इंसान की ताकत- बहादुरी(?) के कारनामें इंसानों पर ही




 लोग धीेरे धीरे काफी बहादुर(?) होते चले जा रहे हैं वे कभी अपनी मर्दानगीे सड़कों पर दिखाते हैं तो कभी घरों पर!... और इस  मर्दानगी का शिकार कहीं कोई अबला बनती है तो कभी कोई मासूम सी बच्ची! जबलपुर के एक संभ्रान्त परिवार की महिला ने पिछले दिनों अपनी मासूम बेटी का इसलिये कत्ल कर दिया चूंकि वह बेटी नहीं बेटा चाहती थी- उसने अपनी मासूम बच्ची को मारकर एसी के अंदर छिपा दिया. एक बहादुर(?) प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को दिल्ली में सरे आम चौबीस बार चाकू मारकर अपनी बहादुरी(?) का प्रदर्शन किया. हाल ही चेन्नई की एक अदालत ने दिलचस्प बात कही- पत्नी ने अदालत को बताया था कि उसका बहादुर? पति उसे पीटता है. अदालत ने पति महोदय को फटकार लगाते हुुए कहा कि अगर पीटना ही है तो सरहद पर जाओं वहां आतंकवादी खूब उत्पात मचा रहे हैं, उनको पीटो. ऐसे बहादुर(?) लोगो के लिये कोर्ट का ऐसा ही आदेश शोभा देता है.पता नहीं कितने लोग इसका पालन करेंगे, बहरहाल असल मुद्दा आज यही है कि देशभर में बलवान पुरूष एक  दो या तीन मिलकर किसी  भी अबला के साथ कहीं भी अत्याचार कर रहे हैं,हमारे कानून के लचीलेपन के कारण या तो ऐसे लोगो को कोर्ट से जमानत मिल रही है या फिर उन्हें बरी कर दिया जाता है. गोवा में एक विदेशी महिला से रेप करने वाले दोनो आरोपियों को निर्दोष बरी कर दिया गश्स. कानून की कमजोरी ने अपराधियों को यह मौका दिया. हमारा  कानून क्यों नहीं बताता कि यह नहीं तो इस मामले में कौन इनवाल्व था?ऐसे में तो पीढितों को कभी न्याय ही न मिले. कई ऐसे लोग मर्डर करने के बाद सबूत नहीं होने के कारण छूट जाते हैं. छूटने के बाद पीडि़त पक्ष रोता रहता है-उसे तो कहीं न्याय नहीं मिला. जिसने रेप  किया या मर्डर किया  वह सबके सामने है पर सबूत के अभाव में छूट जाता है. फिर यहां भी वही सवाल  कि आखिर रेप या मर्डर करने वाला कौन?अदालत से बरी होने के बाद पुलिस का काम खत्म ... क्यों हमारी व्यवस्था ने इसतरह के नियमों को अंगीकार कर रखा है जो पीडि़तों को न्याय ही नहीं दिला पा रही है. एक मार्मिक खबर एक रेप पीडि़ता की आई जिसमें उसके साथ तीन युवकों ने रेप किया उसकी जिंदगी  तबाह हो गई हंसता खेलता परिवार सदमें आ गया. युवकों को पकड़कर सजा भी हुई लेकिन परिवार पर जो बीती उसका मुआवजा तो इस जन्म में उसे मिलने वाला नहीं. क्यों ऐसे गलत नियमों को सुधारने  का प्रयास सामाजिक और सरकारी  तौर पर नहीं होता? पति के जेल में होने के कारण अगर किसी महिला केा अपने दुध मुंहे बच्चे पर गुसा निकालने की नौबत आये तो इसे क्या कहना चाहिये? छत्तीसगढ़ के जशपुर में एक मां ने अपनी दस माह की दुधमुंही  बच्ची को इसलिये घूसेा मार मारकर  मार डाला चूंकि उसके पास अपने पति को छुड़ाने के लिये पैसे नहीं थे. कोई भी मां इस  तरह का कृत्य अपने कलेजे के टुकड़े के साथ नहीं करेगी  मगर उसने ऐसा किया वह अब अन्य महिलाओं व समाज  की नजर में दुष्ट मां है और न जाने  क्या- क्या?गरीबी  ओर पैसे के अभाव मे इंसान की मति मारी जा रही है, वह ऐसे कृत्य करने लगा है जिसको कोई भी  इंसान होश मेें रहकर नहीं करना चाहेगा - बहरहाल समाज का  तंत्र भी कई भागों में बंटा हुआ है एक तरफ जहां दु:ख और चिंता है तो दूसरी ओर खुशी भी है. लोग जहां बच्चा न होने  से दुु:खी होकर दूसरे बच्चे की चोरी तक कर डालते हैं वहीं कुछ लोगों के यहां बच्चों की ऐसी बारिश भी हो जाती है कि परिवार इसमें खुशी से फूला नहीं समाता. ऐसा हुआ मेरठ के एक गांव में जहां एक मां ने एक साथ चार बचचो को जन्म दिया तो पुरा परिवार फूला नहीं समाया. इसे और जशपुर की घटना को जोड़कर कैसे देखा जाये?




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