रविवार, 18 मई 2014

आजाद भारत में पैदा हुआ पहला प्रधानमंत्री!

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युवाओं की अहम भूमिका रही...जाति-धर्म सब सीमाएं लांघी गई मोदी को जिताने के लिये...
कांग्रेस के भ्रष्टाचार और दस वर्षो के कुशासन से मुक्त होना चाहते थे लोग

 लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को जो ऐतिहासिक जीत मिली है उसे भारतीय लोकतंत्र में किसी एक पार्टी को हासिल जीत में सबसे बड़ी  जीत है. पार्टी ने  दिल्ली, राजस्थान सहित कई राज्यों की सभी सीटें अपने नाम कर ली हैं तो कई राज्यों में दिग्गज क्षेत्रीय पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया है। यह चुनाव  हम सब के लिए चौंकाने वाले हो सकते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए यह परिणाम अपेक्षित ही माना जा  रहा है क्योंकि 2011 के बाद से ही उन्होंने सुनियोजित रणनीति के तहत इसके लिए आगे बढ़ना शुरू कर दिया था। तब उन्होंने सद्भावना यात्रा शुरू की थी. अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के समय वे जरूर कुछ हाशिये पर आ गए थे मगर 2004 के आम चुनाव में जब भाजपा की हार हुई तो उन्हें लगा कि अब वे केंद्र में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं. यह वह समय था जब लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की कब्र पर जाकर उनके लिए सराहना के शब्द बोल दिए. वे संघ के निशाने पर आ गए.अब मोदी के लिए मैदान खाली था. 2014 के चुनाव में मोदी के लिये हिंदी का पट्टा महत्वपूर्ण तो है पर जादुई अंक के लिए पर्याप्त नहीं। इसलिए उन्होंने ऐसी सीटों पर फोकस किया, जिन्हें आमतौर पर उपेक्षित किया जाता है, गोवा, दमन-दीव, अंडमान जैसे राज्यों की छोटी-छोटी सीटें. चुनाव के लिये मोदी ने पारंपरिक प्रचार अभियान के साथ नए तौर-तरीके भी अपनाए. वे बाहर से आए टेक्नोक्रेट थेप्त ऐसे आयोजन किए जिसने मोदी को एक कमोडिटी बना दिया.हैदराबाद में अगस्त में हुआ उनका वह भाषण जिसे सुनने के लिए पांच रुपए का टिकट खरीदना पड़ता था। इस सभा के लिए मोदी ने किसी सहयोगी दल की मदद नहीं ली.
थ्रीडी, होलोग्राम, चाय पार्टी, जैसे तरीके 18-23 साल के युवाओं को बहुत पसंद आए। कुछ नया करने की तलाश करने वाली पीढ़ी को लगा कि मोदी नया इनोवेशन कर सकते है। सितंबर 2013 से  मोदी ने लगातार  450 भाषण देकर बहुत बड़े इलाके तक पहुंचे. भाषणों और दौरों के जरिये उन्होंने पहले जनता में स्वीकार्यता बढ़ाई उसके बाद ही वे मीडिया के पास पहुंचे. प्रचार के दौरान वे लगातार नए आइडिया फेंकते रहें फिर चाहे वह 100 मेगा सिटी बनाने की बात हो या बुलेट ट्रेनें चलाने की.दिल्ली विधानसभा चुनाव  में  'आपÓ की जीत के बाद वे थोड़े विचलित नजर आए पर उन्होंने कोई गलती नहीं की वे अरविंद केजरीवाल की ओर से गलती होने का इंतजार करते रहें। केजरीवाल की चमक फीकी पड़ते ही उन्होंने 2002 के विकास के हिंदू मॉडल कै  को आधुनिक रूप दिया और फिर जोरदार अभियान छेड़ दिया.यह भी  दिलचस्प है कि 34 सालों में भाजपा संसद में कभी भी 182 से ज्यादा सीटें नहीं ला पाई,ऐसे में किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि इस चुनाव में भाजपा 200-220 से ज्यादा सीटें ला पाएगी लेकिन मोदी की अगुवाई  में एनडीए ने 334 सीटें जीतने का करिश्मा कर दिखाया. इस चुनाव में  बीजेपी की स्वीकार्यता 35 फीसदी थी, वहां मोदी की स्वीकार्यता 65 फीसदी थी.पूरे चुनाव में युवा गेम चेंजर साबित हुआ.इस बार चुनाव और राजनीति से बेरुखी रखने वाले यही युवा न सिर्फ मत देने पहुंचे, बल्कि भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। मोदी को भाजपा के लिए जितने देशभर से वोट मिले, उस औसत से छह प्रतिशत ज्यादा समर्थन युवाओं का मिला।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों में युवाओं ने बढ़-चढ़कर खुद को वोटर के तौर पर रजिस्टर कराया और मतदान किया.नतीजा शुक्रवार को सामने आया तब पता चला कि उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहली बार पार्टी ने जातियों और समुदायों से जुड़कर वोट देने की परंपरा को तोड़ा. जहां चार फीसदी वोटों के अंतर से सरकारें बनती और गिरती रही हैं.वहां युवाओं का कांग्रेस को 19 प्रतिशत  और भाजपा को 39 प्रतिशत  वोट देना निर्णायक हो गया.देश में भाजपा को 33 फीसदी वोट मिले, लेकिन युवाओं ने 39 फीसदी भरोसा दिखाया. सबसे ज्यादा युवा वोटरों वाली 15 सीटों में से भाजपा को दस तो कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली.उत्साह से भरे युवा जानते थे कि राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं, भ्रष्टाचार, महंगाई तो इनके ध्यान में थे ही लेकिन सबसे ज्यादा मजबूत नेतृत्व के लिए वोट दिया. कुल 81.5 करोड़ वोटरों में से 12 करोड़ 18-23 वर्ष वाले थे जिनने  इस बार सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी  को ही चुना. पूरे देश में 2000 से ज्यादा होर्डिंग्स आर्ैर  रेडियो और टीवी पर हर दिन 50-50 विज्ञापन बुक किए गए. ग्रामीण इलाकों के लिए खासतौर पर दूरदर्शन पर विज्ञापन बुक किए गये मोदी का प्रचार उन स्थानों तक पहुंचाया गया जहां आज तक भाजपा नहीं पहुंची थी, जैसे पूर्वोत्तर से लेकर केरल तक 16वें आम चुनाव में 282 सीटों पर विजय हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी भाजपा को अकेले अपने दम पर बहुमत मिल चुका है. भाजपा गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली हैं. यानी यह एक भारी जीत है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत के पीछे क्या कारण थे. और क्या भाजपा की इस जीत ने कुछ पुराने जमे-जमाए राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं.कांग्रेस ने भाजपा के लिए अकेले खेलने के लिए पूरा मैदान खाली छोड़ दिया था. इसकी एक कारण कांग्रेस के प्रति लोगों में आक्रोश था. इसकी वजह से ढेर सारे मतदाताओं ने, जिन्होंने पहले कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए वोट किया था, इस बार उन्होंने भाजपा को वोट दिया.
ये सभी  परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जो पार्टी विकल्प के रूप में दिखाई दे रही थी, उसे इन सबने वोट दिया. आमतौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की पार्टी है. भाजपा को जिस तरह वोट प्रतिशत मिला है, जिस तरह की सीटें मिली हैं उसके अऩुसार भाजपा ने इस धारणा  को तोड़ दिया है. भाजपा को छोटे छोटे ग्रामीण इलाके में अभूतपूर्व समर्थन मिला है. पहले कभी भी भाजपा को गांवों में इस तरह वोट नहीं मिला. पहले जाति यादव, पिछडा वर्ग और दलित वोट दिया करते थे. लेकिन ऊँची जातियों का वोट इस बार जिस तरह बिहार, उत्तर प्रदेश एवं अन्य कई राज्यों में मिला वैसा कभी नहीं देखा गया. चुनाव में जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए हैं.मोदी  आजादी  के बाद पैदा हुए भारत के पहले  प्रधानमंत्री होंगें