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सोशल मीडिया दोस्त है तो दुश्मन भी, बच्चो का ध्यान पुस्तको से हटा!





एक सर्वे में एक चिंतनीय बात सामने आई है कि सोशल  मीडिया बच्चों और युवाओं को काफी नुकसान पहुंचा रहे है. सर्वे में जो बाते सामने आई है अगर उसका विश£ेषण किया जाये तो बात साफ है कि सोशल  मीडिया से हमारी दोस्ती हमें अपनों से बहुत हद तक दूर करती जा रही है. बच्चे तो बच्चे बड़े भी इसकी चपेट मे आ रहे हैं. सोशल मीडिया से बच्चों की मित्रता ने उन्हेें अपने स्कूल व परिवार से दूर करना शुरू कर दिया है. समाज में घटित होने वाली कई किस्म की घटनाओ के पीछे सोशल मीडिया को ही दोषी ठहराया जा रहा है.बच्चों में पुस्तके पढऩे की आदत लगभग खत्म हो गई है उनको पुस्तकों से नफरत होने लगी है. इसके पीछे सोशल मीडिया है जो पुस्तकों के प्रति उनके आकर्षण को छीनकर अपनी ओर ले जा रही है. बच्चों के पढऩे की आदत कम हो रही है. चाहे वह यूं ही मिलने वाला समय हो या कोई्र छुटटी का दिन अथवा गर्मियों की छुट्टियां बच्चे व युवा अपना समय मनोरंजक पुस्तकें पढ़कर बिताने की जगह अब सोशल नेटवर्किग साइट्स पर चैट करना अधिक पसंद कर रहे हैं.वास्तविकता यह है कि किताबें न पढऩे की वजह से बच्चों की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता में कमी आ रही है जो उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है. मनोरोग विभाग द्वारा हाल के दिनों में किए गए एक सर्वेक्षण में 1350 बच्चों को शामिल किया गया इसमें उनकी सामान्य दिनचर्या में सोशल साइट्स के प्रभाव संबंधी 20 बिंदुओं पर प्रश्न किया गया उसमें पाया गया कि सोशल साइट्स का प्रयोग बच्चे करते हैं उसमें से अधिकांश का कहना यह था कि उन्हें ज्ञान अजिर्त करने के लिए  सोशल साइट्स पर निर्भर रहना पड़ता है. कुछ मामलों में इसे अच्छी आदत कहा जा सकता है, लेकिन लगातार किताबों से दूरी बच्चों की कल्पनाशीलता को कम कर रही है.अच्छी सोशल साइटस पर जाते जाते बच्चे व युवा दोनो ही भटक जाते हैं और दूसरी साइटस पर अपना मनोरंजन करने लगते है जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं रहता. बच्चे ज्यादातर फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और ट्विटर, व्हाटस अप जैसी सोशल साइट्स पर अपनी उम्र छिपाकर आईडी बना रहे हैं. 14 से 17 साल की उम्र तक के बच्चों से सोशल मीडिया संबंधी उनकी आदतों के बारे में जानकारी हासिल करने पर यह पाया गया है कि 40 प्रतिशत बच्चे 17 साल की उम्र से पहले ही स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.जानकारी एकत्र करने के प्रति छात्रों की जिज्ञासा बढ़ी है, लेकिन इसके लिए वह शत प्रतिशत सोशल साइट्स पर ही निर्भर है. किताबें पढऩे या कहानी सुनते समय विचारों में एक तरह की आभासी दुनिया बनती है जो रचनात्कता को बढ़ाती है. संचार के नए माध्यमों से यह कम हो रही है. सोशल साइटस से  देखकर ज्ञान प्राप्त करने  और पुस्तके पढ़कर ज्ञान अर्जित करने में बहुत अंतर है. मोबाइल और कम्पयूटर, टीवी पर लगातार नजरे गढ़ायें बैठे रहने से बच्चो की आंखों पर भी प्रभाव पड़ रहा है. कम उम्र में  बच्चों को चश्मा लगाने की नौबत आ रही है. पिचयासी प्रतिशत बच्चे आज सोशल साइटस से जुड़े हैं यह सिर्फ एक बड़े महानगर का आंकड़ा है-जुडऩे के पीछे कारण भी स्कूलो में सोशल साइट्स के बारे में बच्चो के बीच हाने वाली चर्चा है. वे आपस में एक दूसरे से पूछते हें और अपनी आईडी बनाकर आपस में जुड जातेे हैं फिर शुरू होता है चेटिंग का सिलसिला. हम मानते है कि आपस में बच्चो व बड़ो दोनों के जुडने मेल मिलाप का सोशल मीडिया एक अच्छा माध्यम है लेकिन यह कभी कभी दु:खुद परिणाम भी देता है. यह बताने की जरूरत नहंीं कि देश विदेश में होने वाले बहुत से अपराध में सोशल मीडिया की भागीधारी से ज्यादा होती जा रही है.देश में रोज होने  वाले कई किस्म के अपराधों में सोशल मीडिया का नाम कहीं न कहीं से जुड ही जाता है.सूचना और जानकारी का अच्छा तंत्र होने के बावजूद सोशल मीडिया उपयोग के मामलों में बच्चो पर निगरानी रखने की भी जरूरत है.



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