शनिवार, 20 नवंबर 2010

समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी हासिल कर ली सरकारों ने!

रायपुर, शुक्रवार दिनांक 20 नवंबर 2010
समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी
हासिल कर ली सरकारों ने!
क्या हमारी व्यवस्था खुद ही समाज को कई भागों में नहीं बांट रही? गरीब,निम्र वर्ग,मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग, हरिजन, आदिवासी, अल्प संख्यक यह सब शब्द समाज द्वारा दिये गये नाम तो नहीं हैं। सरकार ने इन सबकी उत्पत्ति कर इसे अलग- अलग वर्गो में बांटा है। वोट बैंक की राजनीति के लिये किये गये इस वर्गीकरण ने आज देश के सामने कई मुसीबतें खड़ी कर दी। आजादी के बाद देश में कुछ ऐसे हालात थे कि लोग काफी संख्या में पिछड़े हुए थे। गरीब थे- इतने गरीब कि उन्हें दो जून की रोटी नहीं मिलती थी, पहनने के लिये कपड़े नहीं और रहने के लिये छत नहीं। बच्चों को वे पढ़ा नहीं सकते थे, स्वास्थ्य की सविधाएं उन्हें मिलती नहीं थी। ऐसे लोगों को सरकारी मदद देकर सरकार ने उन्हें इस लायक बना दिया कि- वे कुछ काम करने के लायक बन गये। इस दौरान उनके बच्चे भी अन्य बच्चों के साथ पढ-लिख गये और उन्होंने नौकरियों में अच्छे- अच्छे पद भी प्राप्त किये। ऐसे लोगों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था एक समय सीमा तक होनी चाहिये थी, लेकिन सरकारे आती जाती रही, उसने यह नहीं सोचा कि गरीब जिसे वह मदद करता रहा है, कितना गरीब है? और जिसे आरक्षण देता रहा उसे और कितने दिन आरक्षण की जरूरत है। सरकारी व्यवस्था ने गरीबों को मदद और आरक्षण को एक धंधा बना लिया जिसके माध्यम से वह हर पांच साल में सत्ता मे आने का रास्ता बनाता। गरीब को गरीब बने रहने दो और आरक्षण पाने वालों को पुश्तों तक आरक्षण मिलता रहे ताकि वह सरकारी मदद के आगे सदैव नतमस्तक रहे तथा पार्टियों के वोटर बैेंक की तरह उन्हें सत्ता में लाते रहें। होना यह चाहिये था कि जिन गरीबों की मदद सरकार ने की, उसे वह देखे कि- मदद के बाद वह गरीबी रेखा से ऊंचा उठा कि नहीं? अगर उठ गया तो मदद बंद की जाये तथा इस बात का प्रयास करें कि आगे के वर्षो में गरीबों की संख्या न बढ़े। लेकिन सरकार की नीतियां हमेशा यही रही कि- गरीब को गरीब और आरक्षित को आरक्षित ही रहने दिया जाये। इसका नतीजा यह हुआ कि देश का जो टेलेंट है, वह या तो यहीं दबकर रह गया या फिर उसने विदेशों का रास्ता पकड़ लिया। गरीब वर्ग के नाम पर देश का एक ऐसा वर्ग सामने आ गया, जो गरीबों से उपर उठकर अपराधी प्रवृत्ति का हो गया तथा उसने एक तरह से असल गरीबों का हक उनसे छीनना शुरू कर दिया। कहीं एक बत्ती कनेक्शन तो कहीं चावल, कहीं मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य के नाम पर यह वर्ग ऐसी सारी सुविधाएं, जो असल गरीबों को मिलनी चाहिये थी वह सरकार को गुमराह कर या सांठगांठ कर हासिल करने लगा। इस मदद के नाम पर सरकार से जारी होने वाला दस रूपये का अधिकांश भाग या तो अफसरों और इन योजनओं को चलाने वालों के जिम्मे चला जाता या फिर यह ऐसे कथित गरीब लूटकर ले जाते जिसे मजदूरी या कोर्ई काम करके परिवार का भरण- पोषण करना चाहिये था। गरीबों को सरकार वर्गीकृत कर मदद पहुंचाना चाहती है, तो वह अंधेरे में तीर मारने की जगह हकीकत का सामना करे। असल गरीब जी न सकने के कारण आत्महत्या कर रहा है। सरकार की जयजयकार कर उसकी मदद पर वोट देेने वाले कथित गरीब असल गरीबों का हक मार रहे हैं। सरकार यह सुनिश्चित करें कि वह जिसे मदद या आरक्षित कर सहायता पहुंचा रहा है। वह अब उसका वास्तविक हकदार है कि नहीं। मदद की एक समयावधि निश्चित करें। उस दौरान उसे पूरा उठ खड़े होने का मौका दे, तभी देश में लोग समानता से जी सकेंगें। भीख और मदद की बात आजादी के त्रेसठ सालों बाद अब कोई औचित्य नहीं रखता। भारतीय संविधान में सभी को समान अवसर उपलब्ध है, उसका उपयोग कर हर नागरिक को जीने का अधिकार है। समाज को बंाटने का काम अब बंद होना चाहये।