गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

छत्तीसगढ़ में तेजी से फैल रहा लेबर 'फलू


निर्माण कार्य में लगे एक ठेकेदार को उस दिन काफी गुस्से में देखा गया, पता चला कि रात में उसके बंधक बनाये मजदूरों में से कुछने भागने का प्रयास किया. कुछ तो पकड़ लिये गये, कुछ भागने में सफल हुए. इस संपूर्ण मामले पर से जब पर्दा हटा तो पता चला कि ठेकेदार बंगाल से गरीब परिवार के लड़कों को बर्गलाकर छत्तीसगढ़ में लाते हैं और उनसे यहां सस्ते में काम कराते हैं. मजदूरों को उनका पैसा उनके घर पर ही एक मुश्त राशि के रूप में दे दिया जाता है,जो, करीब पांच छै हजार रूपये होता है,फिर चाहे उनसे जितनी भी देर, सुबह नौ बजे से लेकर देर रात दस बजे तक भी हो काम कराओ. यह धंधा अकेले बंगाल के  गरीब परिवार के युवकों के साथ ही नहीं हो रहा बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीबों के साथ भी हो रहा है. छत्तीिसगढ़ में तेजी से फैल रही इस रोजगार बीमारी- जिसे लेबर फलू का नाम दिया है, के कारण छत्तीसगढ़ के प्राय: घरों से यह आवाज सुनने को मिल रही है कि 'लेबर नहीं मिल रहे, काम रूका पड़ा है...Óचूंकि सारा काम ठेके पर चल रहा है. बंगाल, बिहार,उडीसा और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ छत्तीसगढ़ के मजदूरों को भी देकेदार उसी रेट पर खरीद लेते हैं जो बाहरी मजदूरों को देने की बात करते हैं. लेकिन इसके पीछे छिपे कारणों का गहराई से अध्ययन किया जाये तो वास्तविकता  कुछ ओर ही है. इसके लिये एक तो सरकारी नीति जिम्मेदार है दूसरा बाहर प्रांतों से रोजगार की तलाश में आने वाले लोगों की भरमार है. सरकार की शराब परोसने व एक रूपये में चावल बांटने की नीति ने गरीब वर्ग को सुविधा संपन्न बना दिया लेकिन जो पहले के मध्यम  व उच्च वर्गीय हैं उनके लिये गंभीर समस्या पैदा कर दी है. जहां काम करने के लिये स्थानीय मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं. यहां तक कि परचून दुकानों में भी काम करने के लिये लोग तैयार नहीं हो रहे हैं छत्तीसगढ़ के श्रमिकों के न नकूर और ज्यादा रेट मांगने के चलते ही ठेके पर काम कराने वालों ने इसका हल ढूढा है  वे दूसरे राज्यों से गरीब युवकों को लाकर काम कराने लगे हैं. ठेकेदार इन्हें इन राज्यो के दूरस्थ गांवो से झासें में खरीदकर लाते  हैं और अपने उन कार्य स्थलों के आसपास बंधक बनाकर रखते हैं जहां वे काम करते हैं. इन मजदूरों के खाने पीने रहने का प्रबंध ठेकेदार करते हैं तथा इनपर सघन निगरानी रखते हैं. इनके हाथ में पैसा उसी समय दिया जाता है जब उन्हें अपने घर जाने ये छुट्टी देते हंै. पैसा भी उतना ही दिया जाता है जितने में वे वापस आ जाये. बाकी पैसा वे बंधक बनाये रखते हैं.इधर छत्तीसगढ़ में श्रमिक परिवार जो  अबतक काम करने में बिल्कुल हिचकते नहीं थे वे सरकार का सस्ता चावल और अन्य जीवनोपयोगी सुविधाएं पाकर खुश जरूर हैं लेकिन उन्हे आलसी बना दिया है. काम के प्रति उनका लगाव खत्म हो गया  है घर की महिलाओं को काम पर भेजकर जो पैसा वसूल करते हैं उसे पुरूष शराब में बर्बाद कर देते हैं. सरकार को अपनी सस्ता  चावल नीति व शराब नीति पर तुरन्त गंभीरता से सोचने की जरूरत है. सस्ता चावल की जगह एक मुश्त राशि को उनका एकाउटं बनाकर उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई, उनको कपड़े देने, स्वास्थ्य आदि पर व्यय करना चाहिये. अगर सरकार व्यवस्था में तुरन्त बदलाव नहीं करती तो आगे आने वाले वर्ष में स्थिति और गंभीर हो जायेगी.