद बोस के बारे में कुछ नहीं जानते लेकिन इतिहास के पन्ने यह उन्हें जरूर बता देते हैं कि वे कौन थे और उनका योगदान क्या था. मगर राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिये नामकरण, मूर्ति स्थापना करना यह किसी को याद करने की जगह उनका अपमान ही करता है. कई लोग तो इन महान हस्तियों का उच्चारण भी सही ढंग से नहीं कर पाते.कुछ माननीय ऐसे भी हैं जिन्हें यह भी पता नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कौन था?आज देश कई किस्म की समस्याओं से ग्रसित है आने वाले समय में यह समस्याएं और जटिल होंगी.यदि हम इतिहास के पन्ने पलटकर एक के बाद एक मृतआत्माओं को सड़क पर लाना शुरू कर देंगे तो शायद देश की सड़के ऐसी आत्माओं से भरने के लिये कम पड़ेंगी,अत: जो इतिहास हो गया उसे इतिहास ही रहने दो उसे आज की गंदी राजनीति मे मत घसीटो वरना अभी कर्नाटक में तीन मरे हैं आगे चलकर देश की सड़कों पर इतनी लाशें बिछ जायेंगी कि उसे हटाना मुश्किल हो जायेगा. सवाल उन राजनीतिक पार्टियों से भी है जो देश के बारे में और दुनिया में बढ़ते आतंक के बारे में सोचने की जगह इन मृत आत्माओं की याद अचानक करके हल्ला मचा देते हैं? जबकि जनता की अपनी ही समस्याएं इतनी ज्यादा है कि निपटायें नहीं निपटती....और तो ओर अब इन पुरानी आत्माओं को लेकर कई लोगों की जिंदगी पर बन आई है-धमकी चमकी और मारकाट का दौर शुरू हो गया..कोई तो आगे आये जो पहले इनको समझायें!!!!