मंगलवार, 6 सितंबर 2016

एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!


एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!

पहले प्रधानमंत्री बोले, फिर राष्ट्रपति ने मोहर लगा दी, अब  बीजेपी भी कह रही है कि एक देश एक चुनाव में हमें भी कोई आपत्ति नहीं..तो फिर देरी किस बात की- देश में पांच साल मे सिर्फ एक ही बार चुनाव होना चाहिये-बार बार के चुनाव से जनता ऊब चुकी है-चुनावी खर्च भी बहुत बढ रहा है. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति दोनों की चिंता इस विषय में स्वाभाविक है. आखिर चुनाव के लिये पैसा भी तो जनता की जेब से निकलकर ही लगता है. देश में बढ़ती हुई मंहगाई की जड़ में भी बार बार होने वाले चुनाव है.आजादी के शुरूआती दौर में सब ठीक चल रहा था लेकिन आगे आने वाले समय में यह व्यवस्था गडबडाती चली गई. देश में 26 अक्टूबर 1962 को पहली इमरजेंसी का ऐलान उस समय हुआ जब चीन ने भारत पर हमला किया इसके बाद 3 दिसंबर 1971 को भी इमरजेंसी का ऐलान हुआ जब पाकिस्तान के साथ तीसरा युद्ध हुआ तीसरी और आखिरी बार 25 जून 1975 की रात में इमरजेंसी का ऐलान हुआ और वजह बताई गई देश के अंदरूनी हालात का बेकाबू होना. तीसरी और आखिरी इमरजेंसी करीब दो साल तक लगी, इस दौरान सारे चुनाव और अन्य कई किस्म की गतिविधियों पर लगाम लग गई. इमरजेंसी हटने के बाद शायद फिर कभी चुनाव व्यवस्था पटरी पर नहीं आई.अब इसे पटरी पर लाने का प्रयास तेज हो सकता है चूंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा था कि देशभर में स्थानीय निकाय और राज्य चुनाव वस्तुत: हर साल होते हैं, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में रुकावट आती है. प्रधानमंत्री सभी चुनाव पांच साल में एक बार कराने को लेकर उत्सुक दिखे, वे यह चाहते हैं कि पंचायत से लेकर संसद तक के सभी चुनाव एक साथ होने चाहिए. वैसे सभी चुनावों को एकसाथ कराने का विचार बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी बहुत समय पहले व्यक्त कर चुके थे तथा कई संसदीय समितियों और विधि आयोग ने इस विचार के पक्ष में राय दी है. बीजेपी के सत्तारूढ़ होने के बाद बजट सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से इस विचार को अनौपचारिक तौर पर रखा, जिसको कुछ बड़ी पार्टियों ने समर्थन दिया. अब यह मामला उस समय पुन: एक नई आशा के साथ जागा है जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को शिक्षक दिवस के मौके पर सरकारी स्कूल में एक विशेष क्लास लेने के दौरान लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनावों की वकालत की-इस बयान के तुरंत बाद रायपुर में भाजपा के महासचिव अनिल जैन ने पत्रकारों को यह बताकर कि भाजपा पहले से ही इस विचार का समर्थन करती है ने अब विश£ेषको के लिये यह विषय विचार करने के लिये दे दिया है कि आगे आने वाले समय में इस बिगडी व्यवस्था को किस तरह से सरकार और चुनाव आयोग मिलकर पटरी पर लायेगी़? पटरी पर लाने के लिये एक विकल्प एक बार फिर इमरजेेंसी भी हो सकती है. 1975 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस के पास दोनों सदनों में बहुमत था. लोकसभा में कांग्रेस के 523 में से 363 सदस्य थे और राज्यसभा में उसके सांसदों की संख्या कहीं ज्यादा थी, आज भले ही बीजेपी के पास लोकसभा में 543 में से 281 सदस्य हों लेकिन राज्यसभा में उसके पास 245 में से सिर्फ 46 सदस्य ही हैं, ऐसे में अगर सरकार चाहे भी तो इमरजेंसी नहीं लगा सकती.अनुच्छेद 352 में कहीं ज्यादा सेफगार्ड्स यानी सुरक्षात्मक प्रावधान हैं. राष्ट्र्रपति बिना पूरी कैबिनेट की सिफारिश के इमरजेंसी लागू नहीं कर सकते और इस सिफारिश पर भी संसद के दोनों सदनों की कुल सदस्यों की संख्या के आधे या उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगीऔर अगर ये सिफारिश दोनों सदनों से एक महीने के अंदर पारित नहीं हुई तो इसे असंवैधानिक मान लिया जाएगा.इसके अलावा राज्य पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं. इंदिरा गांधी के समय ओडिशा, तमिलनाडु, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर और  गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन आज की सत्तारूढ़ बीजेपी मुश्किल से महज 13 राज्यों में राज करती है, इनमें से भी कुछ राज्यों में उसकी दूसरे दलों के साथ सरकार है मजबूत राज्य का मतलब पुलिस और प्रशासन पर उसकी पकड़ जो इमरजेंसी जैसे हालात में काफी अहम होती है इतना ही नहीं आज राज्य पहले से कहीं ज्यादा स्वायत्त और आर्थिक तौर पर आजाद हैं, साथ ही करीब-करीब हर राज्य में एक या दो मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी मौजूद हैं.दूसरी ओर हम न्यायपालिका की बात करें तो 1975 की इमरजेंसी में सुप्रीम कोर्ट करीब-करीब खामोश रहा था, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट कहीं ज्यादा मुखर और सक्रिय है.स ुप्रीम कोर्ट आज न सिर्फ सरकार विरोधी बल्कि जजों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं की भी सुनवाई करता है ऐसे में सरकार को चाहते हुए भी सर्वदलीय व राज्यों के समर्थन के बगैर 'एक देश एक चुनावÓ की व्यवस्था को लागू कराने में चुनौती का सामना करना पड़ेगा.