सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नशेकी लत यूं और कितने परिवारों की खुशियां छीनेगी?



बोलचाल की भाषा में बात करें तो हर प्राणी को ईश्वर ने एक जिंदगी दी है, उसे उसी के अनुसार जीना है.उसी की मर्जी से उसे अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचना है लेकिन आज ऊपर वाले कीमर्जी के खिलाफ हर व्यक्ति अपनी जिंदगी जी रहा है.व्यक्ति या प्राणी जो जीवन जीता हैं उसमे कभी खुशी कभी गम की स्थिति रहती है.इसके पीछे कारण यही है कि हम सभी उनके नियमों के खिलाफ जीने की तमन्ना रखने लगे हैं.इसका परिणाम यह निकल रहा है कि प्राय: हर रोज किसी न किसी को इसका खामियाजा भरना पड़ता है.प्रतिदिन हमारे सामने घटित होने वाली  घटनाओं से तो यह साफ नजर आने लगा है कि ईश्वरीय शक्ति के विरूद्व जाकर जो लोग रास्ता तय करने की कोैशिश करते हैं वे न केवल खुद गर्त में जाकर गिरते हैं बल्कि कई अन्य लोगों को भी इसकी चपेट में ले लेते हैं. वास्तविकता यही है कि मनुष्य आज नशे में जी रहा है.किसी को यह नशा दौलत का हैं तो किसी को अपने पद व प्रभाव का तो कोई  ऐसा भी है जो गम को दूर करने और अत्यन्त खुशी को व्यक्त करने के लिये नशे में डूब जाता है- शराब और ड्रग का नशा मनुष्य को किसी भी सूरत में फायदा नहीं पहुंचाता बल्कि मनुष्य को इससे नुक्सान ही पहुंचाता है कभी तो यह अपनों से भी दूर कर देता है.देश में करीब दो लाख करोड़ रूपयें की शराब लोग हर साल पी जाते हैं इसमें पुरूष भी हैं और महिला भी, लेकिन पुरूषों का प्रतिशत ज्यादा है.हर साल चार लाख के करीब लोग सड़क हादसों मे मारे जा रहे हैं.नशावृत्ति के कारण कई परिवार टूट रहे हैं. नशा इतना भयंकर है कि इसमें सब कुछ तबाह हो जा रहा  है.अब अंतागढ़ की उस मेटाडोर दुर्घटना को ही ले लीजिये- नारायणपुर के गुरिया गांव में दुल्हन को विदा कर बाराती दुर्ग कोंदल विकासखंड के पास गुडफेल के लिये निकले थे, अनियंत्रित मेटाडोर एक पेड़ से टकराई और उसके बाद पलट गई.सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही ने दस व्यक्तियों को तो एक ही समय मे इस दुनिया से उठा लिया वहीं पैतीस अन्य को बुरी तरह जख्मी कर दिया.दुर्घटना के बाद शादी की खुशिया अचानक गम में  बदल गई.मेटाडोर के चालक के बारे मे बताया जाता है कि वह बुरी तरह नशे में था.यह पहला मौका नहीं है जब नशे में गाड़ी चलाते हुए कई जिदंगियां एक साथ खत्म हुई है. मेटाडोर का ड्राइवर नशे की हालत में वाहन चला रहा था इसकी जानकारी सारे बारातियों को थी, यहां तक कि बारातियों में से भी कई नशें में रहे होंगे लेकिन यह भी सवाल उठता है कि इस आयोजन में शामिल होने वाले किसी बड़े बुजुर्ग ने गाड़ी रवाना होने के पूर्व नशें में लडख़डाते ड्रायवर को गाड़ी चलाने से रोका क्यों नहीं? अगर वे चाहते तो उसे रोककर किसी दूसरे को स्टियरिंग सम्हालने को कह सकते थे. दूसरी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र की पुलिस क्या कर रही थी? इतने लोगों से भरी मेटाडोर वह भी नशें में दुत्त ड्रायवर कई लोगों की जिंदगी  से सड़क पर खेलता रहा और किसी पुलिसवालों ने इस क्षेत्र में उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की.इससे यह भी अंदाज लगाया जा सकता है कि इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पुलिस अपने कर्तव्य के प्रति कितनी जागरूक  है? नशे में चूर ड्रायवर के कारण् 11 लोगों की जिंदगी एक ही झटके में मौत के आगोश में समा गई. जनप्रतिनिधि जिनके पास  इस देश और समाज को सही दिशा में आगे ले जाने की ताकत  है उन्हें इस दिशा मे सोचना चाहिये कि शराब बंदी नहीं होने से हर साल कितने जीवन यूं ही नष्ट हो रहे हैं वहीं कितने परिवार बर्बाद हो रहे हैं. इस दुखद दुर्घटना मे मृतकों को श्रद्वांजलि और घायलों के प्रति संवेधना के अलावा हम भी इस मामले में कुछ न करने की स्थिति में हैं.देश के कई राज्यों में इस दुर्घटना ने फिर एक बार साबित कर दिया कि नशे का दूसरा नाम मौत हैं-नशेड़ी ड्रायवर अचानक ग्यारह लोगों की मौत लेकर आया  ओर चला गया. जीवन भर की खुशी पल भर में खत्म हो गई. प्रकृति हमें इस दुनियां में उसके बताये नियमों के आधार पर जीने का अधिकार देता  है लेकिन जहां उसका उल्लघंन होता है वहां ऐसी घटनाएं जन्म लेती  है. सरकारें अपना खजाना भरने के लिये  शराब बिक्री करवा रही है जबकि उसे वोट देकर बनाने वाली जनता स्वंय उससेे  मांग का रही है कि हर किस्म के नशें पर पूर्ण प्रतिबंध लगायें क्यो नहीं जनता के लिये,जनता की चुनी हुर्ई सरकार उसका कहना मान रही. सरकार तत्काल  नशें पर प्रतिबंध लगायें ताकि  देश में किसी मां की गोद सूनी न हो, बहन का भाई न बिछड़़े, किसी का सिंदूर न उजड़े.  दुख व्यक्त कर चंद राशि देने से परिवार का गया व्यक्ति वापस नहीं आ जाता।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

ANTONY JOSEPH'S FAMILY INDX

History of Mattappallil -
 Madukkakuzhy family

ANTONY JOSEPH”S
FAMILY. INDEX
 A family with its own tradition and values,started many decades ago from a place called EdamattomPallattu in Kottayam districtin Kerala.They have a well settled position not only in India but also abroad. The members of this family are not only in different parts of India but also in many developed countries like United States of America ,Rome,South Arabia multiplying the family's honour and fame with their professional expertise in the field of education,politics , journalism etc. In this note we go through a rough idea of the family history. Since we don't have any knowledge about many members of the old generations, we regret to skip off the details about them.Now with the help of the eldest member of this family ie J M Thomas (Thomachen)of Kottayam,we get a picture about the members of our family and how it branched.We belong to Edamattam Pallattu family. The family starts with two avakashi sist…

प्रेम, सेक्स-संपत्ति की भूख ...और अब तो रक्त संबंधों की भी बलि चढऩे लगी!

कुछ लोग तो ऐसे हैं जो मच्छर, मक्खी, खटमल और काकरोच भी नहीं मार सकते लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो हैवानियत की सारी हदें पार कर मनुष्य यहां तक कि अपने रक्त संबंधों का भी खून करने से नहीं हिचकते. इंसान खून का कितना प्यासा है वह आज की दुनिया में हर कोई जानता है क्योंकि आतंकवाद और नक्सलवाद के चलते रोज ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल जाती है जो क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती हैं. मनुष्य का राक्षसी रूप इस युग में ही देखने को मिलेगा शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा के दो रूप के अतिरिक्त अब रिश्तों के खून का वाद भी चल पड़ा है जो सामाजिक व पारिवारिक मान्यताओं, संस्कृति- परंपराओं का भी खून कर रहा है. नारी जिसे अनादिकाल से अबला, सहनशक्ति और मासूमियत, ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है उसका भी अलग रूप देखने को मिल रहा है. रक्त संबंध, रिश्ते, सहानुभूति, आदर, प्रेम, बंधन सबको तिलांजलि देकर जिस प्रकार कतिपय मामलों में अबलाओं ने जो रूप दिखाना शुरू किया है वह वास्तव में ङ्क्षचंतनीय, गंभीर और खतरनाक बन गया है. नारी के कई रूप हमें इन वर्षों के दौरान देखने को मिले हैं लेकिन ज…