शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

अस्पताल भगवान भरोसे तो मरीज की जिदंगी भी भगवान भरोंसे!



कहने को तो डीके अस्पताल से मेकाहारा और बाद में डा. भीमराव आम्बेडकर अस्पताल प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है.राज्य के आसपास के राज्यों से भी गरीब लोग यहां पहुंचते हैं लेकिन इसके करम ऐसे हैं कि लोगों को इसकी हरकतों पर कभी शर्म और कभी तरस आता है.हाल ही इस अस्पताल ने ऐसी हरकत कर डाली कि छत्तीसगढ़ को शर्म से सिर झुकाना पड़ा. सिर्फ एक हजार रूपयें के लिए शव को 3 घंटे तक रोके रखा.शव उस समय छोड़ा गया जब आसपास के मरीजों ने पैसा एकत्रित कर पीडि़त गरीब परिवार को दिया.अब तक ऐसे बर्ताव के किस्से कतिपय निजी अस्पतालों से ही सुनने को मिलते थे  अब इस प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल भी इस श्रेणी में शामिल हो गया. आखिर कौन है इसके लिये जिम्मेदार? अस्पताल में होने वाली प्राय: हर ऐसी गलतियों को नीचे से लेकर ऊपर लेवल तक छिपाने की एक परंपरा चली आ रही है और इस अस्पताल को चलाने वाले करता धरता ऐसे हर मामले में पतली गली से निकल जाते हैं- वे इस बात का हर संभव प्रयास करते है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे.तीन घंटे तक शव को रोके रखने का जो विवरण हमें प्राप्त हुआ है वह इतना घिनौना है कि हमें अपने आप पर भी शर्म आती है कि जिनको सरकार इस अस्पताल को चलाने के लिये मोटी-मोटी तनखाह देती है उनकी नाक के नीचे भी लोग इस प्रकार की हरकत करते हैं तथा उन्हें अपनी करनी पर कोई पछतावा भी नहीं होता.छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी डा. अंबेडकरअस्पताल में पिछले सप्ताह की शुक्रवार को एक मरीज का शव 3 घंटे केवल इसलिए रोक दिया गया क्योंकि मरीज के रिश्तेदारों के पास अस्पताल का बिल चुकाने के लिए एक हजार रुपए नहीं था. मृतक के बेटे ने अपने दोस्तों से पैसे उधार लिये,अस्पताल में भर्ती दूसरे मरीजों के रिश्तेदारों ने भी उनकी हालत देखकर मदद की. तीन घंटे में हजार रुपए इक_ा हुए, तब शव परिजनों को सौंपा गया,हम यह बता देना चाहते हैं कि इस तरह  की अमानवीय हरकत करने वाला अंबेडकर अस्पताल राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में पहला अस्पताल बन गया है, जिसने पैसों के लिए शव रोके  रखा. कतिपय निजी अस्पतालों में तो गरीबों के साथ तो क्या अच्छे अच्छो के साथ भी  ऐसा होता आया है. जब तक पैसा पूरा नहीं भरा जाता शव को उठाने नहीं दिया जाता.इसे भी विडम्बना ही कहा जायेगा कि इस अस्पताल में  होने वाली प्राय: घटनाओं को प्रशासन व सरकार में बैठे लोग कभी गंभीरता से नहीं लेते. एक चौकड़ी सी बन गई है जो गिल्टी लोगों को बचाने का प्रयास करती है, हर मामले  में वे सफल भी हो जाते हैं.प्रदेश में सरकार के इस बड़े अस्पताल में पिछले कम से कम पांच वर्षो में हुए बडे बड़े स्केण्डल में से ऐसे सभी मामलों में लिप्त लोगों को बड़े तरीके से क्लीन चिट दे दी गई.वास्तविकता यही है कि राजधानी में गरीब व मध्यम वर्गीय लोगो की  सेवा के लिये बनाये गये इस अस्पताल में यह घटना हुई जिसने सरकारी अस्पतालों के पूरे सिस्टम को आज कठघरे में खड़ा कर दिया. निजी अस्पतालों में पैसा कमाने की एक बड़ी  मशीन  है- 'वेंटीलेटरÓ मरीज जितने  दिन वेंटीलेटर पर रहेगा उसका बिल उतना ही ज्यादा बनेगा.अस्पताल प्रबंधन के बिना कोई नहीं जानता कि वेंटीलेटर पर रखा व्यक्ति जिंदा है या मर गया हैं. बिल बढ़ाने के लिये अक्सर  वेंटीलेटर सबसे बड़ा उपाय रहता है. निजी अस्पतालों में भारी बिल को सहन नहीं कर पाने के कारण ही लोग सरकारी अस्पतालों की शरण में जाते हैं यहां पहुंचने के बाद मरीज के परिजनों को किस तरह के मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है अम्बेेडकर अस्पताल की यह घटना उसकी एक मिसाल है. जिस व्यक्ति का शव रोका गया,उसे पांच दिन पहले यहां भर्ती किया गया था. परिजन बताते हैं कि गुरुवार की शाम तक उनकी हालत बेहतर थी, रात होते ही स्थिति बिगड़ी और शुक्रवार सुबह तक शुगर पांच सौ से अधिक हो गया। उसके बाद उनकी स्थिति कंट्रोल में नहीं आई और 11 बजे मौत हो गई.इस अस्पताल का शाम होते ही यह हाल है कि यहां ढूडों तो भी कोई डाक्टर दिखाई नहीं देता-सरकारी अस्पतालों में स्मार्ट कार्ड से फ्री इलाज करने का नियम है- गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों का भी फ्री इलाज किया जाता है. इसके अलावा सामान्य मरीजों से हर जांच के लिए न्यूनतम फीस ली जाती है,इसमें बेड चार्ज से लेकर कमरे का किराया सब शामिल रहता है उसी के अनुसार इस मरीज को भी  रखा गया था, इसीलिए उसके बेटे को इलाज का बिल बनाकर पैसे मांगे गए इस अस्पताल के कई पुराने किस्से यूं ही हैं जिसमें स्वस्थ मरीज अचानक अस्पताल प्रबंधन की  सही सुश्रषा के बगैर मौत के क गार पर पहुंच जाता है.्रबाहर से इस बड़े शहर में मरीज को लेकर आने वालों की स्थिति एक ऐसे व्यक्ति की  तरह हो जाती है जिसका कोई नहीं... अस्पताल की सारी व्यवस्था भगवान भरोसे है तो मरीज की जिंदगी भी भगवाने भरोसे... इंसान के अतुुलनीय जीवन का रक्षक ऊपर वाले  के बाद नीचे का अस्पताल है अगर वही ऐसा हो जाये तो  फिर ऐसे अस्पतालों का औचित्य ही समझ में नहीं आता!