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खेती-किसानी कहीं बीते दिनों की बात होकर न रह जाये? संकट में है किसान!



खेत कांक्रीट के जंगल में परिवर्तित हो गये हैं-ऐसे में अब किसान रह ही कितने गये हैं? हम अपने आसपास ही देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जहां खेत थे वहां अब आलीशान सीमेंट और कांक्रीट के मकान बन गये हैं दूसरी बात धीरे धीरे खेती का रकबा कम होता जा रहा है. किसानों पर लगातार मुसीबत के पहाड़ टूटकर गिरते जा रहे हैं-कहीं उसकी फसल ओले से नष्ट हो रही है तो कहीं सूखे से तो कहीं बाढ़ और अन्य प्राकूतिक विपदाओं से किसान  उतनी ही भूमि पर खेती कर सकता हैैं जितनी उसके पास है लेकिन अब उस कृषि भूमि का अधिकांश हिस्सा शहरी संस्कृति की तरफ बढ़कर कांक्रीट के जंगल में बदलती जा रही है ऐसे में अन्नदाता क्या करें? बिना अनाज उत्पादन की भारी जनसंख्या का पेट कैसे भरा जायेगा यह आगे के वर्षो में उत्पन्न होना स्वाभाविक है. बैंक से कर्ज लेकर खेती करने वाले हजारों लाखों  किसानों पर इस बार दोहरी मार पड़ी है. एक तो बैंक से लिए गए ऋण को चुकता करने की चिंता, दूसरी ओलावृष्टि या सूखे के रूप में प्रकृति का  कोप.हाल ही हुई बारिश और ओलावृष्टि से लगभग 50 फीसदी फसल गंवा चुके मेहनतकशों के सामने क्या करें क्या न  करें की स्थिति आ गई है। वास्तविकता यही  है कि एक सीजन की प्राकृतिक आपदा के चलते आने वाले कई महीनों तक दाल-रोटी की मुश्किलें खड़ी होने वाली हैं। इस बार छत्तीसगढ़ में जरूरत के अनुसार बारिश नहीं हुई, ठण्ड भी  पड़ी ही नहीं अब  मार्च के महीने में अलग-अलग हिस्सों में कई दिनों से बारिश के साथ ओले गिर रहे हैं। मंगलवार को भी कई जगहों पर अंधड़ के साथ हल्की से मध्यम बारिश और गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ीं। इसके कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है। हालत ये है कि बोई हुई फसल तो बर्बाद हुई ही, जो पैदावार हो रही है, उसका भी दाम नहीं मिल रहा। जशपुर में टमाटर, महासमुंद में तरबूज की फसल पूरी तरह खराब हो गई है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,  बसना, मोहला, मैनपुर, सीतापुर, रामानुज नगर, माना एयरपोर्ट, राजिम, कुरुद, पाटन, बालोद, गुंडरदेही, डौंडीलोहारा, सराईपाली, मस्तूरी और सोनहत आदि जगहों में हल्की से मध्यम बारिश ने कहर नहीं ढाया किन्तु बारिश से फसल को हर तरह से नुकसान पहुंचा है. खुले में रखी फसल बर्बाद होने के साथ साथ खेत में खड़ी फसल को भी नुकसान पहुंचा है.मौसम में आया परिवर्तन किसानों के लिये जहां चिंता का विषय है वहीं हर वर्ग के लिये यह चिंता की बात है कि इसके चलते वस्तुओं के दामों में भारी वृद्वि आयेगी.आम बजट के बाद जहां राहत की आशा की गई थी वहीं अब यह शंका बढ़ गई है कि सरकार डीजल पेट्रोल के भाव बढ़ाने के बाद अब और भी वस्तुओं के भावों में वृद्वि करेगी. इसका असर किसानों पर तो होगा ही साथ ही अन्य वर्ग के लोगों को भी झकजोर कर रेख देगा. ओले से प्रभावित जिलों के लिये सरकार ने पच्चीस पच्चीस लाख रूपये का ऐलान तो किया है किन्तु इसकी  मानिटरिंग भी जरूरी है कि जरूरतमंद किसानों तक यह राशि पहुंचेगी अथवा नहीं? सरगुजा, कोरिया, बलरामपुर, मुंगेली में जबरदस्त ओले गिरे हैं। इनके लिए सरकार ने सात करोड़ जारी किए थे.सरकार की इस सहरदयता ही है कि उसने समय रहते लोगों की  मदद की किन्तु इसका मकसद तभी पूरा होगा जब कृषक या अन्य जरूरतमंद लोग इसका लाभ उठा पायेंगे.इधर पत्थलगांव क्षेेत्र में टमाटर, महुआ को भारी क्षति हुई है कर्ज लेकर टमाटर की खेती करने वाले किसानों की  चिंता स्वाभाविक हैं.
बेमौसम बरसात ने उन पर दोहरी मार की है.फसल गलने लगी है। 70-80 रुपए प्रति कांवर में भी टमाटर कोई नहीं उठ रहा है। लुड़ेग, काडरो, मुड़ागांव, रेहड़े, बागबहार में ओले गिरने के कारण फसलों को भारी नुकसान हुआ है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा टमाटर की खेती पत्थलगांव में ही होती है। टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए बीमा योजना भी नहीं है. ओलावृष्टि ने वनोपज संग्रहण करने वाले किसानों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है। महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज के अलावा अन्य वनोपजों को  भी भारी नुकसान हुआ है। किसान जहां फसल खोकर चिंतित हैं वही उसकी परेशानी  बैंक से लिए गए ऋण को चुकता करने की भी है,यह सब ठीक है कि सरकार किसानों के लिये  कई योजनाएं चला रही है. कृषि यंत्र, बीज समेत अन्य लाभ अनुदानित रूप से मिलता है, इसी के तहत आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को सरकार किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए बैंकों से कर्ज देती है। एक साल के अंदर किसान कर्ज जमा कर देते हैं तो उन्हें मात्र चार प्रतिशत ब्याज देना पड़ता है. एक साल से अधिक समय होने पर सात और दो साल से अधिक समय गुजरने पर 14 प्रतिशत ब्याज लिया जाता है। एक साल के बाद सरकार यह मान लेती है कि संबंधित कृषक खेती के बजाए किसी अन्य कार्य में पैसे को लगा रहा है. मौसम की मार सह रहे किसान बैंक से लिए कर्ज को जमा करने में अक्षम हो रहे हैं। 

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