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नाबालिग यह कहां जा रहे हैं?...इनका तो पहला कदम ही गलत!




इससे पूर्व कि आपराधिक प्रवृत्ति की और बढ़ते नाबालिगों के बारे में कुछ कहे हम एक किस्सा सुनाते हैं-एक बच्चे के पैदा होने के बाद से लेकर युवा और जवान होते तक उसकी मां ने उसे वह सब कुछ दिया जो वह मांगता था. कई मसलों पर उसके परिवार वाले भी विरोध करते कि इतना लाड़ प्यार न करों  कि वह बिगड़ जाये किन्तु मां कहां अपने लाडले के खिलाफ कुछ सुनने वाली थी. लड़का धीरे धीरे बड़ा हुआ तो उसकी मांग भी बढने  लगी स्कूल जाने की जगह आवारा बच्चों के साथ घूमने लगा.बीड़ी सिगरेट शराब की लत लग गई. मां को यह सब मालूम था फिर भी वह अवाइड करती रही. लड़का जब घर से पैसा नहीं मिलता तो चोरी करने लगा. उसे भी मां ने नहीं  रोका फिर वह लड़ाई झगडे भी करने लगा अच्छा खासा गुण्डा बन गया मां ने फिर भी कुछ नहीं कहा अंतत: उसने एक का खून कर दिया और जेल में ठूस दिया गया,अदालत ने उसे फांसी  की सजा सुना दी.फांसी पर चढ़ाने के पूर्व जब उससे अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा कि मैं एक बार अपनी मां से मिलना चाहता हूं-उसे मिलने दिया गया. मां जब पहुुंची तो उसने  अपनी मां को अपने  पास बुलाया और उससे लिपट गया और इतनी जोर से मां के कान को काटा कि उसे खीचकर हटाना पड़ा. जब उससे पूछा गया कि तुमने ऐसा क्यों किया तो उसका जवाब था आज मैं जिस स्थिति में हूं उसकी पूरी जिम्मेदार मेरी यह मां हैं अगर मेरी मां बचपन से मुझे मारती और हर जिद पूरी नहीं करती तो शायद आज मैं ऐसा नहीं बनता. इस दास्तान के जरिये हम यही बताना चाहते हैं कि बुनियाद घर से रखी  जाती है अगर बुनियाद हिल गई तो मकान का हश्र क्या होता है किसी को बताने की जरूरत नहीं.कुछ समय से प्राय: हर राज्य और शहर में चोरी, रोड-रेज, छेडख़ानी, बलात्कार, हत्या जैसे संगीन अपराधों में नाबालिगों की बढ़ती संख्या डराने वाली है.आपराधिक घटनाओं में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता समाज और देश दोनों के लिए नुकसानदेह है. देश का भविष्य युवाओं पर निर्भर करता है, लेकिन जब उसी वर्ग का एक हिस्सा अपराध की राह पर आगे बड़ रहा हो, तब यह सोचने वाली बात है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और हम किस प्रकार के भविष्य की नींव रख रहे हैं? ऐसा नहीं है कि इसमें केवल आर्थिक रूप से कमजोर या गरीब लड़के शामिल हैं, बल्कि ऐसी घटनाओं में संपन्न वर्ग के लड़के भी शामिल हैं.हो सकता है कि गरीब घरों के लड़के पैसों के अभाव की वजह से इस ओर प्रेरित हुए हों, लेकिन अमीर घरों के लड़के तो अहंकार के कारण अपराध के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कानून उनका क्या बिगाड़ लेगा और पैसे के बल पर वे बच जाएंगे. नाबालिगों की इस स्थिति के लिए माता-पिता भी कम जिम्मेवार नहीं हैं, जो अपने बच्चों की हर वाजिब-गैर वाजिब मांग और जिद को बचपन से ही पूरा करते रहते हैं,बिना यह सोच-विचार किए कि इसका परिणाम क्या होगा और इससे हम अपने बच्चों की कैसी मानसिकता बना रहे हैं. नतीजा, नाबालिग बच्चे अपने माता-पिता की बात तक नहीं सुनते.टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों को समय से पहले वयस्क बना दिया है.राजधानी रायपुर और  छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में  सड़कों पर खुलेआम चौदह-पंद्रह वर्ष के लड़के बिना हेलमेट के स्कूटी-बाइक तो तेज रफ्तार में चलाते ही हैं, बड़ी-बड़ी गाडिय़ां भी तेजी से चलाते हैं.यह बताने की जरूरत नहीं कि अधिकांश बाइक एक्सीडेंट नाबालिगों की बिगड़ी हुई मानसिकता का ही नतीजा है इन्हें रोकने वाला कोई नहीं,डेडी-मम्मी पहले भी अपने बच्चों की कारगुजारियों पर परदा डालने की ही कोशिश करते हैं दूसरी ओर इन्हें कानून का भी भय नहीं है.नाबालिगों में बड़ती आपराधिक प्रवृत्ति को रोकने के लिए पारिवारिक, सामाजिक और प्रशासनिक सभी स्तरों पर सजग होने की आवश्यकता है. इसमें भी माता-पिता की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. माता-पिता को बच्चों की छोटी-छोटी गलत हरकतों को नजरअंदाज करने की बजाय उन पर ध्यान देने और ऐसा करने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाना चाहिए.स्कूलों में नियमित रूप से बच्चों की काउंसलिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए और इसमें पुलिस का भी सहयोग लिया जाए.

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