सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्या देश लहर पर लहरा रहा


         
सिर्फ 22 दिन..प्रतीक्षा कीजिये... अच्छे या पुराने दिन का!

- क्या देश में किसी एक पार्टी की लहर है?
-क्या इस बार देश में सत्ता का परिवर्तन होगा? 
-क्या सौ साल से ज्यादा पुरानी कांग्रेस की ऐसी स्थिति हो जायेगी जो आज तक कभी नहीं हुई?
-क्या आज देश में वैसी लहर बह रही है जो कभी इमेरजेंसी के बाद थी या वैसी लहर,जो इंदिरा  गांंधी के पुन: सत्ता में आने के समय थी? 
-क्या भाजपा आज अटल बिहारी बाजपेयी के समय से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है?अथवा यह नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है जिसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने सिर पर ले रखा है
 
नरेन्द्र मोदी की सभाओं में जनसैलाब को अगर लहर मान लिया जाये तो देश के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में यह लहर है. हिन्दी चैनलों में भी यह लहर है, मगर क्या यह लहर पूरे देश की फिजा को ही बदलकर रख देगा? यह गंभीर किन्तु कठिन प्रन है जिसका जवाब 16 मई के बाद ही प्राप्त होगा लेकिन इससे पहले देश का आधे से अधिक भाग मोदी और सुषमा स्वराज के साथ यही कह रहा है कि ''अच्छे दिन आने वाले हैं.ÓÓ 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी प्रकार की बात भाजपा की तरफ से 'फील गुडÓ के  नाम से सुनने को मिली थी, उस समय मैंै केरल में था, तब लालकृष्ण आाडवाणी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप पेश किया गया था. त्रिवेन्द्रम में उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को देखने से लगा कि पूरे केरल की सीट भाजपा के हाथ लग जायेगी लेकिन जब परिणाम आया तो केरल में भाजपा खाता भी नहीं खोल सकी बहरहाल इस समय पूरे देश में यही कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं,हम देश नहीं मिटने देंगे. हम देश नहीं झुकने देंगे तो क्या अभी तक देश मिट रहा था,क्या देश झुक रहा था? हर किसी की जिंदगी में कभी न कभी अच्छे दिन आते हैं, देश में अच्छे दिन आने वाले हैं,सवाल पर सवाल उठाया गया है कि क्या हम इतने  बुरे दिनों में जी रहे थे?यह सही है कि लोगों की अपेक्षाएं  बहुत है, अच्छे दिनों का इंतजार है क्योंकि उन्होंने  मंहगाई, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसे बुरे दिनों को देखा है लेकिन वह अच्छा दिन कब आएगा... कौन लाएगा...? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की आंखें तलाश रही है एक रोशनी को, जो  ऐसा चमत्कार करे कि सब पटरी पर आ जाये, कोई अवतार ले, कृपा निधान की तरह...इस समय हवा बदलाव की चल रही है। केंद्र सरकार की नीतियों से देश की जनता शायद ऊब चुकी है। उन्हें एक नए किरण की तलाश है जो एक जादू की झप्पी दे और सभी समस्याओं का हल कर दे। दस साल तक प्रधानमंत्री रहे डा. मनमोहन सिंह की उपलब्धियां गिनाने के बजाय कांग्रेस उनके ग्यारह सौ बार बोलने को उपलब्धियां मान रही है. जनता को बता रही है कि प्रधानमंत्री ने इतने बार अपना मुंह खोला।  क्या इससे किसी का भला होगा? चुनावी महासंग्राम में सभी दल के नेता अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, साथ ही एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और तीखे व्यंग्य बाण भी छोड़ रहे हैं। भाजपा पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी रोज सुबह, दोपहर, शाम रैली कर रहे हैं, पूरे देश में घूम-घूमकर सभा कर रहे हंै. मां-बेटे को कोस रहे हैं. कांग्रेस की बखिया उधेड़ रहे हैं, वहीं राहुल गांधी भी जगह-जगह रैली, सभा, रोड शो कर जनता को यूपीए सरकार के कामों एवं उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं, विपक्षी पार्टियों की पोल और उनकी कमजोरी को बयां कर रहे हैं सवाल यह है कि आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले नेता अपना मूल मुद्दा क्यों भूल गए ?जनता और देश के लिए वे क्या करेंगे?उनकी प्रमुख घोषणा और कार्य क्या होंगे। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, खाद्यान्न सुरक्षा इन सब बातों को किनारे कर ये नेता सिर्फ वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर एक-दूसरे पर आक्षेप कर जनता को अपनी ओर लुभाने का प्रयास कर रहे हैं.अभी तक केंद्र में अपनी सरकार बनाने का दावा करने वाले नेता अपना प्रमुख उद्देश्य जनता के सामने नहीं रख पाए हैं.डा. मनमोहन सिंह पर कम बोलने का आरोप लगातार लग रहा है-उन्होंने चुप से बड़ा सुख नहीं है वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पूरे दस साल बिता दिए...लेकिन चुप्पी ही सही, देश अब तक अपनी तरक्की के कई नए आयाम गढ़ते गया, जनता के लिए अनेक योजनाएं लागू हुई, वे सब सिर्फ प्रधानमंत्री की चुप्पी के आगे गौण हो गए। अब जनता को बोलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए, काम करने वाला नहीं..? तो अब क्या लगातार बोलने वाला आ रहा है शायद....शायद....रहस्य. कुछ मत पूछिये देश की आबादी एक अरब बीस पंच्चीस करोड़ के आसपास ह, नये मतदाता भी आ गये हैं, किसके मन में क्या छिपा है यह नहीं कहा जा सकता....अच्छे दिन आने वाले हैं या बुरे दिन यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन यह भी सच है कि देश की जनता को शांति, सौहार्द्रपूर्ण वातावरण चाहिए, मंहगाई से मुक्ति चाहिय,े महिलाओं को सुरक्षा चाहिेये,बेरोजगार युवको को रोजगार चाहिये,इसके साथ ही विकास और लोगों की अन्य अपेक्षाओं को पूरा करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए... सिर्फ बोलने से काम नहीं चलेगा...प्रतीक्षा कीजिये आज से सिर्फ 22 दिन और....

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …