काली कमाई के कुबेर-''बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये?


ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में काली कमाई का खजाना दबा पड़ा है जब भी एसीबी के छापे पड़ते हैं हम यही कहते आये हैं कि यहां जितना खोदोगे उतना माल मिलता जायेगा, इस बडे छापे ने उस दावे पर फिर मुहर लगा दी लेकिन जनता को पुराने अनुभवों के आधार पर संदेह है कि इन काले धंधे से कमाई करने वालों पर कुछ ऐसा होगा कि दूसरो को सबक मिलेगा? एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने शनिवार को रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई, रायपुर और कोरबा में 8 अफसरों के 12 से ज्यादा ठिकानों पर एक साथ ताबड़तोड़ छापे मारकर 15 करोड़ से ज्यादा की काली कमाई का भंडाफोड़ किया. बिलासपुर में तो छापा पडऩे के बाद पीएमजीएसवाय के ईई ने भ्रष्टाचार के 40 लाख बचाने के लिए पूरे पैसे पिलो में भरा और बाहर फेंक दिया यह तो एसीबी वालों की नजर तेज थी नहीं तो अफसर महोदय इन छापामारों के जाते ही गली से फिर नोट उठाकर लाकर रख लेते.छापामार अभियान का शुरूआती दौर शुभ था कि इतना कैश उन्हें एक साथ मिल गया. वैशाली नगर के उषा हाइट्स के फोर्थ फ्लोर में यह सब हुआ. एसीबी छत्तीसगढ़ सरकार का एक उपक्रम हैं जो पुलिस वालों को मिलाकर बनाया गया है, इस विभाग के अधिकारियों को शिकायत मिलती है तो बाहर सेे और टीम लेकर छापे की कार्रवाही होती है.भ्रष्टाचार के अलग अलग बड़े मामले उजागर होने के बाद सरकार ने पिछले कुछ माह पूर्व काली कमाई करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाही करने का नियम बनाया किन्तु लगता है अफसरों को कानून से कोई डर नहीं है इसके पीछे भी कारण यही लगता है कि पिछले छापों में किसी पर भी आज तक कोई बड़ी कार्रवाही नहीं हुई बल्कि छापे के बाद कालाधन कमाने वाले अफसर या तो पुन: नौकरी में रीइन्स्टेट या पदोन्नत कर लिया गया या फिर उनके मामलों को इतना ढीला कर दिया गया कि बाकी के हौसले बढ़ गये. शनिवार सुबह एसीबी की टीम ने अलग-अलग विभाग के अफसरों के घर रेड डाली.इनमें फूड, इरीगेशन और एजुकेशन डिपार्टमेंट के 8 अफसरों के 12 से ज्यादा ठिकानों पर छापे की कार्रवाही हुई ह.ै एसीबी के डीएसपी लेवल के 100 से ज्यादा अफसरों की टीम बनी थी. शुरूआती दौर की जांच पड़ताल में पता चला कि इन नौकरशाहो ने छत्तीसगढ़ की जनता की जेब से करीब 15 करोड़ रूपये गुप्त तरीके से निकालकर अपने व अपने पूरे  खानदान को कई सालों तक  घर बैठे खाने -पीने का पूरा इंतजाम कर रखा था. सवाल आम लोगों की तरफ से यह उठ रहा है कि ऐसा करने वालों के साथ एसीबी क्या करने वाली है? क्या सिर्फ मामलों को उजागर करना ही उनका मकसद है या फिर उन्हें जेल के सीकचों के पीछे भेजा जायेगा? ऐसे लोगों को नौकरी से तत्काल देना और संपत्ति को जप्त कर लेना ही फिलहाल इस मामले का एक इलाज है. होना तो यही चाहिये लेकिन कानूनी प्रक्रिया इतनी ढोलम पोल है कि ऐसा कुछ होता नहीं. अब हर आदमी यही चाहता है कि चोरी करने वाले के साथ एक चोर के जैसा व्यवहार होना चाहिये.चोर व चोर की काली कमाई खाने वाला परिवार भी इससे सबक ले कि जनता का पैसा खाने का नतीजा क्या होता है चाहे वह सरकार की कथित रूप से सेवा करने वाला असिस्टेंट डायरेक्टर हो या डायरेक्टर.इस बार छापा पड़ा तो बहुत सी बातों का खुलासा हुआ.यह पता चला कि आम इंसान को राशन पानी की व्यवस्था करने वाले नागरिक आपूर्ति निगम का अफसर भी चोरी करने में लगा है तो बच्चोंं को ज्ञान बांटने वाला यूनिवॢसटी का कर्ताधर्ता में इन बच्चों का खून चूसकर अपना घर भर रहा है.छापे की कार्यवाही में एसीबी की टीम ने खाने में अलग अलग व्यंजन को परोसनेे की तरह छापे मारी में अलग अलग क्षेत्र के महानुभावों को अवार्ड देने की तरह चुना. ं खाना खिलाने वाला विभाग--नागरिक आपूर्ती, तो पानी पिलाने वाला जलसंसाधन विभाग, युवाओं को शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले रजिस्ट्रार भी एसीबी का अवार्ड पाने में  कामयाब हो  गये.ऊपर से देखों तो इन महानुभावों की मासिक सेलरी दिखावे के लिये है असल  ठाठ बांट की जिंदगी को देखने लायक हैं. आम आदमी के पास घर चलाने के लिये कभी  चालीस रूपये नहीं होते तो यह छापे के डर पर चालीस लाख रूपये सड़क पर फेक देते हैं?ं जनता को ही यह तय करना चाहिये कि ऐसे लोगों के साथ क्या सलूक किया जाये?

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