शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

'हाथी मेरा साथीÓ नहीं अब छत्तीसगढ़ के जशपुर और कई क्षेत्रों में 'दुश्मनÓ



दो हफते में आधा दर्जन बार हाथी का इंसानों पर हमला! और एक पचास वर्षीय व्यक्ति की परसो कुचलकर हत्या के बाद भी प्रशासन का हाथ पर धरे बैठे रहना उसकी विवशता ही दर्शाता है. सरकार का बेबस वन अमला हेल्प लाइन और कुछ सतर्कता उपायों से गांव के लोगों को सतर्क करने के सिवा कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं. हां लोग रात में ड्रम बजाकर व शोर मचाकर यह कोशिश जरूर करते हैं कि हाथी उनके पास तक न पहुंचे. हाथियों के उत्पात ने कई गांवों की नींद खराब कर दी है.यह सब हो रहा है छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में! जहां दो सौ गांवों के करीब पांच सौ घरों के लोग हाथियों से परेशान हैं. वे उनकी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं घरों को तबाह कर देते हैं तथा सामने इंसान दिखे तो पहले सूण्ड से उठाते हैं, फेंकते हैं और फिर पैरों से कुचलकर मार डालते हैं. इन गांव वालों की रक्षा के लिये न पुलिस वाले हैं ओर न कोई हाथियों के बारे में जानने वाले विशेषज्ञ! सालभर निर्दोषों की हत्या,फसल व संपत्ति को नुकसान का सिलसिला चलता रहा है अभी दो रोज पहले भी ऐसा हुआ जब भारत सरकार द्वारा संरक्षित कोरवा जनजाति पर हथियों का हमला हुआ... पूरा परिवार कहीं जा रहा था तभी दंतेल हाथी के साथ झुण्ड को अपने सामने देख उनके होश उड़ गये. परिवार के मुखिया कोदराम ने सबको सचेत कर पत्नी बच्चे सहित सबको भगाने में सफलतता पाई लेकिन स्वंय एक हाथी के कोप का भाजन बना- उसे सूण्ड से उठकार बाहर फेक दिया तथा कुचलकर उसकी हत्या कर दी. पता नहीं जो हाथी पालतू बनकर इंसानों  के दोस्त बने हुए थे वह इतने हिंसक कैसे हो गये?विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल कटने और

उनके भोजन के लाले पडऩे का जिम्मेदार वे इंसानों को मानते हैं तथा उनपर अपनी खीज निकालते हैं. जशपुर जिले का बगीचा,कुनकुरी और फरसाबहार इस समय हाथियो से सर्वाधक प्रताडि़त इलाके हैं.करीब डेढ़ सौ हाथियों का झुण्ड पूरे इलाके में तबाही व दहशत फैलाये हुए हैं. देश के दूसरे कई राज्यों में भी हाथियों के समूह है जिनमे से कइयों को इंसानों ने अपने काम में लगा रखा है. कहते हैं दंतेल हाथी अकेले रहता है तभी वह लोगों पर हमला करता है लेकिन यहां तो पूरा का पूरा परिवार साथ में रहता है और लोगों के घर व संपत्ति को बरबाद कर रहा है.कोदराम की मृत्यु से सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार संरिक्षत जनजाति की रक्षा भी इसी प्रकार कर रही है? वन अमला हेल्प लाइन की बात करता है लेकिन यह हेल्प लाइन कैसे काम करते हैं किसी को बताने की जरूरत नहीं.हाथियों के उत्पात की यह समस्या अकेले छत्तीसगढ़ के जशपुर में ही नहंी है बल्कि कई क्षेत्रों में है इससे निपटने सरकार का प्रयाय शून्य है जब कोरीडोर बनेगा तब की बात अलग है किन्तु ऐसा कोई कोरीडोर अब तक अस्तित्व में नहीं आया है साथ ही सरकार इस गंभीर मामले पर हर तरह से खामोश है-जबकि देश के अनेक राज्यों में हाथियों को काबू करने वाले विशेषज्ञ हैं जिनकी सेवाएं ली जा सकती थी लेकिन इस मामले में भी सरकार खामोश है.