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जवानों की तत्परता से ही पुलगांव में बड़ा डेमेज टला!



पुलगांव में देश के सबसे बड़े आयुध डिपो में लगी आग की जांच के लिए हालाकि अब एसआईटी गठित हो गई है और इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ तौर पर कहा जा सकेगा कि घटना केैसे घटित हुई.लेकिन महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सेना से जुड़े लोग ही यह कह संदेह व्यक्त कर रहे हैं कि इस कांड के लिये किसी साजिश से भी इंकार नहीं कर सकते. इस भीषण अग्रिकांड में हमारे आयुध कारखाने को तो भारी नुकसान पहुंचाया  है साथ ही जांबाज अफसरों की भी इस दुर्घटना में मौत हुई है. जवानों ने एक बार फिर जांबाजी का परिचय दिया है, खुद आग के शोलों में समा गए लेकिन पूरे हथियार (आयुध) डिपो को तबाह होने से बचा लिया. यार्ड में आग लगने के बाद सेना के अधिकारी और जवान तुरंत सतर्क हो गए थे. यह आग शोला न बन जाए इसलिए उस पर काबू पाने के लिए पहले दो अधिकारियों समेत जवानों की पहली टीम ने मोर्चा संभाला था लेकिन, आग बुझाने के दौरान ही धमाके शुरू हो गए और यह टीम गोला बारूद के धमाकों में समा गया. इस भीषण अग्निकांड के पीछे सुरक्षा की दृष्टि से हुई लापरवाही को अनदेखा नहीं किया जा सकता। 7000 एकड़ में फैला यह डिपो संभवत: एशिया के सबसे बड़े आयुध डिपो में से एक है जहां ढेर सारा बारूद, हथियार और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का भंडारण होता है. सेना के ऐसे संवदेनशील स्थानों पर भी अगर आग की ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं तो वहां के सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रश्नों के घेरे में आती है. मुम्बई-दिल्ली रेलमार्ग पर पुलगांव हालाकि एक छोटा सा स्टेशन है इसके आसपास देश का इतना बड़ा आयुध संग्रह है यह भी बहुत कम लोगोंं को पता ह. इस आयुध डिपो से ही युद्ध की स्थिति में जवानों को हथियारों की सप्लाई होती है. हालांकि, सेना की मुस्तैदी से इस आग पर काबू पा लिया गया मगर इस अग्निकांड में सेना के दो बड़े अफसर, एक जवान व 13 दमकल कर्मी शहीद हो गए. इन जांबाजों के कारण ही आग की लपटें दूसरे शैडों तक नहीं पहुंच पायीं. आयुध डिपों में आग लगाने की ऐसी घटना पहली नहीं है.अतीत में भी आग की ऐसी घटनाएं जान व माल के नुकसान की वजह बनी हैं. सन् 2000 में भरतपुर में भी इसी तरह की आग लगी थी, जिससे देश को 393 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. पश्चिम बंगाल स्थित पानगढ़ के आयुध डिपो में तो आग से लगभग 332 मीट्रिक टन बारूद स्वाहा हो गया था फिर अनन्तनाग स्थित खांडरू ऑर्डिनेंस डिपो की भीषण आग को कौन भुला सकता है जहां 19 लोग मारे गये थे और 100 के करीब घायल हो गये थे,आर्थिक नुकसान हुआ, सो अलग.लगता है हमने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा! इसीलिए इनकी ऐसी पुनरावृत्ति हो रही है जिस पर सरकार के रक्षा मंत्रालय को गहराई से सोचना होगा तथा सुरक्षा के ठोस उपाय करने होंगे,जो गोला-बारूद हमारी सुरक्षा के लिए है वही हमारे जवानों की मौत का कारण बन रहे है.  देश में सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन सेना को हथियार, गोला-बारूद सप्लाई करने वाले आयुध डिपो तक आधुनिकीकरण की यह सोच नहीं पहुंच पाई है इन डिपोस में आग बुझाने के यंत्र पुराने ढर्रे के हैं वैसे ही पुराने शैड तथा कई साल पहले वाले सुरक्षा मानक हैं, इस दुर्घटना के बाद इस समय सबसे बड़ा सवाल  यह उठ रहा है कि क्या देश के इस सबसे बड़े आयुध डिपो में भीषण आग को महज एक दुर्घटना मानकर हल्के से लेना चाहिये? वह भी तब जब हमारेे आसपास दुश्मनों और मीरजाफरों की पूरी टीम मौजूद हो? हाल के महीनों में ही पठानकोट एयर बेस में आतंकियों ने घुसकर तबाही मचाई थी. यहां न केवल हमारे जांबाज अफसर व जवान शहीद हुए थे बल्कि हमारे एयरबेस को भी काफी नुकसान हुआ था.इसमें जो तथ्य सामने आये वह यही इंगित करते हैं कि कुछ लोगों की मिलीभगत से इस पूरे हमले को अंजाम दिया गया था ऐसे में इस प्रकार  की  संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता. आग फैलती तो भयानक तबाही होती। दस हजार एकड़ में फैले हथियार डिपो में एक बंकर से दूसरे बंकर की दूरी सौ से डेढ़ सौ मीटर है। बंकरों के बीच ज्यादा दूरी होने के कारण भारी दुर्घटना टल गई.इसमें हमारे  जवानों व अफसरों की भूमिका की जितनी  तारीफ की जाये कम है.



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