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...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!



...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!
अब तक ससंद की कार्रवाही को शांतिपूर्वक देख सुन रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से बुधवार को रहा नहीं गया. उन्होनें लोकसभा के अफसर से पूछ ही लिया कि बैठक कब तक के लिये स्थगित की गई है? उन्हें बताया कि दो बजे तक तो गुस्से में कह ही दिया कि अनिश्चितकाल के लिये क्यों नहीं? तीन हफ्ते बीत गए ससंद के शीतकालीन सत्र के किन्तु अब तक कार्यवाही सामान्य नहीं हो पाई है   नोटबंदी के मसले पर उठा विवाद गुरूवार को  शांत होने की संभावना बन गई थी लेकिन विपक्षी दलों के धरने और आरबीआई की नोटबंदी पर आई रिपोर्टो ने सरकार की मुसीबते और बढ़ा दी.  विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि प्रधानमंत्री सदन में इस मसले पर जवाब दें, दूसरी ओर सत्ता पक्ष चर्चा पर जोर दे रहा है देश की स्थिति और उसमें संसद की भूमिका को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्थिति पर चिंतित हो सकता है. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के क्षोभ को समझा जा सकता है उन्होंने सदन न चल पाने के लिए न केवल संसदीय कार्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष पर भी अंगुली उठाई. निश्चित रूप से यह पिछले कई दिनों से लगातार चल रहे हंगामे के बीच सब कुछ देखने-समझने के बाद की प्रतिक्रिया है. लोकसभा राज्य सभा में मंत्रिगण व नेता मामले को किसी तरह सुलझाने की जगह ताल ठोक रहे हैं. राजनीति के क्षितिज पर लालकृष्ण आडवाणी के अनुभव और कद के मद्देनजर उनकी बातों को हल्के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए उनकी ताजा टिप्पणी को किसी एक दल या पक्ष पर उठाई गई अंगुली के तौर पर भी नहीं देखा जा सकता, उन्होंने अगर विपक्ष के हंगामे से सहमति नहीं जताई है, तो सत्ता पक्ष को भी सदन बाधित करने का जिम्मेदार ठहराया है. जब संसद की कार्यवाही बाधित होती है, तो आमतौर पर केवल विपक्षी दलों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है मगर इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि विपक्षी दलों के किसी बात पर अडऩे के पीछे कारण क्या हैं और सदन को बाधित करने के लिए सत्ता पक्ष की भी कोई जवाबदेही बनती है या नहीं! आडवाणीजी के बाद अब महामहिम राष्ट्रपति ने भी कह दिया है कि भगवान के नाम पर सदन चलने दिया जाये.देखें क्या होता है बहरहाल नोटबंदी की अचानक घोषणा के बाद से समूचे देश में जो संकट खड़ा हुआ है उसके लगातार गहराते जाने के मद्देनजर विपक्ष की इस मांग को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री इस मसले पर सदन में बयान दें  इस मांग के पीछे आधार यह हो सकता है कि जब मुद्रा से संबंधित नीतिगत फैसले की घोषणा करना पारंपरिक रूप से रिजर्व बैंक का काम माना जाता रहा है, तो प्रधानमंत्री के स्तर से यह निर्णय और इसकी घोषणा होने की नौबत क्यों आई! प्रधानमंत्री ने यह कहकर विपक्ष को और उत्तेजित कर दिया कि विपक्ष बहस नहीं होने दे रहा उसे एक्सपोस करें.नोटबंदी को साहसिक कदम मानते हुए भी लोग परेशान है तथा  देश भर में एक तरह से आर्थिक अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है अपना पैसे बैंक में जमा होने के बावजूद लोग थोड़े पैसे के लिए भी भटकने पर मजबूर हैं और इसी वजह से अब तक लगभग सौ लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं. लोगों के पास नगदी न होने के चलते समूचे बाजार का कारोबार गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. ऐसी स्थिति में यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना तैयारी के नोटबंदी के फैसले को अचानक लागू करने के बाद पैदा हालात से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है! आर्थिक अराजकता की स्थिति को लोग महसूस करने लगे है लेकिन फिर भी भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन पर काबू पाने की बात से कोई भी असहमत नहीं है लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, उसमें जरूरत इस बात की है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिल कर रोज गहराते संकट का कोई हल निकालें.संसद में हंगामे की  वजह से कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिये जा सके .कई बिल लटके पड़े हैं. 

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