सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मानवता शर्मसार है? अग्रिपथ...अग्रिपथ..अग्निपथ!

    फिर वही कहानी...! शवों व असहाय को कंधे पर लादना कोई शौक नहीं और न ही दिखावा है, यह सिर्फ हमारी व्यवस्था द्वारा दी गई चोट है, जिसे भी लोग अपने साथ लाद रहे हैं. हमारी अंधी- बहरी व्यवस्था ने कुछ ऐसा बना दिया है कि प्राय: हर महीने कोई असहाय किसी न किसी को अपने कंाधों पर लादने मजबूर है.इसमें चाहे उस व्यवस्था से जुड़ा हुआ खाखी पहनने वाला पुलिस वाला ही क्यों न हो वह भी इस कमजोर व्यवस्था के आगे झुकने मजबूर है. समाज में रौब का दूसरा रूप माने जाने वाले ऐसे व्यक्ति भी एक अस्पताल में स्ट्रेचर न मिलने के कारण अपनी बूढ़ी मां को कंधे पर बिठालकर चलने विवश हुआ. पुरानो में श्रवण कुमार एक ऐसा पात्र था जिसने अपने माता पिता को चारों धाम के दर्शन कराने के लिये अपने कंाधों पर लेकर घूमता रहा लेकि न आज एक अन्य श्रवण कुमार भी छत्तीसगढ़ के परलकोट में मिला जो हमारी घिसटती व्यवस्था के परिपे्रक्ष्य में -परेशान नजर आया जिसे अपने पिता की संदिग्ध परिस्थितियों मे मौत के बाद उनके शव को पोस्ट मार्टम के लिये अपनी बाइक के पीछे गठरी बांधकर ले जाना पड़ा. अच्छी स्वास्थ्य सेवा, एम्बुलेंस, स्वच्छता, सफाई और अस्पतालों के अच्छे प्रबंधन की पब्लिसिटी पर करोडा़ें रूपये व्यय करने वाली सरकारों के लिये यह शर्म से डूब मरने वाली बात है कि ओडिसा के एक माझंी को अपनी पत्नी के शव को अस्पताल से कई किलोमीटर दूर अपने घर तक कंधे पर लादकर ले जाने मजबूर होना पड़ा. यह भी शर्म की बात है कि वहां की सरकार ने इतनी बड़ी मानवीय त्रुटि होने के बाद उस घटना की सत्यता को छिपाने के लिये कहती है कि अस्पताल में एम्बुलेंस मौजूद था लेकिन मांझी ने उसका उपयोग नहीं किया! इस शर्मनाके हादसे के बाद भी न वहां का प्रशासन संभला और न देश में किसी कर्ताधर्ताओ के कान में जू रेंगा. सिलसिला आगे बढ़ता जा रहा है. एक के बाद एक अन्य घटना फिर उसी उड़ीसा में हुई जब एक शक्स अपनी बेटी का शव कंधे पर लादे अस्पताल से निकला्र यह शख्स ओडिशा के अंगुल जिले का गति धीबर था, जो अपनी पांच साल की बेटी का शव लेकर अस्पताल से बाहर निकला और एक किलोमीटर तक उसे ऐसी कोई मदद नहीं मिली जो उन्हें उनके गांव तक छोड़ पाती. यह वही ओडिशा राज्य का बालासोर अस्पताल है जहां लाश को कंधे पर उठाने के लिए अस्पताल के स्वीपर ने शव के ऊपर खड़े होकर अपने पैरों से उस डेड बाडी का कूल्हा तोड़ा और सारी मानवता को झकजोरते हुए कांधे पर गठरी के रूप में रख लिया.तड़क भड़क, सेवा सुष्रुषा सब पैसों वालों के लिये रह गई है और हमारे अस्पताल तो जैसे सिर्फ उन्हीं लोगों के लिये है जिनके पास चांदी की चमक है. बाकी सब कीड़े मकोड़ें.अस्पताल तो यहां तक कहने से नहीं चूकते कि आप प्रभावशाली है यह बात अगर पहले से पता चल जाती तो आपका इलाज सही ढंग से होता. अस्पताल रूपी कथित दैविक व्यवस्था लोगों को जीवित अवस्था में ही नर्क का परिदृश्य दिखा जाती है फिर यह तो मरने वाले हैं इनके बारे में क्या कहें?. आंध्रप्रदेश की वह घटना भी मानवता को तार -तार करने के लिये काफी है जहां अस्पताल का स्ट्रेचर न मिलने पर एक पत्नी अपने बीमार पति को घसीटकर ले जाने मजबूर हुई. यह महिला अस्पताल के रैंप पर धीरे-धीरे चलते हुए एक हाथ से अपने बीमार और विकलांग पति को खींचते हुए दीवार के सहारे आगे बड़ रही थी. धीरे-धीरे वह पैर घसीटते हुए अस्पताल के रैंप पर चढ़ सकी. यह वाकिया आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के गुंटकाल के सरकारी अस्पताल का है लेकिन यह कहानियां उस आजाद हिन्दुस्तान की भी है जहां आजादी पाने के लिये वीरों ने अपने सीने पर गोलियां खाई और अंग्रेजों की फंासी को भी अपने गले में हार की तरह पहन लिया. बाते हम बड़ी बड़ी करने के आदी हो गये हैं लेकिन हमारी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया वरना मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए कूड़े के ढेर का सहारा लेना नहीं पड़ता. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले जगदीश भील की पत्नी की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई. लेकिन पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे. इन सब घटनाओं को अपनी आंखों से देखने के बाद भी हम क्या यही कहें कि बड़ी बड़ी कोठियों से हिन्दुस्तान की तरक्की दिखाई दे रही है. वास्तविकता यही है कि असली हिन्दुस्तान फुटपाथ पर आबाद है... लेकिन दिक्कत यही है कि ऐसे मुश्किल हालात में भी हम कागजों, रिपोर्टों में तरक्की कर रहे हैं, विज्ञापनों में शाइनिंग इंडिया से लेकर सबका साथ, सबका भरपूर विकास हो रहा है. हमारे पास दिखाने को बहुत कुछ है, और छिपाने को भी बहुत कुछ...! जिस दिन हम छिपाने की कोशिश सबसे कम करना शुरू कर देंगे, समझिएगा कि अब सब कुछ ठीक होने लगा है. इस मुश्किल समाज में यह पंक्तियां ही याद आती हैं...गरीब देश के राज्यों के गली कूचे और गरीब बस्तियों में निकल जाइये या फिर किसी बड़े समारोह के कचरे फेकने वाले स्थल पर विदेशों में घूमने और बार बार े चिल्ला चिल्लकर वोट मांगने वालों को बोलिये कि वे वहां जाकर देखें जहां असल हिन्दुस्तान उन्हें नजर आता है जहां बड़े लोगों की पार्टी के फेके हुए झूटन पर ही उनकी जिदगी गुजरती है जहां उनके गरीब संबन्धी बिना इलाज के तड़प तड़प कर दम तोड़ते हैं तथा अर्थियां भी ऐसे ही बेनाम किसी एक संबन्धी के कांधे पर उठकर मुंह चिढाती है कि देखो हिन्दुस्तान तुमने कितनी तरक्की की है!  

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …