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बिना खून खराबे के ही हमने अपने दुश्मन की रीढ़ तोड़ दी!




किसी को अगर सजा देना है तो इससे अच्छी बात ओर क्या हो सकती है कि उससे बात करना ही बंद कर दे. यह सजा उसे मारने- पीटने से भी ज्यादा कठोर होती है. पीएम नरेन्द्र मोदी यह नुस्खा अच्छी तरह जानते हैं.उन्होंने उत्पाती पडौसी को सबक सिखाने के लिये जो रास्ता चुना वह युद्व का न होकर कुछ इसी तरह का है जिसने आंंतक फैलाने वाले पडौसी को संसार में हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया. उड़ी में हमारे अठारह जवानों को शहीद बनाकर वह यह सोचने लगा था कि उसने इस आतंक के बल पर भारत की एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या को सबक सिखा देगा लेकिन उसने यह नहीं समझा कि उसके इस हथियार से बड़ा हथियार लेकर हमारे प्रधानमंत्री मैदान में है. पाक ने लुका -छिपी के खेल में हमारे देश में खून बहाया तो हमने बस इतना कहा कि तुम पानी -पानी के लिये तरसोगे तो उसके होश उड गये.पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया से अलग-थलग करने की रणनीति ने अब अपना असल रूप दिखाना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार ने जहां सिन्धु जल समझौते पर कड़ा रूख अपनाया वहीं मंगलवार को यह  बड़ा फैसला लिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवंबर में इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेंगे और अंतत: दक्षेस सम्मेलन स्थगित भी हो गया चूंकि सार्क में शामिल कोई एक देश भी अगर सम्मेलन में आने से इंकार करता है तो सम्मेलन नहीं होता. इधर बौखलाए पाकिस्तान ने भी कह दिया कि कोई आये चाहे न आये हम नवम्बर में सार्क सम्मेलन आयोजित करके रहेंगे. इस समय सार्क देशों का अध्यक्ष नेपाल है. इस मामले पर एक अच्छी बात यह हुई कि हमें कम से कम यह पता चलने लगा कि हमारे पडौस में हमारे सच्चे दोस्त कौन है.पडौसी देश बंगलादेश, अफगानिस्तान,भूटान ने तत्काल भारत के साथ सार्क सम्मेलन में भाग नहीं लेने का निर्णय लेकर भारत की स्थिति को जहां मजबूत बनाया वहीं यह साबित कर दिया कि इस लड़ाई में वह भारत के साथ है लेकिन अभी  भी बहुत से पडौसी ऐसे हैं जिनकी प्रतिक्रिया अभी मिलना शेष है. अमरीका की मीडिय़ा ने पाक को यह जता दिया कि वह मोदी की अपील को ठुकराकर भारत से पंगा न ले वरना विश्व में अछूत बनकर रह जायेगा. यह पहली बार हो रहा है जब पाकिस्तान विश्व में अकेला पड़ता नजर आ रहा है. उसे चीन की दोस्ती पर बहुत दंभ था लेकिन चीन ने आंतकवाद के मामले मेंं उसका साथ न  देने का ऐलान कर उसे अपनी औकात दिखा दी. भारत ने पाक को उरी हमले में उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत देकर यह जता दिया है कि आतंकवादियों के खिलाफ कदम उठाने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता उसके पास हीं है. सार्क सम्मेलन में भारत सहित चार देशों के भाग नहीं लेने से इस्लामाबाद में यह सम्मेलन अब नहीं होगा.पाकिस्तान ने शायद सपने में भी  नहीं सोचा होगा कि उसके नापाक चालों की आंच इतना उग्र  रूप धारण कर लेगा. सिंधु नदी  का पानी रोकने वाली बात को भी उसने  हीं सोचा.  अगर सिंधु नदी से उसे पानी नहीं मिला तो पाक में त्राहि त्राहि मच सकती है. पाकिस्तान के अस्तित्व  पर भी बैठे बिठाये संकट गहरा जायेगा. हकीकत यह कि सिंधु जल समझौते पर हमारा रूख पाकिस्तान को युद्व से भी भारी पड़ सकता है. शायद इसीलिये पाकिस्तान और बुरी तरह बौखला गया है.केरल के कोझिकोड में प्रधानमंत्री  की गर्जना  और विदेश मंत्री सुषमा सुराज की यूएन में दहाड़ ने वास्तव में विश्व को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत से मुकाबला पाकिस्तान के लिये इतना आसान नहीं है. पाक हुक्मरान भले ही परमाणु अस्त्र से डराने की कोशिश करें लेकिन हमारे पानी ने ही उसके गले को सुखाकर रख दिया. विश्व को भारत यह समझाने में पूरी तरह कामयाब हो गया है कि एक देश सीमापार से लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, इतना ही नहीं, दूसरे देशों के घरेलू मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहा है, ऐसे कठिन समय में  अधिकांश  यूरोपियन राष्ट्रों की तरफ से भी भारत को पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है.अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान से कहा है कि उन्हें हिंसा के जरिए नहीं बल्कि कूटनीति के जरिए आपसी मतभेद सुलझाने चाहिए हालांकि उसने भी स्पष्ट कहा है कि पाकिस्तान को अपनी हदों का ख्याल रखना चाहिए.




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