शनिवार, 28 मई 2016

अत्याचारों पर यह चुप्पी कैसी? क्यों रिएक्ट करना छोड़ दिया लोगों ने!






 हममें असंवैधनहीनता कितनी घर कर गइ्र्र है हम किसी खास घटना पर रिएक्ट ही नहीं करते, मूक दर्शक बने सब देखते हैं और मूक ही बने रहते हैं.वास्तविकता यही है कि हमारे आसपास कोई भी बड़ी से बड़ी घटनाहो जाये, हम ऐसा शो करते हैं कि हमने कुछ न देखा ,न सुना-हां- बनते जरूर हैं कि अरें! हमें तो पता ही नहीं चला.फिल्मों ने इस मामले में जरूर जारूकता दिखाई है,कई फिल्मे ऐसी घटनाओं पर बनी है लेकिन समाज अब तक ऐसी घटनाओं पर रिएक्ट करने लायक नहीं हो पाया, चाहे वह सड़क पर कोई व्यक्ति किसी के वार से कराह रहा हो या किसी  महिला के साथ सरे आम छेड़छाड़ की जा रही हो या कोई किसी को लूटकर भाग रहा हो-अथवा कोई ट्रेन में किसी असहाय के साथ दुव्र्यवहार कर रहा हो-हम इतना साहस भी नहीं कर पाते कि ऐसे विरोधी ताकतो का मुकाबला करें.हमारे समाज व कानून ने मनुष्य को कुछ ऐसा बना दिया कि वह चाहते हुए भी किसी प्रकार का एक्शन नहीं ले पाता. यू पी, बिहार हो या देश का अन्य कोई भी भाग, इस प्रकार की निष्क्रियता  से समाज भरा पड़ा है. लोगों में इतनी हिम्मत भी नहीं रह जाती कि अपने या अपने सगे संबन्धी पर हुए अन्याय का प्रतिरोध कर सकें. आपको याद होगा बिहार में जिस बच्चेे को एक बाहुबली के बेटे ने सरे आम गोली मार दी थी उसके पिता की प्रतिक्रिया थी कि -हमें मालूम है आगे क्या होगा-कुछ दिन वह जेल में आराम  से रहेंगे फिर छूटकर आ जायेगें.पीडि़त  घटना के बाद अगर किसी के खिलाफ बयान देता है तो वह अपनी सुरक्षा के प्रति भी चिंतित हो जाता है जब निर्णय देने वाले जज तक की जिंदगी ऐसे मामलों में खतरे में पड़ रही हो तो आम आदमी के बारे में सोचा जा सकता है कि वह किस हालात में मुकदमों को फेस करता होगा. सामने वाला जब छूटकर आयेगा तो उससे बदला लेगा.यह भावना हर परिवार में भर जाती है. ऐसी संभावनाओं के कारण हर  मदद करने का इच्छूुक यह सोचते हुए पीछे हट जाता हैे कि कौन इस लफड़े में पड़े? पूरे देश में इस प्रकार की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है, इसी का परिणाम है कि पडौस में भी कोई सहायता के लिये पुकारे तो भी लोग वहां पहुंचकर किसी पचड़े में पडने से बचने की कोशिश करते हैं लेकिन अगर कानून सख्त होता और प्रत्यक्ष गवाह को संरक्षण मिलता तो संभव है कि कई समस्याओं का हल मिल जाता. आज स्थिति यह है कि किसी का दु:ख सुनकर खुद दुखी हो जाते हैं, कभी डंडा और झंडा लेकर प्रदर्शन करने के लिए भी खड़े हो जाते हैं,अपने आपको दिखाने की कोशिश भी करते हैं कि हम सब एक सभ्य समाज का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में जब ऐसी घटना हमारे आसपास होती है तो शायद हम आगे आकर उसे रोकने की कोशिश नहीं करते उस वक्त पीडि़त का दु:ख हमको दिखाई नहीं देता है। केरल के एर्नाकुलम जिले के पेरूम्बवूर में एक कानून की विद्यार्थी की हत्या हो गई, एक छात्रा जो आगे जाकर वकील बनना चाहती थी, अपनी मां के सपनों को साकार करना चाहती थी  लेकिन उसका सपना पूरा नहीं हो पाया-चीखती रही  चिल्लाती रही पडौसियों ने सुना भी लेकिन कोई मदद के लिये नहीं पहुंचा अंतत: क्रूरता की बलि चढ़ गई.पुलिस कुछ समय के बाद वहां पहुंचती है लेकिन अपने मोबाइल की लाइट से घटनास्थल की रिकॉर्डिंग करके ले जाती है-जरा सोचिए अगर यह घटना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के साथ होती तो क्या पुलिस इस तरह का व्यवहार करती? शायद नहीं। एक तरफ जहां समाज, प्रशासन का यह रवैया है तो वहीं पुलिस और डाक्टर भी ऐसा कुछ कर डालते हैं जो इन दो पेशों पर से लोगों का विश्वास उठा देता है.असामाजिक तत्वों के व्यवहार पर पुलिस कम्पलेंट के बावजूद पुलिस का किसी  प्रकार कोई एक्शन न लेना जहां व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास उठाता है वहीं चिकित्सकों की लापरवाही भी दबंगों  से इन दोनों मेहकमों की साठ गांठ की पोल खोलता है. केरल के इस निम्र्रम हत्याकांड में पोस्ट मार्टम किसी बड़े डाक्टर द्वारा करे जाने की जगह पोस्ट ग्रेजुएट छात्र से कराया गया.प्राय:हर मामले को राजनीतिक नजरिये से देखने का असर यह हो रहा है कि लोगों का विश्वास अब पुलिस और कानून पर से उठने लगा है. किसी बड़े के लिये कोई कानून और छोटे के लिये दूसरा कानून.