शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

शराब को नीतिश की बाँय-बाँय, छत्तीसगढ़ से कब होगी विदाई...

शराब को नीतिश की बाँय-बाँय, छत्तीसगढ़ से कब होगी विदाई...?

चुनाव के दौरान नीतिश कुमार ने वादा किया था कि वे जीते तो बिहार में शराब  पर रोक लगा देंंगें.सत्ता सम्हालने के बाद उन्होंने अपने इस वादे को पूरा किया तो विरोध करने वाले भी सामने आये लेकिन बिहार की महिलांए बहुत खुश हैं.नीतिश का यह कदम आर्थिक-सामाजिक हितो को ध्यान में रखकरउठाया गया है.शराब पर  पाबंदी के इस कदम का विपक्ष के नेता सुशील कुमार मोदी ने भी स्वागत किया है.मुख्यमंत्री का यह कदम उनके गांधीवादी और संवैधानिक आदशों के चलते उठाया गया कदम माना जायेगा. बिहार सरकार को शराब से चार हजार करोड़ रूपये का राजस्व मिलता रहा है किन्तु उन्होने इसकी  परवाह नहीं की. शराब पर रोक से बिहार के सामाजिक व आर्थिक उन्नयप में काफी बदलाव आने की संभावना है लेकिन नीतिश कुमार के सामने असली चुनौती तो अब है. बिहार में शराब बंदी लागू करने से पहले सरकार ने शराब की बोतलों को बुलडोजरों के जरिये एक साथ खत्म कराया जबकि चोरी छिपे व्यापार करने वाले और तस्कर अब इस प्रतिबंध की आड़ में मुनाफा कमाने का प्रयास जरूर करेंगे. सरकार ने प्रतिबंध लगाने के साथ नियमों को भी काफी कड़ा किया  है इसलिये इस बात की संभावना  बहुत कम  है कि तस्करी बड़े पैमाने पर होगी-कौन दस साल जेल की हवा खाना चाहेगा? वैसे नीतिश की यह बात अच्छी है कि वे जो ठान लेते हैं उसे करने में भी उतने ही पक्के हंै.जब वे पिछली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होने राज्य में भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति जप्त करने का कठोर कानून बनाया. इस कानून के चलते कई नौकरशाहों को अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ा. संपत्ति जप्त कर सरकारी खजाने में जमा किया. उनके इस अभियान का देश के कुछ अन्य राज्यों ने भी समर्थन किया मध्य प्रदेश में भी कानून बना और छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कानून को काफी तगड़ा किया अब क्या हम उम्मीद करें कि छत्तीसगढ़ सरकार भी शराब बंदी कानून को अपने प्रदेश में भी लागू करेगी? बिहार की तरह छत्तीसगढ़ भी  पिछड़ा राज्य है यहां भी गरीब, श्रमिक ,मध्यम और उच्च परिवारों का एक बड़ा वर्ग शराब की लत में उसी प्रकार डूबा हुआ है जैसा पहले लाटरी में डूबा करता था.कई घरों को लाटरी ने उस समय बरबाद कर दिया था अब वहीं स्थिति शराब और नशीली दवाओं को लेकर है. सरकार ने अपना खजाना भरने के लिये गली मोहल्ले में सब जगह देशी विदेशी शराब देने की छूट दे रखी है.इससे सरकार का खजाना तो भर रहा है लेकिन कई परिवार टूट रहे हैं. मेहनत का पैसा शराब में उड़ा देने से वे न अपने बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं और न अपने को आर्थिक रूप से मजबूत कर पा रहे हैं. नीतिश कुमार ने जो निर्णय लिया है उसे छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को तो  बहुत पहले से लागू कर देना चाहिये था. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद विकास के हर सौपान को पार करने में कामयाब रहा है लेकिन उसके अपने लोग जिसके लिये यह राज्य बना और जिनका आर्थिक और सामाजिक विकास होना चाहिये था वह शराब व नशाखोरी की लत के कारण धीमा पड़ गया है.बिहार ने  एक बड़ा अदुभुत प्रयोग किया है उसके इस निर्णय की सफलता या विफलता यह साबित करेगा कि दूसरे प्रदेश इसका कितना अनुसरण करेंगे. वैसे सरकार यदि अपने पर अड़ गई तो कोई भी काम असफल नहीं होता इसलिये जब नीतिश मन में ठान कर निकले है तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि नशाबंदी  के मामले में बिहार को भारी सफलता मिलेगी इसके शुरूआती दौर को देखे तो बड़ी विचित्र स्थिति भी बन रही है-पाबंदी से रोज पीने वाले परेशान हो रहे हैं. जब शाम को शराब नहीं मिली तो लोग बीमार होने लगे,कई को तो इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती तक कराना पड़ा, कुछ पागलों जैसा बर्ताव करने लगे, घर में रखा साबुन खाने लगे आदि. आर्मी कैंटीन में भी शराब प्रतिबंधित की गई है. शराब के लिए रिटायर फौजियों ने भी हंगामा किया.  बहरहाल बिहार देश का चौथा ड्राई-स्टेट बन गया है! इससे पहले गुजरात, नगालैंड और मिजोरम में शराब पूरी तरह प्रतिबंध है बिहार में किसी को शराब बेचने का लाइसेंस अब नहीं मिलेगा।



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