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सभी चुनाव एक साथ कराने में क्या हर्ज? पहल करें मोदी जनता साथ देगी!




इसमें दो मत नहीं होना चाहिये कि देश में अगर सभी चुनाव को एक साथ एक ही समय में पांच वर्ष के लिये करा दिये जाये तो पैसे की बचत होगी साथ ही सरकार भी  सही ढंग से चल सकेगी. इलेक्शन को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राय के बाद इसपर बहस चलना स्वाभाविक है..अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी देश में एक साथ सभी चुनाव कराने की प्रस्ताव रखा था. उनका भी मानना था कि बार बार होने वाले चुनाव से सरकारी खजाने पर बहुत ज्यादा दबाव  पड़ता है.अगर एक ही बार मे सभी चुनाव पांच वर्ष के लिये करा लिये जाये तो चुनाव पर होने वाले व्यय व समय की बर्बादी दोनों  से बचा जा सकेगा. नरेंद्र मोदी ने भी19 मार्च को भारतीय जनता पार्टी की एक मीटिंग में इसकी पैरवी की है. मोदी ने मीटिंग में मौजूद पार्टी मेंबर्स से कहा था कि देश भर में निकाय और असेंबली इलेक्शन करीब हर साल होते हैं. ये सभी इलेक्शन एक साथ कराए जा सकते हैं. पार्टी का कहना है कि इस आइडिये से देश का वक्त और पैसा बचेगा.प्रधानमंत्री  की इस राय के बाद बीजेपी में भी यह राय है कि पंचायत से लेकर संसद तक के सभी चुनाव साथ होने चाहिए.अलग-अलग वक्त पर चुनाव होने से प्रोजेक्ट्स की रफ्तार थम-सी जाती है. एक-साथ चुनाव होने से टैक्सपेयर्स के पैसे की बचत भी होगी.प्रधानमंत्री और पार्टी की एक राय के बाद इस व्यवस्था को कायम करने में दिक्कत होने के  बाद भी ज्यादा दिक्कत नहीं आना चाहिये. कई संसदीय कमेटियों और लॉ कमीशन ने भी इसके पक्ष में अपनी राय दी है. बजट सत्र से पहले हुई ऑल पार्टी मीटिंग में सरकार की ओर से इस आइडिये को रखा गया था, जिसका कुछ बड़ी पार्टियों ने सपोर्ट किया है. अगर सब  पार्टियां मिलकर यह निर्णय लेती है तो वास्तव में देश और जनता दोनों का भला होगा. हम तो यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्रियों का चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से  होना चाहिये-आखिर हम शहरों में मेयर का चुनाव भी तो प्रत्यक्ष प्रणाली से सीधे सीधे कराते हैं इससे चुनाव जीतने  वाले व्यक्ति के प्रति आम लोगों का विश्वास और बढ़ेगा.आजादी के कई वर्षो तक चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था कायम रही है. किन्तु धीरे धीरे राजनीतिक उठा पटक  के चलते यह व्यवस्था ध्वस्त हो गई.मिली जुली सरकारे गिरने  व मध्यावधि चुनाव के कारण  पूरे देश में एक तरह की लोकतांत्रिक अव्यवस्था ने वर्चस्त कायम कर लिया.  लोकसभा के चुनाव किसी एक तिथि पर तो विधानसभा के चुनाव दूसरी तिथि पर और उसके बाद कई अन्य चुनावों ने तो देश की व्यवस्था को ऐसा बना दिया है कि जब देखों तब चुनाव का माहौल बना रहने लगा इससे लोग काम छोड़कर चुनाव प्रचार और प्रत्याशियों के आगे पीछे रहने लगे. शिक्षकों को पढ़ाई छोड़कर चुनाव में लगना पड़ता है. सरकारी कर्मचारियों का कामकाज भी सालभर प्रभावित होता रहता है. अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी मंशा के अनुरूप इस व्यवस्था को कैसे कायम करेगी? चुूंकि इस समय सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि सभी निकायों के एक साथ एक ही  समय में चुनाव कराने के लिये संपूर्ण
चुनाव को फिर से व्यवस्थित करना पड़ेगा- आज अगर एक राज्य का चुनाव अभी हो रहा है तो वह पांच साल बाद ही होगा. इस बीच और भी ऐसे कई राज्य आ जायेगें जिनके चुनाव होने हैं. लोकसभा की बात को तो हम मान सकते हैं कि वह पांच साल में एक बार ही हो जाये लेकिन  राज्यों का क्या होगा उन्हें कैसे पटरी पर लाया जायेगा. चलिये एक बात मान लेते हैं कि राज्यों के अंदर मौजूद नगर निकाय और पंचायतो को एक साथ भंग कर एक साथ कराया जा सकता है लेकिन निर्वाचित विधानसभाओं को तो बीच में भंग कर सामूहिक रूप से उसे पटरी पर लाना बहुत कठिन काम होगा हां यह जरूर किया जा सकता है कि लोकसभा के साथ-साथ होने वाले सभी विधानसभाओं को पहले पटरी पर लाया जाये फिर जितनी विधानसभांएं इन चुनावों के साथ अपने चुनाव कराना चाहती है वे भी इसमें जुड़े यह काम भी बड़ा जटिल ही है.चुनाव लोकतंत्र का आधार स्तम्भ हैं.आजादी के बाद से भारत में चुनावों ने एक लंबा रास्ता तय किया है।1951-52 को हुए आम चुनावों में मतदाताओं की संख्या 17,32,12,343 थी, जो 2014 में बढ़कर 81,45,91,184 हो गई है. 2004 में, भारतीय चुनावों में 670 मिलियन मतदाताओं ने भाग लिया (यह संख्या दूसरे सबसे बड़े यूरोपीय संसदीय चुनावों के दोगुने से अधिक थी और इसका घोषित खर्च 1989 के मुकाबले तीन गुना बढ़कर $300 मिलियन हो गया. यह चुनाव आयोग भी जानता है कि मतदाताओं की विशाल संख्या को देखते हुए चुनावों को कई चरणों में आयोजित करना आवश्यक है लेकिन बार बार चुनाव का तो कोई अर्थ ही नहीं निकलता. प्रधानमंत्री  की राय अनुसार अब ऐसा प्रबंध करना ही होगा कि सारे देश में एक बार में चुनाव पांच पांच साल के लिये व्यवस्थित किया जाये ताकि बार बार खजाने  से निकलने वाले पैसा और समय की बर्बादी  दोनों को रोका जाये.




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