सोमवार, 1 अगस्त 2016

...दुष्कर्मियों की कब तक होती रहेगी खातिरदारी?



बुलंदशहर में कार से जा रही मां-बेटी से हाईवे पर गैंगरेप, तीन आरोपी अरेस्ट और पूरा थाना सस्पेंड:...वाह क्या जिम्मेदारी निभाई! उस परिवार पर क्या बीत रही है- जिनको इस कांड के जालिमों ने जन्मभर का दर्द दिया, यही न कि पीडि़तों में से कोई न कोई इस अपमान को वहन न कर पाये और अपने आप को आग के हवाले कर दें, फांसी पर झूल जायें या जहर पी ले. हमारें कानून की  खामियां और न्याय मिलने में देरी का ही सबब है कि आज पूरे देश में ऐसे दरिन्दें छुट्टे घूम रहे हैं और किसी न किसी परिवार के सुख चैन को रोज छीन रहे हैं. बुलंदशहर यू पी एनएच-91 के 200 मीटर के हिस्से में गैंगरेप की शिकार मां-बेटी की गले की चेन जैसी कई चीजें खेत में पड़ी मिलीं- यहां एनएच-91 के करीब 35 साल की मां और उसकी 14 साल की नाबालिग बेटी को दरिन्दों ने निर्वस्त्र कर नोैच डाला. 12 लोगों ने जो दरिन्दगी का खेल खेला वह अतीत बन गया और उसके बाद अब अपराधियों को थाने में बिठाकर पूछताछ की जा रही है. बीच बीच में चाय भी पिलाई जा रही है.नाश्ते का भी इंतजाम होगा.अफसरों को रेप की  घटना बुरी लगी, उन्होनें पूरा थाना बदल दिया सब सस्पेण्ड! यह सस्पेण्ड नामक सजा वही हैं जिसमें सस्पेण्ड होकर कुछ दिन तक घर में सवेतन छुट्टी मनाता है-यह सब लोग कुछ दिनों बाद दूसरे थानों  में नजर आयेंगे. सस्पेडं या लाइन अटैच पुुलिस का एक ट्रेड मार्क बन गया है इस कार्यवाही के सिवा हमारे जिम्मेदार अधिकारी कोई बड़ा कदम  उठा भी नहीं सकते-नियम उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता. अधिकारी की बात छोडियें सरकार में बैठे लोग भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि  कानून इसके आगे सिर्फ धीरे चलने की एक प्रक्रिया है जो वर्षाे से ऐसे हीनियस क्राइम के मामले में यूं ही रेंग रही है. आगे आने वाले दिनों में गेंग रेप के आरोपी और पकड़े जायेंगे. कानून उन्हें अदालत में पेश करेगी, पेशी पर पेशी होते- होतेे देश में ऐसे कई बलात्कार हो जायेंगे..कितनी ही अबलाएं लुट जायेंगी कितने ही स्कूल में पडऩे वाली खिलौने से खेलने व पुस्तके पढऩे के दिनों में मां बनकर गोद में अवांछित बच्चे को लेकर अपनी मां से पूछेगी- मां गुडिया या गुड्ढा कैसा लग रहा है?-या  यह भी पूछेगंी कि मैरे  साथ ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसे वाक्ये हुए हैं, .आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा.? दिल्ली का निर्भया कांड हो या और वह मामला जिसमें एक पन्द्रह साल की लड़की को आग के हवाले कर दिया गया तथा अन्य अनेक  मामले जिनका जिक्र करने की जरूरत नहीं, सब सबके सामने हैं हम कब तक अपराधियों को क्षमा की संस्कृति पर जिंदा रखेंगे. वे हमारे चेहरों पर थप्पड़ मार रहे हैं, थूक रहे हैं... और हम कब तक महात्माओं के वचनों का पालन करते रहेंगे? आज से वर्षो पूर्व भारत की राजधानी में एक अमीर परिवार के दो बच्चों जिसमें एक भाई बहन थे का रंगा बिल्ला नाम के अपराधियों ने रेप व मर्डर किया था तब इसी देश की पुलिस ने फटाफट कार्रवाई कर कुछ ही दिनों में दोनों अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया था.वे अमीर थे उन्हें न्याय मिल गया किन्तु जो गरीब हैं, मध्यम वर्गीय हैं उन्हें दरिन्दे रौंध रहे हैं मार रहे हैं फिर भी हमारा कानून क्यों कठोर नहीं हो रहा? हमारे देश में वर्तमान सरकार के बहुत से वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ मंत्री है जिन्होंने विपक्ष में रहकर देश में दुष्कर्मो की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कठोर से कठोर सजा की मांग कर आंदोलन किया और संसद में तक धूम मचाई अब उसी विपक्ष के लोग सरकार में हैॅ. क्या सरक ारों के समक्ष भी ऐसी कोई बाध्यताएं आड़े आ जाती है जिसमें अपरराधियों को बख्शने या क्षमाधान करने की मजबूरी आ जाती है? इस तरह की संस्कृति का ही परिणाम है कि ऐसे तत्वों के हौसले बुलंदी पर है जो फांसी की सजा प्राप्त करने के बाद भी जेल के भीतर से अपने सुख सुविधाओं की मांग कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मेरठ रेंज में हुई इस ताजा घटना ने पूरे देश को फिर से हिलाकर रख दिया है. अब तो हाईवे पर फै मली सहित यात्रा करना भी मुश्किल हो गया. इस घटना के तीन आरोपियों  को अरेस्ट कर लिया गया है, पीडित परिवार ने इनकी पहचान भी कर ली है. इसके बाद क्या रखा है? तुरन्त फुरन्त में सजा दो और फाइल बंद....वरना यह अपराधी भी जेल की सलाखों के पीछे से अपने कमरे में और सुख सुविधाओं की मांग करेंगे तथा सरकार का खर्चा बढ़ायेंगे. कानून को अपराधी के बारे में पुख्ता सबूत मिलने के बाद तुरन्त थाने में ही न्यायाधीश के सामने ेपेश कर तत्काल उसे अपने किये की सजा का प्रावधान नहीं किया गया तो ऐसे मामलों का निपटारा करते- करते हमारी न्यायपालिका भी थक जायेगी .एक अरब  इक्कीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में ऐसे तत्वों की संख्या मुश्किल से दो से लेकर पांच प्रतिशत होगी-ऐसे तत्व कम हो जायेंगे तो यह धरती हिलने वाली तो नहीं?. निर्भया कांड से लेकर अब तक नये कानून का स्वरूप भी इन अपराधों को रोकने में कामयाब नहीं हो पायें हैं. हम अब भी अपराध के बाद सस्पेड़ करने, मुआवजा देने,कडी निंदा करने और अन्य प्रक्रियाओं में ही उलझे हैं.कठोर से कठोर कार्रवाही का एक तो उदाहरण र्दो!