सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आरक्षण का शनै शनै अंत ही एक विकल्प!



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाबा साहेब डा0 भीमराव अंबेडकर राष्ट्र्रीय स्मारक की आधारशिला रखने के मौके पर कहा कि दलितों और दमितों को मिले आरक्षण को कमजोर नहीं किया जाएगा. आरक्षण कमजोर वर्गों को संविधान से मिला अधिकार है और इस अधिकार को कोई नहीं छीन सकता है. सरकार मानती है कि समाज को दुर्बल बनाकर राष्ट्र्र को सबल नहीं बनाया जा सकता. यह बाबा साहेब का सपना था जिसे साकार करने के लिए सरकार वचनबद्ध है लेकिन कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही है.सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण अब अपनी सीमाएं तोड़ कर सर्वजातीय हो गया है. अब मूल प्रश्न कि अछूत माने जाने वाले दलित वर्ग और घने जंगलों व पहाड़ों में रहने वाले आदिवासी और गिरिजन न तो मुखर रहे हैं और न उनपर कोई ध्यान दे रहा है.संविधान में आरक्षण के प्रणेता ने अछूतों व आदिवासियों के लिये 10 साल के आरक्षण की व्यवस्था करायी थी लेकिन यह आरक्षण आज अडसठ साल बाद भी जारी है. मूल व्यवस्था राष्टï्र व समाज की जरूरत थी. लेकिन बीच में मात्र 11 महीने प्रधानमंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर-मंडल की प्रतिद्वंदी राजनीति में मंडल कमीशन के नाम पर 'अन्य पिछड़े वर्गोंÓ को आरक्षण देकर आरक्षण के मूल विचार ध्वस्त कर दिये. पिछड़ों के नाम पर अनेकों जातियों के आरक्षण में आ जाने से बाकी बची जातियों के युवा वर्ग के सामने नौकरी व शिक्षण संस्थाओं में भर्ती के अवसर अपने आप ही कम हो गये. हर जाति की मांग की बाढ़ आ गयी और इसी से मूल आरक्षण बह गया. राजस्थान में एक बड़ा समुदाय मीणा जाति का है. इन्होंने 27 प्रतिशत पिछड़े लोगों को आरक्षण मिल जाने के बाद मीणा जाति के लिये 5 प्रतिशत आरक्षण पा लिया. यही आरक्षण 'जाटोÓ को भी उकसा गया. आर्थिक दृष्टिï से जाट संपन्न किसान वर्ग का है. जाट का मतलब अच्छी जमीन और बड़ा किसान होता है. यही स्थिति गूजरों की है. वे भी मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा में फैले हुए हैं. ये भी किसानों की सम्पन्न जाति है. ये भी आरक्षण मांग रहे हैं. गुजरात में पाटीदार जो पटेल के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं वे भी गुजरात का अति सम्पन्न वर्ग और बड़े किसान हैं.हरियाणा ने हाल ही इतना बड़ा आंदोलन किया कि राज्य सरकार तो छोडिये केन्द्र सरकार तक हिल गई.आरक्षण की मांग उठाने के बाद हार्दिक पटेल रातों रात देश का बड़ा जातीय नेता बन गया.वास्तव में आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिये. जो बहुत गरीब हैं उसका चयन कर उसे समाज में खडे होने लायक बनाकर आरक्षण को आगे आने वाले वर्षो में खत्म कर देना चाहिये.यह बात डा. आम्बेडकर ने  संविधान लिखते समय कही थी लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं मानी आरक्षण आज आग की चिनगारी की तरह कायम है जो कभी भड़क जाती है. आरक्षण की मांग करने  वाले अधिकांश संपन्न है लेकिन जो वास्तव में इसके हकदार हैं वे अपनी आवाज उठाने लायक भी नहीं हैं.इधरअल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमान और जैन समुदाय भी आरक्षण मांग रहा है. बीच में न्यायपालिका भी सुप्रीम कोर्ट स्तर पर इस विवाद की लपेट में आ रही है.आंध्र अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमानों को आरक्षण दिया गया- सुप्रीम कोर्ट ने उसे इस आधार पर रद्द कर दिया कि धर्म के आधार पर आरक्षण अवैध है. इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के लिए आरक्षण देने को रद्द कर दिया है. हाल ही में जाटों ने हरियाणा में खासकर रोहतक नगर में जिस तरह गुंडागिरी का आंदोलन चलाया उससे उस राज्य में सभी गैर जातियां जाटों के विरुद्ध एकजुट होकर उन्हें बहिष्कृत कर रही है. जाति आरक्षण जाति संघर्ष हो गया और अब भारत में वर्ग संघर्ष नहीं जाति संघर्ष का दौर आ गया है. इसका एकमात्र निदान व समाधान यही है कि संविधान में जिन वर्गों को आरक्षण दिया गया वहीं तक सीमित रखा जाए.संविधान  ने वर्ग विशेष को आरक्षण  की अवधि निश्चित की थी लेकिन वोट की राजनीति के चलते यह न केवल कई अन्यों के लिये बढ़ती  गई बल्कि आरक्षण राजनीतिक उज्लू सीधा करने का कारण बन गया. अब भी कुछ नहीं बिगडा है धीरे धीरे कर आरक्षण की आवश्यकता को छान-छान कर निकाल देना चाहिये. पहले जातिगत आरक्षण खत्म किया जाये फिर आर्थिक रूप से बुरी गत में पहुंचे लोगो को छांटकर उन्हें एक समय सीमा तक आरक्षण प्रदान किया जाये वे अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जाये तो उनका आरक्षण खत्म किया जाये. प्राय: सभी आरक्षण को खत्म करना ही बेहतर होगा समाज में समानता लाने के लिये भी यह जरूरी है।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

ANTONY JOSEPH'S FAMILY INDX

History of Mattappallil -
 Madukkakuzhy family

ANTONY JOSEPH”S
FAMILY. INDEX
 A family with its own tradition and values,started many decades ago from a place called EdamattomPallattu in Kottayam districtin Kerala.They have a well settled position not only in India but also abroad. The members of this family are not only in different parts of India but also in many developed countries like United States of America ,Rome,South Arabia multiplying the family's honour and fame with their professional expertise in the field of education,politics , journalism etc. In this note we go through a rough idea of the family history. Since we don't have any knowledge about many members of the old generations, we regret to skip off the details about them.Now with the help of the eldest member of this family ie J M Thomas (Thomachen)of Kottayam,we get a picture about the members of our family and how it branched.We belong to Edamattam Pallattu family. The family starts with two avakashi sist…

प्रेम, सेक्स-संपत्ति की भूख ...और अब तो रक्त संबंधों की भी बलि चढऩे लगी!

कुछ लोग तो ऐसे हैं जो मच्छर, मक्खी, खटमल और काकरोच भी नहीं मार सकते लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो हैवानियत की सारी हदें पार कर मनुष्य यहां तक कि अपने रक्त संबंधों का भी खून करने से नहीं हिचकते. इंसान खून का कितना प्यासा है वह आज की दुनिया में हर कोई जानता है क्योंकि आतंकवाद और नक्सलवाद के चलते रोज ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल जाती है जो क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती हैं. मनुष्य का राक्षसी रूप इस युग में ही देखने को मिलेगा शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा के दो रूप के अतिरिक्त अब रिश्तों के खून का वाद भी चल पड़ा है जो सामाजिक व पारिवारिक मान्यताओं, संस्कृति- परंपराओं का भी खून कर रहा है. नारी जिसे अनादिकाल से अबला, सहनशक्ति और मासूमियत, ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है उसका भी अलग रूप देखने को मिल रहा है. रक्त संबंध, रिश्ते, सहानुभूति, आदर, प्रेम, बंधन सबको तिलांजलि देकर जिस प्रकार कतिपय मामलों में अबलाओं ने जो रूप दिखाना शुरू किया है वह वास्तव में ङ्क्षचंतनीय, गंभीर और खतरनाक बन गया है. नारी के कई रूप हमें इन वर्षों के दौरान देखने को मिले हैं लेकिन ज…