सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

फांसी की सजा पर फिर सवाल,बस दुनिया के तेरह देशों में फांसी !




विश्व के मात्र तेरह देश इस समय जघन्य अपराध करने वालों को सजाएं मौत देती हैं,इनमें पाकिस्तान तीसरे नम्बर पर है कि न्तु यहां फांसी असल अपराधी की जगह ऐसे लोगों को देने का आरोप मानव अधिकार संगठनों ने लगाया है जो वास्तव में इसके पात्र नहीं है.2014 में फांसी देने वाले दस प्रमुख देशों में भारत का नाम था चूंकि 2014 में भारतीय अदालतों ने 64 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी अब पाकिस्तान मुजरिमों को फांसी पर लटकाने वाले देशों में तीसरे स्थान पर हो गया है. अंतरराष्ट्र्रीय मानवाधिकार संगठन  एमनेस्टी इंटरनेशनल पाकिस्तान में दी जाने वाली फांसियों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहता है कि पिछले साल पाकिस्तान में 324 लोगों को  फांसी दी गई इनमें ज्यादातर ऐसे अपराधी शामिल थे जिनका आतंकवाद से कोई वास्ता नहीं था.पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमले के बाद से 351 लोगों को पाकिस्तान में फांसी दी गई उनमें केवल 39 लोग ऐसे थे जो आतंकवाद से जुड़े थे या उनका संबंध आतंकी संगठनों से था,मानवाधिकार संगठन यह दावा कर रहा हैं कि पाकिस्तान में मानसिक रोगी, युवा अपराधी और ऐसे कैदी जिनपर अत्याचार किया गया या उन्हें पूरे रूप में न्याय नहीं मिल पाया वो फांसी पाने वालों में शामिल थे.दूसरी और भारत के बारे में फांसी पर सवाल उठा है-यहां फांसी की सजा पाने वालों में अधिकतर गरीब-कम पढ़े लिखे हैं -सेंटर ऑन द डेथ पेनाल्टी की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है जिसमें यह भी कहा गया है कि चौरासी प्रतिशत फांसी की सजा पानेे वालों का पहला अपराध था उसी के लिये  उन्हें फांसी पर लटकाया गया.भारत में जघन्य अपराध के लिए फांसी की सजा पाने वालों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में है, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर है वैसे आबादी के अनुपात में देखें तो देश की राजधानी दिल्ली पहले पायदान पर है. फांसी की सजा पाने वालों में 84 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार अपराध किया. इनमें अधिकतर गरीब और कम पढ़े लिखे हैं तथा उनकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं रही है। 20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में बंद फांसी की सजा पाए 373 कैदियों और उनके परिवारवालों से बातचीत के आधार पर तैयार रिपोर्ट में कई रहस्योद्घाटन हुए हैं जो यह बताते हैं कि फांसी की सजा पाए 74.1 फीसदी कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं, इनमें 76 फीसदी अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह से हैं.फांसी की सजा कितनी उचित है इस बात पर सवाल उठा है.फांसी  की सजा पाने वाला तो इस दुनिया से चले जाते है लेकिन भुगतता उसका परिवार है यह बात साफ हुई है कि इन कैदियों में 73 ऐसे थे जो अपने परिवार के लिये कमाने वाला एकमात्र सदस्य था, जबकि 59 परिवार में कमाने वाले मुख्य सदस्य थे.दुनिया के 13 देश ऐसे हैं जहां धर्म के नाम पर भी लोग फांसी पर लटकाये जाते हैं यहां ईशनिन्दा करने या धर्मपुस्तकों का अपमान पर भी सरेआम गोली मार दी जाती है, ईरान में ईशनिन्दा के अपराध में सरेआम क्रेन से लटका कर मार डाला जाता है, ये आदेश शरिया अदालतें जारी करती हैं ऐसी फांसी जनता की मौजूदगी में होती है ताकि लोगों में कानून के लिए डर बना रहे, इसी प्रकार पाकिस्तान में ईशनिन्दा पर सरेआम जलाकर मार डाला जाता है यहां पवित्र कुरान से साथ छेड़छाड़ पर पत्थरों से कुचल दिया जाता है मलेशिया में ईशनिन्दा और ईश्वर के खिलाफ अपशब्द बोलने वालों की खैर नहीं यहां धर्मपुस्तकों के साथ छेड़छाड़ भी खासा गुनाह है नाईजीनिया में ईश निंदा करने वाले को सरेआम गोलियों से भून दिया जाता है ताकि दूसरे लोग ईशनिन्दा से डरें ,सऊदी अरब में भी शरिया अदालतें चलती हैं यहां ईश निन्दा और कुरान से छेड़छाड पर सरेआम फांसी दी जाती है.मालदीव भी इसी श्रेणी में आता है यहां तो लोग भूलकर भी भगवान के खिलाफ कुछ नहीं कह सकते,कतर भी उन इस्लामिक देशों में शामिल है जहां ईशनिन्दा पर फांसी पर लटका दिया जाता है. समुद्री लुटेरों के चलते चर्चा में रहने वाले सोमालिया में भी ईशनिन्दा करने वाले को कानूनन सजा ए मौत का प्रावधान है. सूडान में खुदा का अपमान करने वाले या इस्लाम के खिलाफ बोलने वाले को पत्थर मारकर मार दिया जाता है, इसे संगसार कहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात में  ईशनिंदा के अलावा ईश प्रतीक जैसे कुरान के साथ छेड़छाड़ पर भी मार डाला जाता हैयमन में यहां मौत की सजा पाने वाले शख्स को सावर्जनिक स्थान पर उल्टा लिटाकर गोली मार दी जाती हैअफगानिस्तान में भी नास्तिक और ईश निन्दा करने वाले को सरेआम मौत की नींद सुला दिया जाता है मौरिशानिया में भी नास्तिकों को मौत की सजा दी जाती है।
















इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …